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छोटे लोगों के दौर में बड़े दिल के आदमी थे रामश्रय बाबू

रामाश्रय बाबू नहीं रहे, यह खबर पीड़ा देनेवाली है। वे राजनेताओं की उस जमात का प्रतिनिधित्व करते थे जो राजनीतिक उठापटक के बीच भी व्यक्तिगत रिश्ते बनाने और उसे निभाने में विश्वास रखते थे। अपने सहज-सरल और आत्मीय व्यवहार से विरोधी को भी अपना बना लेने की उनमें अदभुत क्षमता थी। बात 1987-88 की है। मैं गया में नवभारत टाइम्स का रिपोर्टर था। पत्रकारिता में नया था। उत्साह, उमंग और कुछ कर गुजरने के जज्बे से भरपूर। यह वह दौर था जब उस इलाके में नक्सल आन्दोलन उफान पर था। शायद ही कोई महीना ऐसा गुजरता हो जब हिंसा की कोई घटना न होती हो।

रामाश्रय बाबू नहीं रहे, यह खबर पीड़ा देनेवाली है। वे राजनेताओं की उस जमात का प्रतिनिधित्व करते थे जो राजनीतिक उठापटक के बीच भी व्यक्तिगत रिश्ते बनाने और उसे निभाने में विश्वास रखते थे। अपने सहज-सरल और आत्मीय व्यवहार से विरोधी को भी अपना बना लेने की उनमें अदभुत क्षमता थी। बात 1987-88 की है। मैं गया में नवभारत टाइम्स का रिपोर्टर था। पत्रकारिता में नया था। उत्साह, उमंग और कुछ कर गुजरने के जज्बे से भरपूर। यह वह दौर था जब उस इलाके में नक्सल आन्दोलन उफान पर था। शायद ही कोई महीना ऐसा गुजरता हो जब हिंसा की कोई घटना न होती हो।

भूमिहीन मजदूर संगठित होकर अपने हक़ की लड़ाई लड़ रहे थे। तब बिहार में कांग्रेस की सरकार थी। रामाश्रय बाबू उसमें प्रभावशाली मंत्री हुआ करते थे। सरकार हिंसा को रोकने में नाकाम थी। सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी खेमों में बटी हुई थी। खूब उठा-पटक होती थी। इन सब मुद्दों को लेकर मैं सरकार और रामाश्रय बाबू के खिलाफ खूब लिखता था। तब अख़बारों में लिखने की आजादी थी। इस बीच कोच विधान सभा क्षेत्र में उप चुनाव हुआ। रामाश्रय बाबू कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ने आये। उस समय वे मंत्री भी थे। गया के सर्किट हाउस में रहकर वे चुनाव लड़ रहे थे। तब चुनाव आयोग की इतनी कड़ाई नहीं थी।

मेरे संपादक दीनानाथ मिश्र का निर्देश हुआ कि पूरे दिन रामाश्रय बाबू के साथ घूम कर रिपोर्ट लिखिए। मैंने उन तक संदेशा भिजवाया। एक दिन के बाद जवाब आया कि अगले दिन चलना है, सुबह 7 बजे सर्किट हाउस पहुँचे। जब पहुंचा तो रामाश्रय बाबू बिल्‍कुल तैयार थे। उनके खिलाफ लिखता था इसलिए मन में शंका थी कि पता नहीं वे ठीक से बात भी करेंगे या नहीं, लेकिन वे इतनी आत्मीयता से मिले कि मैं हैरान रह गया। उनका पहला कथन यही था कि पहले नाश्ता कर लीजिये। मैं कुछ सकुचाया तो उन्होंने कहा- मुझे पता है आप अकेले रहते हैं, इतना सबेरे नाश्ता नहीं किये होंगे। नाश्ता करते समय उन्होंने एक अभिभावक की तरह सीख दी -घर से कभी खाली पेट नहीं निकलना चाहिए।

बहरहाल दिनभर की यात्रा में उन्होंने स्वयं मेरा ख्याल रखा। रिपोर्ट छपी तो उन्होंने खुद फोन कर आभार व्यक्त किया कि आपने बिलकुल निष्पक्ष होकर रिपोर्ट लिखी है। फिर तो उनसे पारिवारिक रिश्ता बन गया। मेरी शादी में आये और सपत्नीक घर बुलाया। जब उनके घर गया तो उनकी पत्नी ने मेरी पत्नी को जब दुल्हिन कह कर बुलाया तो हम दोनों को लगा मानो घर के किसी बड़े से मिल रहे हों। उनका यह व्यवहार हमें गहरे तक छू गया। बहुत बाद में उन्होंने बताया था कि उनके करीबी कोच उपचुनाव में मुझे साथ ले चलने के पक्ष में नहीं थे। करीबियों का कहना था कि साथ जाकर भी वो खिलाफ लिखेगा, वोट बिगाड़ेगा। इस आशंका के बाद भी वो मुझे साथ ले गए यह उनकी विशालता और उदारता थी। अब के नेताओं में ऐसी विशालता और उदारता देखने को नहीं मिलती। सचमुच आप दिमाग ही नहीं दिल से भी बड़े थे। आपकी कमी खलेगी- विनम्र श्रद्धांजलि। ईश्वर आपकी आत्मा को शांति दे।

रामश्रय प्रसाद सिंह बिहार के बड़े नेता थे। कांग्रेस और नीतीश सरकार में कई बार मंत्री भी रहे। 19 जनवरी को उनका दिल्‍ली में इलाज के दौरान निधन हो गया। उनसे जुड़ी यादों पर यह लेख बिहार के वरिष्‍ठ पत्रकार प्रवीण बागी ने लिखा है। प्रवीण बागी पिछले ढाई दशक से बिहार की पत्रकारिता में सक्रिय हैं। प्रिंट से लेकर इलेक्‍ट्रानिक मीडिया का उन्‍हें लंबा अनुभव है।

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