: दो सदस्यीय खंडपीड ने दिया आदेश : आईपीएस अधिकरी अमिताभ द्वारा वरिष्ठ अधिकारियों कुंवर फ़तेह बहादुर, प्रमुख सचिव (गृह), विजय सिंह, सचिव, मुख्यमंत्री एवं अन्य पर स्वयं को एक लंबे समय से प्रताडित करने के आरोप लगाते हुए दायर रिट याचिका में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के लखनऊ बेंच ने यह आदेश निर्गत किया है कि अमिताभ मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश को अपने समस्त शिकायतों को बताते हुए एक प्रत्यावेदन देंगे जिस पर मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश चार माह के अंदर अपनी जांच पूरी करेंगे.
जस्टिस डी पी सिंह और जस्टिस एस सी चौरसिया की पीठ ने अपने निर्णय में कहा कि वैसे तो अमिताभ को विभाग का प्रमुख होने के नाते अपना प्रत्यावेदन प्रमुख सचिव (गृह) को देना चाहिए था किन्तु चूँकि मामले में आरोप स्वयं फ़तेह बहादुर पर लगाए गए हैं, अतः प्रशासन के वरिष्ठतम अधिकारी के रूप में मुख्य सचिव इस मामले की जांच करेंगे. आदेश में यह भी कहा गया है कि मुख्य सचिव इस मामले की सुनवाई के दौरान अमिताभ को अपनी बात कहने का मौका देंगे और विपक्षीगण कुंवर फ़तेह बहादुर और विजय सिंह का भी पक्ष सुनेंगे. उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में यह कहा कि यदि किसी शासकीय कर्मी को किसी प्रकार की कोई शिकायत है तो उसका उचित प्रकार से निस्तारण किया जाना चाहिए और यूँ ही नहीं छोड़ दिया जाना चाहिए. आदेश में यह भी कहा गया कि यह रिट याचिका भी मुख्य सचिव को दिये गए प्रत्यावेदन का हिस्सा हो. इससे पूर्व याचिकर्ता की ओर से अधिवक्ता अशोक पाण्डेय ने यह कहा कि उनके मुवक्किल को गलत बात नहीं मानने और गलत कार्य नहीं करने की सजा दी जा रही है.
इस रिट याचिका में अमिताभ ने कई ऐसे दृष्टांत दिये हैं जिनमें उन्हें इन अधिकारियों द्वारा जानबूझ कर व्यक्तिगत वैमनस्य के तहत परेशान किया जाता रहा है. इसमें एक प्रकरण उन्हें स्टडी लीव नहीं देने का है जिसमे कैट, लखनऊ और हाई कोर्ट में आठ मुक़दमे दायर करने के बाद उन्हें आईआईएम लखनऊ में अध्ययन हेतु दो सालों का अध्ययन अवकाश मिल सका था. इस मामले में जहां अन्य आईपीएस अधिकारियों के मामले सौ दिनों के अंदर निस्तारित किये गए थे, वहीँ अमिताभ के प्रकरण में कई सालों तक मामले को लटकाया गया था. दूसरा मामला उनके एसपी गोंडा के रूप में निलंबन से सम्बंधित है, जिसमें इन अधिकारियों ने जानबूझ कर मामले को बहुत लंबे समय तक लंबित रखा था और अंत में चुनाव आयोग द्वारा कुंवर फ़तेह बहादुर को प्रमुख सचिव (गृह) पद से हटाये जाने पर मंजीत सिंह द्वारा प्रमुख सचिव (गृह) के रूप में 01 मई 2008 को न्याय करते हुए प्रकरण को तत्काल समाप्त किया गया था.
तीसरे मामले में इनके एसपी देवरिया के रूप में एक जांच के 25 मई 2007 को समाप्त हो जाने के बाद इन अधिकारियों द्वारा उसे विधि के प्रावधानों के विपरीत दुबारा प्रारम्भ किया गया था जिसे कैट, लखनऊ ने वाद संख्या 177/2010 में 08 सितम्बर 1011 के अपने आदेश में विधि विरुद्ध पाते हुए निरस्त करने का आदेश किया था. चौथे मामले में अमिताभ को उनके विरुद्ध कोई जांच लंबित नहीं होने के बावजूद उनको इन्हीं अधिकारियों की शह पर डीआईजी के पद पर नियमानुसार प्रोन्नति नहीं दी जा रही है. इसी तरह उन्हें एसपी रूल्स और मैनुअल के पद पर जानबूझ कर तैनात किया गया जबकि यह अस्तित्वहीन पद है और यह विभाग शासन द्वारा अभी बना तक नहीं है. इसके साथ कई ऐसे उदाहरण भी दिये गए हैं जहां विजय सिंह ने मुख्यमंत्री के नाम पर उनका आदेश बताते हुए कई आदेश कर दिये और उसमें दूसरे मुख्यमंत्री के आदेशों को परिवर्तित कर दिया, जो पूर्णतया नियमविरुद्ध है.
अमिताभ द्वारा अपने सभी मामलों को सामने रखते हुए उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री को 10 जून 2011 एवं 16 अगस्त 2011, मुख्य सचिव को 04 अक्टूबर 2011, प्रमुख सचिव (गृह) को 15 जून 2009, 05 अगस्त 2011, 16 अगस्त 2011 एवं 31 अक्टूबर 2011 एवं पुलिस महानिदेशक को 25 जुलाई 2011 को कई पत्र प्रेषित कर उनके द्वारा लगाए गए आरोपों की जांच कराने और दोषी पाए गए अधिकारियों को दण्डित करने की मांग की गयी, किन्तु इनमें से किसी पत्र का उत्तर प्रदेश शासन के अधिकारियों द्वारा कोई भी संज्ञान नहीं लिया गया. लिहाजा उन्हें बाध्य हो कर हाई कोर्ट से यह गुहार करनी पड़ी थी.
डॉ. नूतन ठाकुर
कन्वेनर
नेशनल आरटीआई फोरम, लखनऊ





