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एनडीटीवी पर मयंक सक्सेना : वीर तुम बढ़े चलो…

पत्रकारिता में ज्यादातर लोग पेट पालने आते हैं…. पत्रकारिता में आने वालों की जब नौकरियां चली जाया करती हैं या ये लोग कभी क्रांतिकारी मनोदशा में नौकरियां छोड़ दिया करते हैं तो वे फिर नई नौकरी तलाशने की अघोषित मुहिम में जुट जाते हैं…. पत्रकारिता में नौकरी करने वाले क्रांतिकारी पत्रकार कई झटके खुद खाने और कई झटके दिए जाने के बाद अंतत क्रांतिकारिता को चुपचाप त्याग कर चुपचाप समझौतावादी बन जाते हैं और नौकरी करते रहने के लिए तर्क व स्थितियां अपने दिल-दिमाग में पैदा कर लेते हैं….

पत्रकारिता में ज्यादातर लोग पेट पालने आते हैं…. पत्रकारिता में आने वालों की जब नौकरियां चली जाया करती हैं या ये लोग कभी क्रांतिकारी मनोदशा में नौकरियां छोड़ दिया करते हैं तो वे फिर नई नौकरी तलाशने की अघोषित मुहिम में जुट जाते हैं…. पत्रकारिता में नौकरी करने वाले क्रांतिकारी पत्रकार कई झटके खुद खाने और कई झटके दिए जाने के बाद अंतत क्रांतिकारिता को चुपचाप त्याग कर चुपचाप समझौतावादी बन जाते हैं और नौकरी करते रहने के लिए तर्क व स्थितियां अपने दिल-दिमाग में पैदा कर लेते हैं….

और, पत्रकारिता में आने वाले लोगों को अक्सर ये पाठ पढ़ाए जाते हैं कि…. पत्रकारिता में टिकने के लिए तुम्हें पत्रकारिता के मठाधीशों, पत्रकारिता के पूंजीपतियों, पत्रकारिता के धंधेबाजों से पंगा नहीं लेना चाहिए क्योंकि ये लोग जब चाह लेते हैं तो पत्रकारिता नहीं करने देते हैं….. पत्रकारिता में आकर नौकरी करते रहने के लिए अपने से बड़ों के खिलाफ चुप्पी साधे रहना बहुत जरूरी होता है क्योंकि पत्रकारिता की दुनिया बहुत छोटी होती है और नौकरी मिलने में परेशानी होने लगती है….

देखा भी गया है कि कई महान क्रांतिकारी लोग जब अपने छात्र जीवन व क्रांतिकारिता के जीवन के अगले चरण में पत्रकारिता के जीवन में आए तो यहां की सेलरी व हवा-पानी खा पीकर यहीं के हो गए, फिर क्रांतिकारिता तेल लेने चली गई, उनके जुबान अब तक सिली हुई है…..

पर कुछ ऐसे भी होते हैं जो पत्रकारिता में आकर बिना किसी की परवाह किए, वही करते हैं जो उन्हें अच्छा लगता है, भले ही इसके लिए पूरी इंडस्ट्री से पंगा लेना पड़े, भले ही इसके लिए पत्रकारिता के प्रभुओं को नाराज करना पड़े.

उपरोक्त बातें युवा पत्रकार, लेखक, एक्टिविस्ट मयंक सक्सेना की बात शुरू करने के लिए कर रहा हूं. माखनलाल से पढ़ाई करने के बाद मयंक सक्सेना भी पत्रकारिता करने दिल्ली आए. कई जगह नौकरियां की. पर एक चीज उनके टोन व स्टाइल में कामन रही कि वे अपने दिल की सुनते रहे, दिमाग को पत्रकारीय सरोकाकर के हिसाब से अपग्रेड करते रहे. हाल-फिलहाल उन्होंने न्यूज24 से इस्तीफा दिया. मठाधीशों ने उन्हें कभी पसंद नहीं किया और मठाधीशों को मयंक ने कभी भाव भी नहीं दिया. जब-तब वे सड़क पर उतरते रहे. सड़क पर उतरने वालों के पक्ष में खुलकर लिखते बोलते लड़ते रहे. पिछले काफी समय से वे लड़ने भिड़ने के कार्यक्रम में ही जुटे हैं. बड़े-बड़ों का खुलकर विरोध करने में जुटे हैं.

लोगों ने उन्हें बहुत डराया. नौकरी नहीं मिलेगी. यह क्या कर रहे हो. इतने बड़े लोगों से पंगा न लो. पर मयंक ने अपने हिसाब से अपना जीवन रुटीन तय किया और उसी पर चल पड़े. कल जब वे एनडीटीवी पर दिखे तो सोचने लगा कि अगर इस लड़के ने नौकरी न मिलने या नौकरी जाने के डर से जीवन जिया होता तो आज एनडीटीवी पर प्रवचन न दे रहा होता. किसी चैनल में काम करना और किसी चैनल पर आकर अपनी बात रखना, दोनों में बड़ा अंतर है.

एनडीटीवी में काम करने वाला एनडीटीवी के अंदर की दिक्कतों पर बाहर बात नहीं कर सकता लेकिन एनडीटीवी पर आकर बात करने वाला एनडीटीवी के खिलाफ भी बोल सकता है. सड़क के संघर्षों, सामूहिक लड़ाइयों, सरोकारीय सोच के कारण मयंक दिनोंदिन मेच्योर होते जा रहे हैं. उन्हें एनडीटीवी पर सुनना सुखद रहा. एनडीटीवी को भी इसके लिए बधाई कि उनने नए नेतृत्व, नई सोच, नई उर्जा वालों को मंच दिया. आप भी मयंक व मयंक जैसों को सुनें… एनडीटीवी की पूरी डिबेट सुनने देखने के लिए नीचे की तस्वीर पर क्लिक करें. उम्मीद करते हैं कि आने वाले दिनों में मयंक जैसे पत्रकारों की संख्या बढ़ेगी.

नौकरी बचाने के लिए और नौकरी पाने के लिए हांफते कांखते भागते रहने वालों को मयंक जैसों से सबक लेना चाहिए और अपनी उर्जा सही जगह पर लगाने की कोशिश करनी चाहिए. अगर जिंदगी का मकसद पेट भरना ही है तो वह तो जानवर भी कर लिया करते हैं. इसलिए, अगर आप मनुष्य हैं और पत्रकारिता में हैं तो आप पर दोहरी जिम्मेदारी है. दुर्भाग्य है कि पत्रकारिता में 99 फीसदी से ज्यादा हिजड़े, दोगले, हिप्पोक्रेट, अवसरवादी, दलाल, आत्मकेंद्रित व जानवर किस्म के लोग हैं और इनकी  पूरी कोशिश बस किसी तरह नौकरी चलाते रहने, नौकरी बचाते रहने और नौकरी पाते रहने की होती है. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


और आखिर में… एनडीटीवी पर मयंक को लेकर एक टिप्पणी फेसबुक से…

Rahul Kumar : ‎NDTV India पर हो रही बहस के दौरान Mayank Saxena ने बहुत महत्वपूर्ण बातें कहीं. पुलिस कह रही थी कि जनता के पास प्रदर्शन का अधिकार है. अगर ऐसा है तो प्रदर्शन स्थल पर जाने का अधिकार भी तो होना चाहिए न? दस-दस मेट्रो स्टेशन बंद, प्रदर्शन स्थल के दो-दो तीन-तीन किलोमीटर पहले आपने पेरिमिटर सेट किया हुआ है, बैरिकेट लगा है और आप लोगों को जाने नहीं दे रहे. ऐसा कैसा प्रदर्शन का अधिकार. अगर उस दिन Fauziya Reyaz साथ न होतीं तो हम उद्योग भवन से आगे नहीं बढ़ पाते. चूंकि वो आकाशवाणी में हैं तो हमें उनके शो के नाम पर जाने दिया गया. तो ये है प्रशासन के अनुसार प्रदर्शन का अधिकार?

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