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कोई औरत इतनी नीच न होगी कि चर्चा के लिए रेप का आरोप लगाए

: साध्‍वी चिदर्पिता एवं बीपी गौतम से बातचीत : साध्वी चिदर्पिता द्वारा भारत सरकार के पूर्व गृह राज्य मंत्री और कथित धार्मिक गुरु स्वामी चिन्मयानन्द के विरुद्ध उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले में बलात्कार, बलपूर्वक गर्भपात, गंभीर घरेलू हिंसा आदि के सम्बन्ध में कराया गया एफआईआर एक अत्यंत शौर्य और साहस का काम है. उन्होंने अपने देश में साधुगिरी के नाम किये जा रहे पापकर्मों को सामने लाया है. शायद ऐसे बहुत सारे फर्जी धर्मगुरुओं के अन्य मामले इस देश में हों. प्रस्तुत है इस विषय पर उनसे और उनका मजबूती से साथ दे रहे उनके जुझारू पत्रकार पति बीपी गौतम से पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्त्री डॉ. नूतन ठाकुर की बातची…

: साध्‍वी चिदर्पिता एवं बीपी गौतम से बातचीत : साध्वी चिदर्पिता द्वारा भारत सरकार के पूर्व गृह राज्य मंत्री और कथित धार्मिक गुरु स्वामी चिन्मयानन्द के विरुद्ध उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले में बलात्कार, बलपूर्वक गर्भपात, गंभीर घरेलू हिंसा आदि के सम्बन्ध में कराया गया एफआईआर एक अत्यंत शौर्य और साहस का काम है. उन्होंने अपने देश में साधुगिरी के नाम किये जा रहे पापकर्मों को सामने लाया है. शायद ऐसे बहुत सारे फर्जी धर्मगुरुओं के अन्य मामले इस देश में हों. प्रस्तुत है इस विषय पर उनसे और उनका मजबूती से साथ दे रहे उनके जुझारू पत्रकार पति बीपी गौतम से पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्त्री डॉ. नूतन ठाकुर की बातची…

प्र- आप स्वामी चिन्मयानन्द के संपर्क में कैसे आयीं?

उ- मेरी प्रारम्भ से ही आध्यात्मिक और राजनैतिक क्षेत्रों में रूचि थी. स्वामी जी में ये दोनों गुण थे. हमारा परिवार उनके संपर्क में था, मैं भी उनके इन गुणों के प्रति आकर्षित हुई. मुझे उनकी बौद्धिकता अच्छी लगती थी. वो अन्य आडम्बरी संन्यासियों जैसे नहीं लगते थे. मैं जब संपर्क में आई तो कुछ दिनों बाद उन्होंने मुझे कहा कि तुम मुझे बाबा बुलाओ. बाबा का अर्थ होता है पिता या दादा. यह बात सुन कर घर वालों का भी उन पर विश्वास बढ़ गया. वैसे भी मैं इक्कीस साल की हो चुकी थी और स्वामीजी 55-58 साल के रहे होंगे. इसीलिए उनके प्रति किसी प्रकार का कोई अन्य शक करने की गुंजाइश नहीं थी. इस करण घर वाले भी मना नहीं करते थे.

इसी बीच स्वामीजी सांसद का चुनाव हार गए और उन्हें दिल्ली छोड़ने की जरूरत महसूस हुई. उन्होंने फैसला किया कि वे हरिद्वार में रहेंगे. तब मैंने भी संन्यासिनी बनने की इच्छा जाहिर की. इससे पूर्व स्वयं स्वामीजी भी मुझे संन्यासी बनने की सलाह दिया करते थे. उनका कहना था कि अपने लिए तो सभी जीते हैं, तुम्हे एक आध्यात्मिक व्यक्ति और एक राजनैतिक व्यक्ति के रूप में देश और समाज की सेवा करनी होगी. मैं उनकी बात सुन कर उसके प्रभाव में रहती थी. मैंने परिवार को यह बात बताई तो वे लोग शुरू में इसके लिए सहमत नहीं हो रहे थे पर जब स्वामीजी ने समझाया कि ये सुरक्षित रहेगी, सम्मानपूर्वक रहेगी और समाज में मुझसे भी अधिक इसका नाम–सम्मान होगा तो मेरी इच्छा देखते हुए मेरे परिवार वाले मजबूरन इस हेतु सहमत हो गए.

प्र- इसके आगे की क्या घटना रही?

उ- हरिद्वार जाने पर मैंने देखा कि एक छोटा बच्चा था जिसकी शक्ल-सूरत बिलकुल स्वामीजी की तरह थी. फिर एक दिन उनके ड्रावर में शराब की बोतल दिखी. इस पर मुझसे रहा नहीं गया और मैंने स्वामीजी से जब इस बारे में पूछा तो उन्होंने यही कहा कि मैं यहाँ अकसर रहता नहीं हूँ, किसी ने रख दी होगी. चूँकि मुझे स्वामीजी पर अटूट आस्था थी इसीलिए उत्तर मिलते ही मैं उन पर विश्वास कर लेती थी और हमेशा उन्हें ही सही मानती थी. धीरे-धीरे ऐसी स्थितियां आती गयीं जब उन पर स्वतः ही विश्वास कम होता गया. एक दिन जबरदस्ती उन्होंने मुझे पकड़ा तो मैं बेतहाशा रोने लगी. उन्होंने कहा कि मैं तो अपनी बच्ची की तरह प्यार कर रहा था, तुमने क्या समझ लिया. इस पर मैं आश्वस्त हो गयी कि शायद पिता का प्यार ऐसा होता हो. वहाँ अन्य लड़कियां भी मेरी उम्र की ही थीं लेकिन स्वामीजी की आँख में उनके प्रति जो भाव देखती उससे मुझे संदेह बढ़ता गया.

चूँकि हरिद्वार में कई लोगों का आना-जाना होता था, इसीलिए स्वामीजी मुझे शाहजहांपुर ले आये. वहाँ वह घटना घटी जिसके सम्बन्ध में मैंने अपने एफआईआर में लिखा है. एक बार, दो बार, फिर कई बार मेरे साथ ऐसा ही हुआ. मैं अपनी मर्जी से अपना परिवार छोड़ आई थी, इसीलिए कहाँ जाती? मैं चुप रही. समझ में नहीं आता यह क्या हो रहा है. शुरू से संस्कारी रही थी, मैं उनसे अपने संबंधों को ले कर प्रश्न करती तो वे इसे दीक्षा बताते. वे तो अजीब किस्म की दीक्षा देते. एक दिन अमावस्या की मध्य रात बारह बजे उन्होंने विचित्र वेश-भूषा में अजीब सी तंत्र-पूजा की, जिससे मैं उन्हें इस रूप में देख कर बिलकुल डर गयी. इस तरह वे हमारे संबंधों को अपनी मर्जी के मुताबिक़ कभी शादी कहते तो कभी दीक्षा.

इस सम्बन्ध के दौरान मुझे गर्भ ठहर गया. मेरा मन नहीं मान रहा था. मैंने उन्हें पूरी बात बताई. उन्होंने मुझे कहा कि तुम सोच लो पर गर्भपात कराना ही श्रेयस्कर रहेगा. मैं रोती रही और कोई जवाब नहीं दिया. जबरदस्ती मेरा गर्भपात कराया. फिर पूछने पर बहुत ही बेदर्दी से मारा-पीटा. मेरे शरीर पर बैठ गए और मुझे जान से मारने की धमकी दी. मैं चुप हो गयी. इसके बाद मेरा जीवन अजीब सा हो गया. मैं गाड़ी से चलती, आलीशान जीवन जीती पर मैं कतई आजाद नहीं थी. हमेशा लगता जैसे पिंजरे में कैद हूँ. जहाँ भी मैं जाती मेरे साथ स्वामीजी के दो चार लोग संग लगे रहते. मेरी जिंदगी गुलाम हो गयी थी.

प्र- गौतम जी से कैसे मुलाकात हुई?

उ- समय के साथ स्वामीजी की मुझमें रूचि कम होती गयी. वे मेरी तरफ बहुत कम ध्यान देने लगे थे. उपरी मन से वे मुझे अक्सर कहते कि अब तुम यहाँ से चली जाओ. मैं पूछती कि मैं अब कहाँ जा सकती हूँ तो वे कहते कि जहाँ मन हो वहाँ जाओ. लेकिन चूँकि मेरा कोई दूसरा ठिकाना नहीं था इसीलिए मैं मजबूरन वहीँ बनी रही. स्वामीजी को भी धीरे-धीरे विश्वास हो गया कि मैं अब कहीं नहीं जाउंगी. जब कभी भी मैं उन्हें संन्यास के लिए कहती तो वे कहते मुझसे ही संन्यास लेने की क्या मजबूरी है, किसी से भी संन्यास ले लो. जब मैं उन्हीं के आश्रम में रह रही थी तो मैं भला किसी दूसरे से संन्यास दीक्षा कैसे ले पाती.

उन्होंने जल्दी ही मुझे अपने आश्रम में स्थित स्कूल का प्रिंसिपल बन दिया. इनके दो कारण थे. एक तो मैं प्रतिभाशाली थी जो बात प्रमाणित थी. दूसरे, अन्य लोग भी यह मांग करते कि जब ऐरे-गैरे लोगों को प्राचार्य बनाया जा रहा है तो साध्वीजी दिल्ली विश्वविद्यालय की पढ़ी हैं, वे यह काम क्यों नहीं कर सकतीं. अंत में हार कर उन्होंने मुझे प्राचार्य बना दिया और प्रिंसिपल बनाते समय खुश हो कर यह कहा कि स्कूल का जो होगा सो होगा, यह है कि तुम घर पर ही रहोगी. वैसे भी मैं एक कमरे में रहती और खाने के अलावा मेरा कोई खर्च नहीं था. स्वामीजी मुझे मेरे नाम का मोबाइल नहीं देते, अपने नाम का सिम देते थे. मैं जानती थी कि वे गृह राज्य मंत्री रहे हैं, बहुत ही ताकतवर आदमी हैं, लिहाजा मैं भी कोई और ठिकाना नहीं होने के नाते घुट-घुट कर वहीँ आश्रम में पड़ी रहती.

प्राचार्य के रूप में कुछ स्वतंत्रता हुई. मुझसे मिलने कई बच्चों के माँ-बाप आने लगे जिसके कारण हर समय मुझ पर निगाह रखना उनके लिए उतना संभव नहीं रह गया था. इसी बीच मैंने फेसबुक पर घरेलू हिंसा विषयक कुछ पोस्ट डाले थे. सब लोग उतने संवेदनशील नहीं होते पर मुझे सौभाग्य से गौतमजी जैसे आदमी से संपर्क हुआ. मैंने लिखा कि वे दिन लद गए जब मैना पिंजरे में रोती थी. साथ ही यह भी लिखा- “सारा जहाँ पिंजरे में कैद नहीं.” गौतमजी को कुछ-कुछ समझ आने लगा था. उन्होंने एक स्टोरी डाली जो एक परी के एक राक्षस के कैद में रहने से सम्बंधित थी. उन्हें समझ में आ गया था. उन्होंने किसी तरह नंबर ले कर मुझसे बात की. मैं समझ नहीं पा रही थी कि क्या मामला था. यह भी कि मुझे उन पर विश्वास करना चाहिए या नहीं. धीरे-धीरे जब मेरा उन पर विश्वास बढ़ गया तो मैंने अपने बारे में सारी बात उन्हें बताई. मेरी कहानी सुनने के बाद उन्होंने तुरंत शादी की बात रखी.

गौतम जी ईमानदार व्यक्ति थे, मानसिक और शारीरिक तौर पर स्वतंत्र. वे जब कुछ करते हैं तो अपनी मर्जी से करते हैं. गौतमजी के पत्रकार होने के नाते उनके भी तमाम संपर्क हैं यह बात स्वामीजी भी जानते हैं. आज पत्रकारों के पास जितनी ताकत है उतनी किसी के पास नहीं, मेरा सौभाग्य है कि मैंने जिसे चुना वह मानसिक एवं शारीरिक रूप से शक्तिशाली निकला. मैं शांति से अपनी नयी जिंदगी जीना चाहती थी पर इस बीच भी स्वामीजी मुझे अपनी बीती बात किसी को न बताने के लिए धमकाते रहे. चूँकि हमारा नया रिश्ता ईमानदारी पर आधारित था इसीलिए स्वामीजी ज्यादा कुछ नहीं कर सके.

प्र- पुलिस की इस पूरे प्रकरण में कैसी भूमिका रही?

उ- पुलिस का एटीट्यूड बहुत ही अच्छा था. मैंने अपनी शिकायत डाली और एसपी (सिटी) के पास मुझे बुलाया गया. मैं अपनी बात बोलती रही और एसपी (सिटी) उसे लिखते रहे. एसपी रमित शर्मा ने भी बहुत ही अच्छा व्यवहार किया. मुझे सभी लोगों ने कहा था कि पुलिस एफआईआर दर्ज नहीं करेगी, कोर्ट से ही करानी पड़ेगी. लेकिन मुझे बहुत ही सुखद आश्चर्य हुआ कि शाहजहांपुर पुलिस और वहाँ के एसपी रमित शर्मा ने लगातार बहुत ही ज्यादा को-ओपरेट किया.

प्र- इस मामले में आप पर देरी करने, राजनैतिक महत्वाकांक्षा से ग्रसित होने जैसे गंभीर आरोप भी लगे हैं. आपका इन पर क्या कहना है?

उ- देरी का कारण तो मैंने ऊपर विस्तार से बताया है. पॉलिटिकल एम्बिशन कैसे पूरा हो रहा है ये तो स्वामीजी ही बेहतर बता पायेंगे. मुझे तो समझ में नहीं आ रहा. मैं एफआईआर के बाद इतनी मानसिक उलझन में हूँ. समझ नहीं पा रही ऐसे में क्षेत्र में जा कर चुनाव प्रचार भी कैसे कर पाउंगी. यदि इस पूरे प्रकरण में किसी का भी नुकसान हुआ है, वह मेरा ही हुआ है.

प्र. बी पी गौतम जी, आप बताएं एफआईआर लिखाने में देरी और राजनैतिक महत्वाकांक्षा के आरोप के पीछे क्या सच है.

उ- एक व्यक्ति लगातार इनका शोषण कर रहा था, शोषण इसीलिए कर रहा था कि उसे लगता था कि यह कहाँ जायेगी, इसके पास आखिर दूसरा कौन सा ठिकाना है. इस शोषण के बाद भी वह शेष दुनिया से संरक्षित थी और इसी कारण यह सब चुपचाप सह रही थी. लोग कह रहे हैं कि इतने सालों बाद क्यों आई? पहले किसी माध्यम से क्यों नहीं कहा? ई-मेल, फेसबुक, किसी सार्वजनिक मंच कहीं कह सकती थीं. यह सही है कि वह पहले बोल सकती थी पर मूल प्रश्न यह था कि यदि वह बोल देती तो जाती कहाँ. अब जब उसे ठिकाना मिल गया, एक मजबूत संबल मिल गया है तो वह बोल रही है, इस सम्बन्ध में एफआईआर तक कराया है.

इसी तरह लोग कहते हैं कि शादी के दो-ढाई महीने बाद क्यों एफआईआर कराई? अरे, एक व्यक्ति ने नया जीवन शुरू किया, तो महीने दो-महीने तो उसे नया जीवन जीने दोगे. सजा दिलाने, जेल पहुँचाने. कानूनी कार्रवाई करने की मंशा तो शुरू से थी पर शादी के बाद कुछ समय तो स्वाभाविक रूप से लगता. जहाँ तक पोलिटिकल एम्बिशन की बात है, मैं नहीं समझता कि कोई औरत इतनी नीच होगी कि कुख्यात प्रसिद्धि के लिए ऐसा करे. वह कुछ भी और करेगी पर अपने चरित्र का हनन तो नहीं कराएगी. यह तो कल्पना के परे है. लगातार कई सालों तक चिन्मयानन्द ने उनका शोषण किया पर जब भी वे शादी की बात करतीं तो वे कहने लगते कि संत-समाज यह सब स्वीकार नहीं करेगा. कहते कि सरस्वती संप्रदाय में संत विवाह नहीं कर सकता. यह ठीक है, व्यभिचार कर सकता है, बच्चे पैदा कर सकता है पर शादी नहीं कर सकता. लाल कपडे़ पहन कर ये लोग पूरे देश को लूट रहे हैं. लाल कपडे़ उतारने का मतलब इनकी जान चली जाना होता. लेकिन अब हम लोग भी इस संघर्ष को इसकी मंजिल तक पहुंचा कर ही दम लेंगे.

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