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श्रीकांत जी से मेरा व्यक्तिगत परिचय तब हुआ जब मैं उत्तरांचल प्रान्त प्रचार प्रमुख बना

: श्रद्धांजलि : श्रीकांत जी के निधन का समाचार सुनकर मन को गहरा आघात पहुंचा। अभी 22 दिसंबर 2012 को ही उनसे प्रयाग में हिन्दुस्थान समाचार के निदेशक मंडल की बैठक में मुलाकात हुई थी। उस मुलाकात की अनुभूति अभी बिल्कुल ताजी है। सब कुछ सामान्य लग रहा था, हां थोड़ी अस्वस्थता दिख रही थी। लगा कि सर्दी के मौसम तथा अधिक आयु के कारण कुछ खांसी जुकाम जैसी हल्की फुल्की बात है। बैठक में पूरे दिन सभी सत्रों में पूरी सक्रियता से उन्होंने भाग लिया तथा सभी आए हुए कार्यकर्ताओं से व्यक्तिगत वार्ता भी करते रहे।

: श्रद्धांजलि : श्रीकांत जी के निधन का समाचार सुनकर मन को गहरा आघात पहुंचा। अभी 22 दिसंबर 2012 को ही उनसे प्रयाग में हिन्दुस्थान समाचार के निदेशक मंडल की बैठक में मुलाकात हुई थी। उस मुलाकात की अनुभूति अभी बिल्कुल ताजी है। सब कुछ सामान्य लग रहा था, हां थोड़ी अस्वस्थता दिख रही थी। लगा कि सर्दी के मौसम तथा अधिक आयु के कारण कुछ खांसी जुकाम जैसी हल्की फुल्की बात है। बैठक में पूरे दिन सभी सत्रों में पूरी सक्रियता से उन्होंने भाग लिया तथा सभी आए हुए कार्यकर्ताओं से व्यक्तिगत वार्ता भी करते रहे।

श्रीकांत जी से मेरा व्यक्तिगत परिचय सन-2000 से था, जब से मैं उत्तरांचल प्रान्त प्रचार प्रमुख बना। नया प्रान्त बनने के कारण विश्व संवाद केन्द्र व जागरण पत्र और प्रचार विभाग की सभी गतिविधियों को मैंने उनके ही मार्गदर्शन में प्रारंभ किया। विश्व संवाद केन्द्र उत्तरांचल का उद्घाटन उनके ही कर-कमलों से 2001 में हुआ। प्रचार विभाग की अखिल भारतीय बैठक में सदैव उनका सान्निध्य मार्गदर्शन मिलता रहा। बाद में जब उन्होंने हिन्दुस्थान समाचार के पुनरोत्थान का संकल्प लिया तब भी उत्तरांचल में हिन्दुस्थान समाचार का कार्य करने का दायित्व उन्होंने मुझे ही सौंपा। शनैः शनैः हिन्दुस्थान समाचार जिस प्रकार अखिल भारतीय स्तर पर आकार लेने लगा उसी प्रकार उत्तरांचल में भी गति पकड़ने लगा। हिन्दुस्थान समाचार का दायित्व संभालने के पश्चात उनसे निकटता और बढ़ गई। अखिल भारतीय स्तर पर निदेशक मंडल का गठन करते समय उन्होंने मेरा नाम निदेशक मंडल के सदस्य के नाते तय कर दिया यद्यपि न तो मेरी पात्रता थी और न ही इच्छा।

एक सामान्य नियम है कि जब तक किसी व्यक्ति से सहज स्वाभाविक रूप से मिलना-जुलना संपर्क संबंध रहता है तब तक व्यक्ति की विशेषता भी सामान्य सी लगती है, परन्तु व्यक्ति के चले जाने के बाद सामान्य सी लगने वाली विशेषताएं असामान्य हो जाती हैं। मानस पटल पर व्यक्ति के साथ बिताए छण संस्मरण के रूप में उभरने लगते हैं। श्रीकांत जी का पिछले वर्ष अमृत महोत्सव दिल्ली में हिन्दुस्थान समाचार की ओर से मनाया गया था तो सभी ने उनकी दीर्घायु होने की कामना की थी स्वार्थ के कारण। हम सबका स्वार्थ था कि श्रीकांत जी को ईश्वर लंबी आयु दे ताकि हिन्दुस्थान समाचार के पुनरोत्थान की प्रक्रिया पूर्ण होकर यौवनावस्था तक पहुंच जाए। श्रीकांत जी के पास हिन्दुस्थान समाचार के अतिरिक्त भी कई संगठनों का पालक और अनेक जिम्मेदारियां थी, वह सब यशस्वी हो, उनका मार्गदर्शन चिरकाल तक मिलता रहे यही हम सबकी सामूहिक इच्छा थी।

श्रीकांत जी ने 50 वर्ष से अधिक राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ के प्रचारक के रूप में जीवन जिया। उन्होंने सदैव चुनौतियों से भरा दायित्व संभाला। असम संघ दृष्टि से बहुत दुर्गम क्षेत्र है, चुनौतियों से भरा है और अनेक समस्याओं से ग्रसित है। ऐसे क्षेत्र में वे विभाग प्रचारक और प्रान्त प्रचारक के दायित्व का निर्वहन किया। 25 वर्ष का एक लंबा कालखंड उन्होंने विभिन्न दायित्वों को संभालते हुए असम में बिताया। असम में विद्या भारती के विस्तार, असम आन्दोलन (1979-85) को ठीक दिशा देने तथा संघ कार्य के विस्तार आदि सभी कठिन कार्यों में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही।

1987 से 1996 तक बाला साहब देवरस तृतीय सरसंघचालक के निजि सहायक के रूप में भी उनका कार्यकाल उत्कृष्ठ रहा। बाला साहब के सरसंघचालक के दायित्व से मुक्त होने पर भी उनके जीवनपर्यन्त साथ रहे यह उनकी अटूट निष्ठा का परिचायक है। 1994 में संघ में दो नया आयाम संपर्क और प्रचार विभाग शुरू हुआ। प्रचार विभाग बिल्कुल नया काम संघ की प्रवृत्ति से भिन्न तथा पूर्णतः तकनीकि कार्य है। श्रीकांत जी 1997 में अ.भा. प्रचार प्रमुख घोषित हुए। उन्होंने प्रचार विभाग की कल्पना को स्पष्ट किया, प्रचार विभाग के तंत्र को खड़ा किया प्रचार विभागान्तर्गत विभिन्न गतिविधियां जागरण पत्र आदि की कार्य योजना तैयार की तथा पूरे देश में प्रचार विभाग का नेटवर्क खड़ा किया। ये सब कार्य परंपरागत कार्य नहीं थे बल्कि चुनौतीपूर्ण कार्य थे। शून्य से सृष्टि निर्माण करने जैसा था।

सबसे बढ़ कर दुरूह कार्य उन्होंने किया मृतप्राय हिन्दुस्थान समाचार को पुनर्जीवित करने का। हिन्दुस्थान समाचार कभी देश का प्रथम क्रमांक का समाचार संवाद समिति थी। हिन्दुस्थान समाचार का ही गौरव था कि इसके पास हिन्दी टेलीप्रिंटर था। 1975 के आपात काल के दौरान मीडिया का गला घोंटा गया। जिसका पहला शिकार हिन्दुस्थान समाचार बना। राष्ट्रीय विचार की प्रमुख न्यूज एजेंसी होने के कारण प्रजातंत्र का गला घोंट कर निरंकुश तानाशाही स्थापित करने वाली प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी ने समस्त न्यूज एजेंसी की स्वतंत्रता को समाप्त कर सभी को एक कर एक नई सरकारी न्यूज एजेंसी (समाचार) गठित की। हिन्दुस्थान समाचार का संपूर्ण तंत्र ध्वस्त हो गया था। किसी को भी स्वप्न में भी आशा नहीं थी कि हिन्दुस्थान समाचार पुनः खड़ा होगा। कुछ भी नहीं बचा था परंतु श्रीकांत जी की जिद चुनौतियों से खेलने का शौक, हृदय में राष्ट्रीयता की आग के कारण केवल 5-6 वर्षों में ही हिन्दुस्थान समाचार का तंत्र केवल भारत में ही नहीं नेपाल, मॉरीशस और थाईलैंड में भी खड़ा हो गया।

काश वे कुछ वर्ष भी और रहते हिन्दुस्थान समाचार न केवल पुराने वैभव को प्राप्त करता बल्कि नई ऊचांइयों को छूता। न केवल हिन्दुस्थान समाचार की चिंता उन्होंने किया बल्कि समस्त पत्रकार जगत की भी चिंता की। उन्हीं की प्रेरणा से 2005 में राष्ट्रीय संपादक परिषद का गठन भोपाल में हुआ, जिसमें देश के सभी राष्ट्रीवादी पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों को एक मंच पर लाने और पत्रकार जगत में राष्ट्रवाद स्थापित हो यह उद्देश्य था। पत्रकारों की व्यक्तिगत चिंता तथा अच्छे पत्रकार, लेखक व छायाकारों को सम्मान मिले इस दृष्टि से उन्होंने एक पत्रकारिता कल्याण न्यास की भी स्थापना किया। न्यास की ओर से प्रतिवर्ष तीन पुरस्कार महिला पत्रकारिता के क्षेत्र में आशा रानी वोहरा पुरस्कार, छाया चित्र पत्रकारिता में दादा साहब आप्टे पुरस्कार और सामान्य पत्रकारिता में बापू राव लेले पुरस्कार दिया जाता है।

हिन्दुस्थान समाचार को हर प्रांत में खड़ा करने तथा सभी भारतीय भाषाओं में समाचार संकलन तथा संप्रेषण की तकनीक खड़ा करने हेतु प्रचुर मात्रा में धन की आवश्यकता थी और अभी भी है, इस नाते उनका ध्यान सदैव धन संग्रह पर रहता था। कभी कभी उनके साथ मुझे जब किसी से मिलने जाना होता था और वे मुख्य रूप से धन की बात करते थे तो मेरे मन में लगता था, भाई साहब केवल पैसे की बात करते हैं। उनके असामयिक निधन से केवल संघ विचार परिवार को ही नहीं बल्कि मीडिया जगत में भी एक रिक्तता निर्माण हुई है। सभी को मिलकर उस रिक्तता को भरना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। उनके इस तरह से अचानक जाने पर किसी शायर की दो पंक्तियां याद आती है कि बड़े गौर से सुन रहा था जमाना तुम्ही सो गए दास्तां कहते-कहते।

लेखक लक्ष्मी प्रसाद जायसवाल वरिष्ठ अधिवक्ता व समाजसेवी है.

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