मेरे उपन्यास 'सोनारगाँव' को आए अभी मुश्किल से एक महीने हुए हैं लेकिन जिस तरह उसे हाथो-हाथ लिया जा रहा है, उससे मैं बेहद उत्साहित हुआ हूँ। इस उपन्यास में जो विषय मैंने लिया है, वह विवादास्पद भी है और चुनौती भरा भी। इसीलिए अभी तक मिली प्रतिक्रियाओं को अच्छी-बुरी कहने के बजाय कहूँगा कि वे उत्तेजना से भरी रही हैं। बहुत से लोगों ने ये सवाल पूछा है कि मैंने रेड लाइट एरिया और यौनकर्मियों के बीच एड्स संबंधी जागरूकता अभियान को ही विषय क्यों बनाया। लिहाज़ा, मैं चाहता हूँ कि इस उपन्यास को लिखने के बारे में अपने विचार अपनी बिरादरी से साझा करूँ।
दरअसल, टेलीविज़न की दुनिया में काम करते हुए और चैनलों के लिए कहानियाँ ढूँढ़ते-कहते कई बार ऐसी घटनाओं से सामना हुआ जो दिलचस्प और हैरत में डाल देने वाली थीं। लेकिन टेलिविज़न की अपनी मजबूरियाँ हैं, सीमाएं भी हैं। लिहाज़ा उन्हें सुनाना या दिखाना मुमकिन नहीं हुआ। खास तौर से वे कहानियां जो सेक्सुअलिटी और यौन कर्मियों से जुड़े सब्जेक्ट पर हों।
ऐसी ही एक कहानी थी सोनार गाँव की। टेलीविज़न के लिए उसका कोई उपयोग नहीं हो सका, लेकिन सोनार गाँव की भ्रूण हत्या नहीं हुई । वह मेरे ज़हन में बस गई और मेरी सोचने की शक्ति को बेसाख्ता अपनी खुराक बनाकर बढ़ती रही। धीरे धीरे उसके दिल की धड़कनें सुनायी देने लगीं, फिर एक शरीर सा उभरा, नाक नक्श भी दिखने लगे। उसे जन्म देना एक मजबूरी सी हो गई थी। जीने मरने का सवाल था, भला क्या करता !
सोनार गाँव की कहानी का बीज कुछ उस वक़्त मेरे ज़हन में आया जब मैं दुर्बार महिला समन्वय कमिटी के कुछ सदस्यों से मिला। इनमें समाज सेवक, डाक्टर, समाज शास्त्री, और यौन कर्मी शामिल थे। ये छोटी सी मुलाक़ात लगभग दस साल पहले हुई थी। तभी से मेरे दिमाग में तरह तरह के चरित्र, पात्र और अजीबोगरीब मंज़र उभरने लगे थे। सामजिक चेतना, स्थापित नैतिकता (मोरालिटी) और अपनी ही सेक्सुअलिटी से दिमाग के अंदर मची अंतरकलह से किरदार और मंज़र बनते चले गए। और फिर किसी भी टीवी कर्मी या पत्रकार या फिल्म मेकर की तरह इस कहानी को कहने की लालसा ज़ोर पकड़ती चली गयी।
टीवी के लिए कंटेंट बनाना एक सामूहिक कोशिश होती है। भले ही पिछले कुछ सालों में कंटेंट बदला है और चैनलों की तादाद भी अनगिनत हो चली है। फिर भी एकल या निजी सोच के लिए इसमें जगह नहीं है। प्रगतिशील कंटेंट को भी बाज़ार की सच्चाई से कदम मिलाना पड़ता है। हालाँकि यह बात कमर्शियल प्रसारण पर भी लागू होती है फिर भी मुझे लगा की पाठक दर्शकों से ज्यादा धीरज रखते हैं। लिहाज़ा लिख डाली। लिखने का तजुर्बा खुद को मथने जैसा था। अपने अन्दर के सबसे अँधेरे और डरावने कोनों में घुसकर कहानी को बाहर लाना था। लिखने का तरीका भी टीवी की शैली से अलग होना था। और चूँकि उपन्यास यौनता, यौनकर्मियों और HIV AIDS के विषय में है तो इसे अध्यात्मिक थीसिस ना बनाकर पठनीय बनाने की चुनौती भी थी।

इंसान की यौनता या सेक्सुअलिटी मुझे हैरत में डाल देती है। ये बहुत दिलचस्प सब्जेक्ट है। सेक्सुअलिटी हमें सृजनशीलता के चरम पर भी ले जाती है और बर्बरता की गहराई भी नपवाती है। हालाँकि हमारे ऐतिहासिक साहित्य और कलाकृतियों में इसको बेहद ख़ूबसूरती से उकेरा गया है। फिर भी आज के समाज में इसकी चर्चा दबे-छुपे अंदाज़ में ही होती है। इस मामले में हमारा समाज बुरी तरह कन्फ्यूज्ड है। कई सामाजिक समस्याओं जैसे वेश्यावृत्ति, बलात्कार, समलैंगिकता और एड्स जैसी समस्याओं को समझने के लिए कहीं ना कहीं सेक्सुअलिटी की गुत्थियों को समझना होगा।
लेकिन सोनार गाँव लिखने की सबसे ज्यादा प्रेरणा मुझे इस उपन्यास के पात्रों से ही मिली। ये काल्पनिक हैं, लेकिन मेरे गहरे दोस्त हैं। मैंने महीनों इनके साथ गुज़ारे हैं — मैं हैरत से इनको खुद पर ज़ाहिर होते महसूस करता रहा। कभी ये मुझसे मज़ाक करते, मेरी बेबसी पर हँसते और कभी खुद ब खुद मुझे आज़ाद करके एक कहानी के रूप में ढलते जाते।
आह वो आज़ादी जो टीवी में नहीं है, हो भी नहीं सकती और जिसकी तलाश में मैं डाक्टरों की भाषा में उत्कंठा का मरीज़ हूँ। मेरा उपन्यास सोनारगाँव अँग्रेजी में है। मेरे हिसाब से यदि इसका हिंदी अनुवाद असंभव नहीं तो, मुश्किल ज़रूर होगा, क्योंकि सेक्चुअलिटी को बयान करने के लिए जिस भाषा का इस्तेमाल मैंने किया है, मुझे डर है कि वह हिंदी में जाते ही अश्लील न करार दी जाए। इसलिए मैं हिंदी के पाठकों से गुज़ारिश करूँगा कि वे इसे ज़रूर पढ़ें, उनकी प्रतिक्रिया जानकर मुझे बहुत खुशी भी होगी।

नीलेंदु सेन टेलीविज़न की दुनिया की जानी-मानी हस्ती हैं। वे आज तक और आईबीएन-7 के प्रोग्रामिंग हेड रह चुके हैं। वे दूरदर्शन और देश-विदेश के कई बड़े चैनलों के लिए विश्व स्तरीय डॉक्यूमेंट्री एवं कार्यक्रमों का निर्देशन कर चुके हैं।






