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अतुल माहेश्वरी की आज दूसरी पुण्यतिथि है… नमन

Pankaj Shukla : पत्रकारिता में प्रवेश के वक्त मेरी अंगुली थामने वाले पूज्य अतुल माहेश्वरी की आज दूसरी पुण्यतिथि है। वह ऐसे मालिक-संपादक रहे, जिन तक किसी भी कर्मचारी-पत्रकार को सीधे संवाद बना सकने की सुविधा हासिल थी। मुरादाबाद में था तो बहुत हिम्मत करते हुए उन्हें एक बार मैंने ख़िलाफ़त और मुख़ालिफत शब्दों के प्रयोग को लेकर पत्र लिखा।

Pankaj Shukla : पत्रकारिता में प्रवेश के वक्त मेरी अंगुली थामने वाले पूज्य अतुल माहेश्वरी की आज दूसरी पुण्यतिथि है। वह ऐसे मालिक-संपादक रहे, जिन तक किसी भी कर्मचारी-पत्रकार को सीधे संवाद बना सकने की सुविधा हासिल थी। मुरादाबाद में था तो बहुत हिम्मत करते हुए उन्हें एक बार मैंने ख़िलाफ़त और मुख़ालिफत शब्दों के प्रयोग को लेकर पत्र लिखा।

अतुल माहेश्वरी जी10 दिन भी नहीं बीते होंगे कि तब के फीचर संपादक योगेन्द्र कुमार 'लल्ला' जी की अगुआई में 'अमर उजाला' की मानक शब्दावली समिति गठित होने की सूचना आई। एक वाकया और, एक बार मोदी नगर से नोएडा आने के लिए बस का इंतज़ार कर रहा था। पता नहीं उधर से गुजरते हुए उन्होंने कैसे देख लिया। गाड़ी रुकवाई और साथ बिठा लिया। ऐसे तमाम किस्से हैं…अतुल जी के। अतुल जी कहीं गए नहीं, यहीं कहीं हैं..यही कहीं।

    Madhup Mohta You are right Pankaj. He was just like Murarilalji. Very kind and considerate. We miss him so much.
 
    Manish Sachan हम जैसे नई पीढी के पत्रकार ऐसे लोगों के अभाव में आगे बढ रहे हैं, काफी तकलीफ भरा माहौल है, इसतरह की यादगार बातें सुनता हूं तो बडा अच्‍छा लगता है, यह सोच कर की कभी तो यह पेशा, इंसानी रहा था
 
    Pankaj Shukla Madhup Mohta – मुरारीलालजी का सानिध्य तो नहीं मिला कभी। पर, बेटों के संस्कार ही विरासत के असली परिचायक होते हैं। नहीं तो कहां कौन मालिक किसी कर्मचारी को राह खड़े देख गाड़ी रुकवाता है और साथ बिठाकर दफ्तर के करीब तक छोड़ता है।
   
    Pankaj Shukla Manish Sachan – पेशा अब भी इंसानी ही है दोस्त। बस, मालिक और कर्मचारी के बीच एक खाई बनाकर कुछ लोग मौज काटने के ख्वाब बुन लेते हैं। लेकिन, ये ख्वाब जब टूटते हैं तो किरचें दूर तक बिखरती हैं और खाई तो खैर वहां कभी बन ही नहीं पाई, जहां लोगों ने नौकरी नहीं परिवार का सदस्य बनकर काम किया।
   
    Madhup Mohta Amar Ujala was always a family. The owners of the Press were just the first among equals because they would be the first to arrive in office and open the gates to serve tea and welcome everone. Dorilalji was no different.
    
    Jagdish Tripathi दिक्कत यह है कि मालिक और कर्मचारी के बीच खाई बना कर मौज काटने वाले ही आज के दौर में मौज कर रहे हैं।
     
    Manish Sachan Pankaj Shukla आपकी बात बिल्‍कुल सही है सर, लेकिन हालात इतने खराब है कि हम एक पल को मान भी लें कि हम इस परिवार का हिस्‍सा हैं लेकिन अगले ही पल तुगलकी फरमान हमारे इस ख्‍वाब का इतना बुरी तरफ तोडते हैं कि उसे सहेजने में महीनों और सालों लग जाते हैं,
     
    Anand Shukla जरुर हैं,सर जी।ऐसा मौका बहुत कम लोगों को नसीब पर मिलते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार पंकज शुक्ला के फेसबुक वॉल से.


मशहूर कवि वीरेन डंगवाल ने पिछले साल अतुल माहेश्वरी की मृत्यु के बाद एक पीस लिखा था, उसे आप पढ़ सकते हैं, इस शीर्षक पर क्लिक करके- ऊंचाइयां छूने के बाद भी वह भोला था, बहुतों से उसे धोखा मिला

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