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जनसत्ता अखबार में प्रकाशित इस खबर को पेड न्यूज न कहा जाए तो क्या कहा जाए?

प्रतिष्ठित जनसत्ता अखबार में अगर इस तरह की खबर छपती है तो इसके गंभीर पाठकों को दुख पहुंचना स्वाभाविक है. जनसत्ता के दिल्ली एडिशन में पेज नंबर आठ पर टॉप में दो कालम की एक खबर छपी है. इस खबर में खबर क्या है, पहले तो यही तलाश पाना मुश्किल होता है. दूसरे, अगर इसे आप समाजवादी पार्टी की प्रेस विज्ञप्ति मानकर पढ़ते हैं तो पूरी खबर में यह कहीं नहीं जिक्र है कि ये सारी बातें सपा की एक प्रेस विज्ञप्ति के हवाले से है. लखनऊ डेटलाइन से जनसत्ता ब्यूरो के हवाले से प्रकाशित खबर को आप भी पढ़िए और सोचिए कि क्यों न इसे पेड न्यूज की कैटगरी में रखा जाए. खबर नीचे है. -एडिटर, भड़ास4मीडिया

प्रतिष्ठित जनसत्ता अखबार में अगर इस तरह की खबर छपती है तो इसके गंभीर पाठकों को दुख पहुंचना स्वाभाविक है. जनसत्ता के दिल्ली एडिशन में पेज नंबर आठ पर टॉप में दो कालम की एक खबर छपी है. इस खबर में खबर क्या है, पहले तो यही तलाश पाना मुश्किल होता है. दूसरे, अगर इसे आप समाजवादी पार्टी की प्रेस विज्ञप्ति मानकर पढ़ते हैं तो पूरी खबर में यह कहीं नहीं जिक्र है कि ये सारी बातें सपा की एक प्रेस विज्ञप्ति के हवाले से है. लखनऊ डेटलाइन से जनसत्ता ब्यूरो के हवाले से प्रकाशित खबर को आप भी पढ़िए और सोचिए कि क्यों न इसे पेड न्यूज की कैटगरी में रखा जाए. खबर नीचे है. -एडिटर, भड़ास4मीडिया

नए साल में दिल्ली फतह करना चाहती है सपा

जनसत्ता ब्यूरो

लखनऊ । 2012 में राज्य में विजय के बाद समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने 2013 और 14 के लिए दिल्ली जीतने का लक्ष्य तय किया है। बीती फरवरी और मार्च में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव ने एक नई इबारत लिखी, जिसमें बसपा के पांच वर्ष के कुशासन का अंत हुआ।
बसपा राज में लूट और भ्रष्टाचार का बोलबाला, महिलाओं और बच्चियों के साथ दुष्कर्म होता रहा। स्वयं मायावती ने माना था कि उनकी पार्टी में 500 अपराधी हैं लेकिन वायदे के बावजूद न तो उनकी सूची प्रकाशित हुई और नहीं किसी अपराधी को निकाला गया। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में 5700 करोड़ रुपए का घोटाला हुआ, जिसकी जांच सीबीआई कर रही है। इनमें दो मुख्य चिकित्सा अधिकारी और एक डिप्टी सीएमओ की हत्या हो गई। जांच की आंच में दर्जनों डाक्टरों के अलावा कई मंत्री और आईएएस अफसर तक फंसे हैं। सहकारिता में लैकफेड घोटाला, बीज निगम में 50 करोड़ का घोटाला और पार्कों व स्मारकों सहित मूर्तियों के घोटाले में जनता की गाढ़ी कमाई लुटाई जाती रही।
उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को विरासत में भ्रष्ट प्रशासन तंत्र, पंगु कानून व्यवस्था और राजनीतिक छलावे के अलावा कुछ और नहीं मिला।लोकतांत्रिक वातावरण की एक नई जमीन तैयार की। बसपा राज में दहशत थी। सपा के मुख्यमंत्री ने पहले ही दिन कालीदास मार्ग स्थित सरकारी आवास के पास लगे सभी प्रतिबंध हटा दिए। उन्होंने जनता के लिए अपने द्वार खोल दिए और विकास का एजंडा तय किया।
अखिलेश ने छात्र संघ बहाली, बेरोजगारी भत्ता देने, मुफ्त इलाज और मरीजों के लिए एंबुलेंस सेवा 108 और महिलाओं के सम्मान की रक्षा के लिए वूमन पावर लाइन 1090 सेवा की शुरुआत की। पत्थरों और प्रतिमाओं पर सरकारी खजाना लुटाने के बजाय जनहितकारी योजनाएं शुरू की। महत्वाकांक्षी भूमि सेना के लिए पहले साल 2012 और फिर 2013 में 47038 लाख रुपए खर्च करने का प्रावधान किया गया। किसानों का 50 हजार रूपए तक के सहकारी कर्ज माफ किए गए, आपदाग्रस्त किसान परिवार को आर्थिक मदद, फसल बीमा, वृद्ध

सीमांत किसानों को पेंशन, सिंचाई की मुफ्त सुविधा उपलब्ध कराई गई।
नई कृषि, औद्योगिक और भंडारण नीति बनी है। किसानों को खाद और बीज समय से मिले इसकी व्यवस्था की गई। गन्ना, आलू, धान और गेहंू किसानों के हितों को ध्यान में रखा गया।
लड़कियों की आगे की पढ़ाई व उनके शादी ब्याह में मदद के लिए कन्या विद्याधन, पढ़े बेटियां, बढ़े बेटियां, हमारी बेटी उसका कल जैसी योजनाओं में धन दिया गया। छात्र और छात्राओं को लैपटाप और टैबलेट बांटने की व्यवस्था की गई। पिछली सपा सरकार के दौरान निर्माणाधीन 114 ओवरब्रिज का काम अधूरा रह गया था, उसे बसपा सरकार में पूरा नहीं किया। सपा की दोबारा सरकार बनने पर फिर काम में तेजी आ गई। मुसलमानों को आर्थिक रूप से मजबूत करने के लिए नौकरियों में भर्ती, सभी कमेटियों, आयोगों और बोर्डो में प्रतिनिधित्व के साथ कब्रिस्तानों की चहारदीवारी बनाने और मदरसों को मदद का भी काम शुरू हुआ। बेकसूर मुसलिमों की रिहाई के लिए भी यह सरकार प्रयत्नशील है। लोकतंत्र सेनानियों को पेंशन दी गई।
मुख्यमंत्री ने प्रदेश के सभी वर्गों के विकास के लिए योजनाएं बनाई हैं। किसानों, नौजवानों, महिलाओं, व्यापारियों, वकीलों और अल्पसंख्यकों सभी के हितों का उन्होंने खयाल रखा है। गांवों की खुशहाली को प्राथमिकता दी है। अफसरों को जनहित के कामों को वरीयता से करने के निर्देश दिए है। उन्होने पांच बरसों के लिए किए गए चुनावी वायदों को काफी हद तक नौ महीनों में ही पूरा कर दिया है।
सबसे बड़ी बात यह कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने वह कर दिखाया जो मायावती अपने पांच साल के कार्यकाल में भी नहीं कर पाई थीं। उन्होंने 2007 में सत्ता संभालते ही केंद्र सरकार से 80 हजार करोड़ का पैकेज मांगा था। वे प्रधानमंत्री को चिट्ठियां लिखती रही, रैलियां भी कीं लेकिन कुछ नहीं हासिल कर पार्इं। अखिलेश यादव ने नौ  महीने के अंदर ही केंद्र सरकार से 45 हजार करोड़ की आर्थिक मदद तो ली ही, कुंभ के लिए 800 करोड़ का विशेष आर्थिक पैकेज भी वे ले सकने में सफल हुए हैं।
 

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