Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

विविध

आतंकवाद का रंग है, बस काला!

हमारे गृह मंत्री श्री सुशील कुमार शिंदे ने दुबारा बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया। क्या हमारे हर गृहमंत्री को यह खसलत तंग करती है? डेढ़-दो साल पहले तत्कालीन गृहमंत्री चिदंबरम ने भी भगवा आतंकवाद का जुमला उछाला था और अपनी भद्द पिटवाई थी। अगर यही बात कांग्रेस या कम्युनिस्ट पार्टी का कोई दिग्गज नेता भी कह देता तो उस पर लोग ज्यादा ध्यान नहीं देते। यह माना जाता कि यह वोट-बैंक की राजनीति है। अल्पसंख्यकों को पटाने का एक पैंतरा है। लेकिन यही बात जब किसी गृहमंत्री के मुंह से निकलती है तो इसमें आग की-सी लपट उठती है। इसीलिए शिंदे ने मुंह खोला नहीं कि संघ और भाजपा के प्रवक्ता ने आसमान सिर पर उठा लिया।

हमारे गृह मंत्री श्री सुशील कुमार शिंदे ने दुबारा बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया। क्या हमारे हर गृहमंत्री को यह खसलत तंग करती है? डेढ़-दो साल पहले तत्कालीन गृहमंत्री चिदंबरम ने भी भगवा आतंकवाद का जुमला उछाला था और अपनी भद्द पिटवाई थी। अगर यही बात कांग्रेस या कम्युनिस्ट पार्टी का कोई दिग्गज नेता भी कह देता तो उस पर लोग ज्यादा ध्यान नहीं देते। यह माना जाता कि यह वोट-बैंक की राजनीति है। अल्पसंख्यकों को पटाने का एक पैंतरा है। लेकिन यही बात जब किसी गृहमंत्री के मुंह से निकलती है तो इसमें आग की-सी लपट उठती है। इसीलिए शिंदे ने मुंह खोला नहीं कि संघ और भाजपा के प्रवक्ता ने आसमान सिर पर उठा लिया।

श्री शिंदे ने श्री चिदंबरम को भी मात कर दिया। उन्होंने दो-टूक शब्दों में कहा कि भाजपा और संघ के प्रशिक्षण केंद्रों में आतंकवाद का पाठ पढ़ाया जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसा उन्हें गृह मंत्रालयों की कुछ रपटों से पता चला है। इतना सुनते ही जब भाजपा ने उन पर आग बरसाई तो वे चिदंबरम के स्तर तक उठे और संयत हो गए। उन्होंने कहा कि मैंने हिंदू आतंकवाद नहीं कहा। वह भगवा आतंकवाद है और ऐसी बात कई अखबारों में भी लिखी गई थी। गृह मंत्री ने अपने कथन को सुधारा लेकिन अनेक कांग्रेसी नेताओं ने उनके मूल बयान का डटकर समर्थन कर दिया। गृह मंत्री पहले भी ऐसी असावधानी के शिकार हुए हैं और उन्होंने फिर सफाइयां पेश की हैं। उनसे आशा की जाती है कि वे अपने पद की महत्ता को ध्यान में रखे बगैर कोई बयान न दें। वे सिर्फ कांग्रेस के ही नहीं, पूरे देश के गृह मंत्री हैं।

यहां प्रश्न यह भी उठता है कि ऐसा क्यों होता है? इसका एक कारण तो बिल्कुल स्वाभाविक है। जो भी राजनीति करता है, वह ‘छपास’ और ‘दिखास’ के लिए तड़पता रहता है। अखबारों में किसी तरह नाम छपता रहे और टीवी चैनलों पर चेहरा दिखता रहे, यह हर नेता की मजबूरी है। इसीलिए कई बार जान-बूझकर बिल्कुल अटपटे, बेढब और उत्तेजक बयान दे दिए जाते हैं। कभी-कभी लेने के देने पड़ जाते हैं। हमारी राजनीतिक दलों के कई अति संयत और सुनियंत्रित प्रवक्ताओं को भी इस खसलत के कारण घर बैठना पड़ जाता है। इसका दूसरा कारण यह है कि छोटे नेता अपने बड़े नेताओं को खुश करने के लिए भी इस तरह के बयान झाड़ देते हैं। उनके बड़े नेता तो इतने सावधान हैं कि अपना मुंह खोलने के पहले दस सलाहकारों से विचार-विमर्श करते हैं और उसके बावजूद अपना भाषण किसी न किसी राजनीतिक बाबू से लिखवाकर लाते हैं। ये शीर्ष नेतागण अभिनेताओं की तरह लिखे हुए या रटे हुए ‘डायलाग’ बोलने में भी नहीं झिझकते लेकिन छुटभैय्या लोग अपनी मशीनगन दनादन चलाने से नहीं चूकते। चैनलों और अखबारों की पौ-बारह इन्हीं नेताओं की वजह से बनी रहती है। बड़े मियां तो बड़े मियां, छोटे मियां सुभानअल्ला!

आश्चर्य यह है कि शिंदे के मूल बयान का कुछ जिम्मेदार कांग्रेसी नेताओं ने डटकर समर्थन कर दिया है। याने वे भाजपा और संघ को ‘हिंदू आतंकवाद’ के लिए वाकई जिम्मेदार मानते हैं। जब असीमानंद और प्रज्ञा का मामला तूल पकड़ा था तो भाजपा, संघ और विश्व हिंदू परिषद ने भी उनके कृत्यों की स्पष्ट निंदा की थी और आज भी वे हर प्रकार के आतंकवाद का विरोध करते हैं। कांग्रेस के जो नेता हिंदू या भगवा आतंकवाद की बात उछालते हैं, वे क्या यह नहीं जानते कि उनकी इस नासमझी का खामियाज़ा कांग्रेस और देश, दोनों को भुगतना पड़ सकता है? यदि हिंदू और भगवा शब्दों को आतंकवाद से जोड़ने के कारण वे अल्पसंख्यकों के वोटों को लुभा सकते हैं तो क्या इसका तार्किक दुष्परिणाम यह नहीं होगा कि बहुसंख्यक मतदाता कांग्रेस से बिदकने लगेंगे? अभी तक कांग्रेस मुसलमानों को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल नहीं हुई है। ऐसे में वह हिंदू वोट क्यों खोना चाहती है? इसके अलावा आतंकवाद को ‘इस्लामी’ और ‘हिंदू’ नाम देना कहां तक उचित है? इस्लाम तो आतंकवाद का बिल्कुल भी समर्थन नहीं करता। उसके तो नाम का ही अर्थ है, सलामती और शांति का धर्म! जहां तक हिंदुत्व का प्रश्न है, जो धर्म ‘आत्मवत्र सर्वभूतेषु’ मानता है याने सभी प्राणियों में स्वयं को देखता है, वह आतंकवाद कैसे फैला सकता है?

आतंकवाद की न तो कोई जात है और न ही मजहब! जिन लोगों का नाम लेकर आतंकवादी हिंसा करते हैं, अगर उन लोगों से पूछें तो उन्हें वे बिल्कुल रद्द कर देंगे। अपने आपको जिहादी कहनेवाले आतंकवादी क्या जिहाद का मतलब भी जानते हैं? जिहादी का मतलब होता है, जितेद्रिय! आतंकवादी तो कायर होते हैं। वे वीरों की तरह लड़ते नहीं हैं। वे हमला करते हैं और भाग जाते हैं। वे क्रांतिकारी भी नहीं होते। हमारे स्वाधीनता सेनानी कभी निहत्थी जनता पर हमला नहीं करते थे। पकड़े जाने पर झूठ बोलकर या कायराना बहाना बनाकर अपनी जान बचाने की कोशिश नहीं करते थे। ऐसे कायर लोग खुद को जिहादी कहें या साधु-महात्मा कहें, वे अपने वर्ग या समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करते। इसीलिए इन सिरफिरों और पथभ्रष्ट लोगों के बहाने किसी भी व्यापक जन-समुदाय के चेहरे पर काला टीका लगा देना कहां की बुद्धिमानी है।

इसके अलावा अपने ही देश के कुछ बहके हुए लोगों के कारण हम पूरे देश को क्यों बदनाम करना चाहते हैं? आज यदि हिंदू या भगवा आतंकवाद शब्द दुनिया के देशों की जुबान पर चढ़ जाए तो उसका परिणाम क्या होगा? भारत बदनाम होगा। भारत उसी कतार में बैठ जाएगा, जिसमें पाकिस्तान बैठा है। पाकिस्तानी को इस्लामी आतंकवाद का जनक माना जाता है तो भारत को हिंदू आतंकवाद का जनक माना जाने लगेगा। लश्करे-तयैबा के सरगना हाफिज सईद के हाथ में शिंदे ने एक नया हथियार पकड़ा दिया है। सईद का कहना है कि आतंकवादी राष्ट्र पाकिस्तान नहीं, हिन्दुस्तान है।

पाकिस्तान तो अपने आतंकवाद को निर्यात करता है। उसने आतंकवाद को बनाया ही था, निर्यात के लिए। भारत उसे कहां निर्यात करेगा? भारत में अगर ‘हिंदू आतंकवाद’ फैल गया तो वह सबसे ज्यादा किसका विनाश करेगा? भारतीयों का और भारतीयों में भी हिंदुओं का! दुनिया के सारे आतंकवादियों का इतिहास पढ़ लीजिए। कश्मीरी आतंकवादी सबसे ज्यादा किन्हें मार रहे हैं? और तालिबान? उनके शिकार सबसे ज्यादा मुसलमान ही होते रहे हैं। श्रीलंका के तमिल आतंकवादियों ने जितने सिंहल नेताओं को मारा, उनसे ज्यादा तमिल नेताओं को मारा। अमेरिका के उग्रवादी ईसाई क्लू क्लक्स क्लान आतंकवादियों ने ईसाइयों को ही मारा। हमारे बंगाल के माओवादी सबसे ज्यादा वामपंथियों को ही मारते हैं। हिंसा का विरोध करनेवाले लोग आतंकवादियों का पहला निशाना बनते हैं। भारत के अधिसंख्य लोग हिंसा-विरोधी हैं। ‘हिंदू आतंकवाद’ शब्द गढ़कर आप भारत को पाकिस्तान क्यों बनाना चाहते हैं? आतंकवाद कोई भी करे, चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान या ईसाई या सिख- उसे उसके मजहब से मत जोडि़ए। वह उसका शुद्ध व्यक्तिगत फैसला है। यह ठीक है कि आतंकवादी अपने फैसले को मज़हब या मुल्क या जात से जोड़ने की पूरी कोशिश करेगा लेकिन इस कुचेष्टा में हम उसका साथ क्यों दें? किसी भी आतंकवाद को किसी मजहब से जोड़कर देखने का अर्थ है- उस आतंक को प्रतिष्ठा और समर्थन देना। आज जरुरी है कि आतंकवाद को पार्टी-चश्मों से न देखा जाए। पार्टी-चश्मों से देखेंगे तो वह कभी भगवा दिखेगा, कभी हरा, कभी लाल और कभी तिरंगा भी! यदि उसे राष्ट्रीय चश्मे से देखेंगे तो उसका एक ही रंग दिखेगा। वह है, काला।

लेखक वेद प्रताप वैदिक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...