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भास्कर के पूर्व संपादक एन.रघुरमन ने हिंदी पत्रकारों से किताब लिखवाकर अपने नाम से छपवाई!

इंदौर। साहित्य के क्षेत्र में भी चोरी तो खैर पुरानी बातें हैं, लेकिन 21 वीं सदी में अब साहित्यिक धोखाधड़ी का खेल भी शुरू हो चुका है। मार्केटिंग वाले इस युग में कुछ लोग पैसे के दम पर कंटेंट खरीदकर अपना नाम चस्पा कर देते हैं। ठीक वैसे ही जैसे कई कंपनियां माल नहीं बनाती केवल अपना लेबल लगाकर बाजार में बेच देती है। हाल ही में भास्कर समूह के म.प्र. संपादकीय हेड रहे कथित मैनेजमेंट गुरु ने ऐसा गुरु घंटालपना किया कि लोग उनके शातिरपन की दाद देने लगे।

इंदौर। साहित्य के क्षेत्र में भी चोरी तो खैर पुरानी बातें हैं, लेकिन 21 वीं सदी में अब साहित्यिक धोखाधड़ी का खेल भी शुरू हो चुका है। मार्केटिंग वाले इस युग में कुछ लोग पैसे के दम पर कंटेंट खरीदकर अपना नाम चस्पा कर देते हैं। ठीक वैसे ही जैसे कई कंपनियां माल नहीं बनाती केवल अपना लेबल लगाकर बाजार में बेच देती है। हाल ही में भास्कर समूह के म.प्र. संपादकीय हेड रहे कथित मैनेजमेंट गुरु ने ऐसा गुरु घंटालपना किया कि लोग उनके शातिरपन की दाद देने लगे।

उन्होंने इंदौर के पचास लोगों पर एक किताब अपने नाम से प्रकाशित कराई है, जो उन्होंने कुछ रुपए देकर लिखवाई तो इंदौर के तीन पत्रकारों से और नाम अपना टिका दिया। उस पर से तुर्रा यह कि किताब के विमोचन समारोह में उन्होंने फरमाया कि वे अभी तक अंग्रेजी में तो लिखते रहे हैं, लेकिन हिंदी में पहली बार लिखा है। हकीकत तो यह है कि ये गुरुघंटाल हिंदी का एक पेज भी नहीं लिख सकते। इनका नाम है एन.रघुरमन ।

ये तमिल भाषी हैं और मुंबई में थोड़ी बहुत अंग्रेजी पत्रकारिता करते रहे हैं। सन 2000 के बाद भास्कर भोपाल में संपादक प्लानिंग के तौर पर आए थे और तभी कुछ समय इंदौर संस्करण के स्थानीय संपादक रहे थे। चूंकि इनका हिंदी से दूर-दूर का नाता भी नहीं है तो पूरे समय अग्रवाल सेठ इनसे प्लानिंग ही करवाते रहते थे। 2004 में सेठ को जंचा कर इन्होंने भास्कर में मैनेजमेंट फंडा लिखना शुरू किया, जो अभी-भी चल रहा है। अंग्रेजी साहित्य और अंग्रेजी पत्रकारिता के पाठक बताते हैं कि ये अपने कॉलम में अंग्रेजी की किताबों से फंडे उठाते हैं और हिंदी में दे देते हैं। उसे भी ये हिंदी में खुद नहीं लिखते, बल्कि भास्कर के स्टाफ में से ही अलग-अलग लोग इसका अनुवाद करते हैं। याने साहित्यिक चोरी-धोखाधड़ी से इनका पुराना नाता रहा है।

इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए इन्होंने इंदौर के दो-तीन सेठियों के फाइनेंस करने पर एक किताब की प्लानिंग की और 50 लोगों पर लिखने के लिए अपने दो-तीन चमचे पत्रकारों को राजी कर लिया। पूरी स्क्रिप्ट उन पत्रकारों ने तैयार की और रघुरमन ने प्रत्येक लेख की 4-6 अंग्रेजी की लाइनें अनुवाद कर डाल दी और अपना नाम ऐसे लिख दिया जैसे राजा-रजवाड़े के समय शेर का शिकरा सिपाही करते थे और मरे हुए शेर पर पैर रखकर फोटो राजा खिंचवा लेता था ।

इस किताब में जिन 50 लोगों को लिया गया है, उनमें से कई नाम तो इतने बोगस हैं कि शहर के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में अच्छा काम कन वालों को ये नाम देखकर इस किताब में शरीक होने का अफसोस हुआ। कुख्यात बिल्डर, सरकारी जमीनें कैसे हड़पी जाती हैं-इस तरह की विशेषज्ञता रखने वाले लोग और व्यावसायिक क्षेत्र में भी कम अनुभवी लोगों को इसमें ले लिया गया । उसकी वजह यह बताई गई कि उन लोगों ने रघुरमन को फाइनेंस किया था तो वे उनको कैसे नहीं लेते।

ये वही रघुरमन हैं, जिन्हें भास्कर समूह से कुछ अरसा पहले ही बुरी तरह से बेइज्जत होकर निकलना पड़ा था। इनके काम से नाखुश समूह संपादक, जो इनसे जूनियर भी है, इन्हें खूब लताड़ता था, जिसकी शिकायत करने के लिए रघुरमन ने एमडी सुधीर अग्रवाल को 13 ई-मेल किए लेकिन सुधीर अग्रवाल ने एक का भी जवाब नहीं दिया। भोपाल कार्यालय में हुई अपनी इस फजीहत से रघुरमन के आंसू तक निकल आए, लेकिन सुधीर नहीं पसीजे और इनसे नहीं मिले। तब बेआबरू होकर इन्होंने भास्कर छोडऩा ही ठीक समझा।

इसके बाद ही इंदौर के कुछ धंधेबाज, प्रचार प्रेमी पूंजीपतियों से पैसे लेकर इन्होंने इंदौर के 50 लोगों पर एक किताब निकाल दी और लाख-दो लाख रुपए अंटी कर लिए। भास्कर में अपना फंडा छपने की झांकी दिखाकर दिल्ली के एक प्रकाशक को भी झांसे में लेकर उसे अपनी किताब के प्रकाशन के लिए तैयार कर लिया और इंदौर की एक फाइव स्टार होटल में विमोचन कार्यक्रम रखवाया। स्थानीय अखबार, रेडियो पर खूब विज्ञापन भी प्रकाशक से दिलवाए यह कहकर कि उनके नाम से खूब किताबें बिकेंगी, लेकिन एक किताब भी इंदौर में नहीं बिक पाई है। ताज्जुब है कि वे पत्रकार भी कैसे केवल चंद रुपए लेकर पूरी किताब लिखने को सहमत हो गए। उन्हें भी इस बौद्धिक चोरी, धोखाधड़ी से दूर रहना था। (कानाफूसी)

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए मेल पर आधारित.

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