भड़ास पर ही यह खबर पढ़ी कि दिलीप मंडल साहब इंडिया टुडे मैग्जीन में जा रहे हैं. सुनकर विश्वास नहीं हुआ. पर लगा कि अरुण पुरी जिस तरह के फैसले आजकल ले रहे हैं तो उसमें अगर उन्होंने यह भी फैसला ले लिया है तो कोई गलत नहीं किया है. कहावत है न कि दिया बुझने से पहले बड़ी तेज भभकता-धधकता है. अरुण पुरी और उनके ग्रुप का हाल यही है. गल्तियां सुधारने के नाम पर यह ग्रुप और ज्यादा बड़ी गल्तियां करते जा रहा है.
वह चाहे चैनल हो या मैग्जीन, हर जगह ऐसे लोगों को लाकर बड़े पदों पर बिठाया जा रहा है जो पिटे हुए मोहरे हैं, एकांगी हैं, पत्रकारिता से परे हैं. फिलहाल दिलीप मंडल की बात करेंगे. यह साहब काफी समय से बेरोजगार हैं. एक खास किस्म के वामपंथी गैंग को पकड़कर ये साहब आईआईएमसी में घुस गए. बच्चों को ये क्या पढ़ाते रहे होंगे, इसका अंदाजा उनके फेसबुकी स्टेटस आदि से चल जाता है. हर वक्त सिर्फ दलित दलित दलित दलित कहने करने लिखने बोलने वाला यह शख्स वाकई नार्मल इंसान है या नहीं, इसका पता लगाया जाना चाहिए.
मैं दलितों का कतई विरोधी नहीं हूं. दलितों के प्रति जो ऐतिहासिक गल्तियां समाज से हुई है, उसका परिष्कार, उसमें सुधार अनिवार्य तौर पर हो रहा है. पर यह व्यक्ति जिस तरीके से हर चीज में दलित एंगल खोज लेता है, और फिर उसी एंगल का डमरू बजाता है, उससे तो यही लगता है कि उन्होंने अपने करियर का पंचलाइन 'रे मन, बस दलित दलित भजकर भजाए रहो' बना लिया है. अगर ये दिलीप मंडल भाईसाहब इंडिया टुडे हिंदी के कार्यकारी संपादक हो रहे हैं तो फिर हम सभी कल्पना कर सकते हैं कि इस मैग्जीन में अब कैसी कैसी खबरें छपा करेंगी. कुछ मुद्दे ऐसे होते हैं जिन पर लगातार उत्तेजक बहस की गुंजाइस रहती है… जैसे हिंदू-मुस्लिम, सवर्ण-दलित, मार्क्सवाद-हिंदूवाद, स्त्री-पुरुष… आदि.
कुछ लोग इन स्थायी उत्तेजना वाले विषयों को छेड़ छेड़ कर मुफ्त में अच्छी खासी टीआरपी हासिल करते रहते हैं. दिलीप मंडल उन्हीं में से हैं. दिलीप मंडल दलितों के मुद्दे पर होने वाली किसी बहस में दलितों की तरफ से एक प्रवक्ता तो हो सकते हैं लेकिन उनसे अगर किसी मैग्जीन के निष्पक्ष संपादक होने की उम्मीद की जाए तो गलत होगा. आखिरी बात, टाइम्स आफ इंडिया समेत कई बड़े कारपोरेट मीडिया घरानों में काम कर चुके दिलीप मंडल पानी पी पी करके कारपोरेट मीडिया को गरियाते हैं.
पर उनकी ऐसी क्या मजबूरी है कि वह उसी कारपोरेट मीडिया के साथ गलबहियां डालकर हमबिस्तर हो जाते हैं. उनसे हर कोई एक एक्टिविस्ट बने रहने की तमन्ना करता रहता है लेकिन दिलीप मंडल जी हैं कि दूसरों को तो क्रांति के लिए भड़काएंगे और खुद किसी कारपोरेट ग्रुप में चिपककर महीने में लाखों की सेलरी उठाएंगे. इस विरोधाभाष को क्या कहा जाए? मैं दिलीप मंडल को दलित के मुद्दे पर अच्छा एक्टिविस्ट मानता हूं लेकिन उन्हें एक संपूर्ण संपादक के रूप में कतई नहीं देख पाता. इस कारण मैं अभी से यह ऐलान कर रहा हूं कि दिलीप मंडल के इंडिया टुडे ज्वाइन करते ही मैं इंडिया टुडे को पढ़ना बंद कर दूंगा. हालांकि मैं यहां कह रहा हूं कि मैं न तो दलित विरोधी हूं और न कारपोरेट मीडिया का समर्थक पर मेरे इस लिखे को अगर दिलीप मंडल अपने दलित कार्ड के हिसाब से भुना ले जाएं तो मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी क्योंकि वे यही काम लंबे समय से करते आ रहे हैं.
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. लेखक ने अपना नाम गोपनीय रखने का अनुरोध किया है.





