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बीजेपी के फटे में संघ की टांग

सिर्फ कुछ को ही पता था। न तो नितिन गडकरी और न ही राजनाथ सिंह और न ही बीजेपी के बाकी नेताओं को इसका अहसास था कि इतनी जल्दी सब कुछ बदल जाएगा। पर, बदल गया। बदलाव जरूरी था। संघ परिवार तो आखरी सांस तक गड़करी के नाम की माला जप रहा था। दबाव डाल रहा था और हर तरह के हथकंडे अपनी रहा था। पर, एक नहीं चली। यह सब इसलिए हुआ, क्योंकि बीजेपी के बड़े नेताओं की अकल ठकाने आ गई है। सबको समझ में आ गया है कि सिर्फ संघ परिवार जैसा चाहेगा, वैसा ही होता रहेगा, तो फिर बीजेपी के राजनीतिक पार्टी का मतलब ही क्या है। बेचारी बीजेपी…।

सिर्फ कुछ को ही पता था। न तो नितिन गडकरी और न ही राजनाथ सिंह और न ही बीजेपी के बाकी नेताओं को इसका अहसास था कि इतनी जल्दी सब कुछ बदल जाएगा। पर, बदल गया। बदलाव जरूरी था। संघ परिवार तो आखरी सांस तक गड़करी के नाम की माला जप रहा था। दबाव डाल रहा था और हर तरह के हथकंडे अपनी रहा था। पर, एक नहीं चली। यह सब इसलिए हुआ, क्योंकि बीजेपी के बड़े नेताओं की अकल ठकाने आ गई है। सबको समझ में आ गया है कि सिर्फ संघ परिवार जैसा चाहेगा, वैसा ही होता रहेगा, तो फिर बीजेपी के राजनीतिक पार्टी का मतलब ही क्या है। बेचारी बीजेपी…।

पुरानी फिल्मों की ललिता पवार जैसी खतरनाक सास की बहू खुद को मान रही थो, सो इतने सालों से सब कुछ चुपचाप सहन करती जा रही थी। पर, सहने की भी कोई सीमा होती है। जमाना बदल गया है। राजनीति सिर्फ नीति और अनुशासन से ही नहीं होती। और क्योंकि राजनीति सत्ता पाने की है, सो कहीं नीति को तोड़ना पड़ता है। छोड़ना पड़ता है। मरोड़ना पड़ता है। कभी कभी अनीति पर भी उतरना पड़ता है। तब कहीं जाकर लोग कब्जे में आते हैं। संघ परिवार की हजार कारस्तानियों के बावजूद नरेंद्र मोदी जमे हुए हैं ही ना। जैसा संघ परिवार कहे, वैसा ही करना है, तो फिर तो संघ परिवार ही बीजेपी बन जाए न। राजनीति करने के लिए खुलकर मैदान में आ जाएं। लेकिन संघ परिवार की सबसे बड़ा कमजोरी यह है कि वह साफ छुपना भी नहीं चाहता और सामने आना भी नहीं चाहता। पता नहीं क्यों। अपना मानना है कि मामला सुविधा का है। वह हमेशा से सुविधा की राजनीति करता रहा है।

संघ परिवार और उसकी हाफ पेंट की तासीर बिल्कुल एक जैसी है। जिस तरह से हाफ पेंट में पैर पूरे छुपते भी नहीं और पूरे तौर पर दिखते भी नही। मतलब हाफ पेंट पहनने वाले को कोई भी नंगा तो कह ही नहीं सकता और अधनंगा होकर भी होता नहीं। बढ़िया है। अकसर कई मामलों में अपने को संघ परिवार का जापान से भी बहुत नजदीक का रिश्ता लगता है। हमारी जिंदगी में बोनसई नाम का एक शब्द वहीं से आया है। अपनी नजर में संघ परिवार और बोनसई एक जैसे हैं। जिस तरह से बोनसई कभी बढ़ता ही नहीं है, लाख कोशिशों के बावजूद संघ परिवार का भी विस्तार नहीं हो रहा है। जितना बहुत पहले था, वैसा का वैसा ही आज भी है। न बोनसई बढ़ता है, न संघ परिवार की हाफ पैंट, पैंट में तब्दील होती है, न संघ परिवार का विस्तार होता है।

देश भर में पहले जितनी शाखाएं लगती थीं, वे अब बीस फीसदी तक आकर सिमट गई हैं। फिर भी पता नहीं क्यों संघ परिवार को अपना घर संभालने की तो चिंता है नहीं और बीजेपी पर हर बार हुकुम चलाने आ जाता है। अरे भैया… आप जैसा कहो, वैसा ही बीजेपी करें, तो फिर बीजेपी तो आप जैसी ही होंगे, आप से बड़ी तो हो नहीं पाएंगी। बीजेपी ने इसीलिए संघ परिवार का हुकुम नहीं माना। लेकिन पता नहीं झेंप मिटाने के लिए या इज्जत बचाने के लिए, संघ परिवार के कुछ लोग यह प्रचार करने की कोशिश रहे हैं कि राजनाथ सिंह भी संघ परिवार की ही पसंद है। मियां गिरे, पर टांग तो उंची है। बीजेपी की तो वैसे भी फटी पड़ी है। और संघ परिवार उसके फटे में टांग घुसा रहा है, तो तकलीफ तो होगी ही।

फटे में ज्यादा टांग घुसाने की संघ परिवार की कोशिश राजस्थान के पिछले चुनाव में पूरी पार्टी को घर बिठा चुकी है। अपना ही नहीं, बीजेपी के कई बड़े बड़े नेताओं का भी मानना है कि संघ परिवार के दखल की वजह से ही बीजेपी में सबसे ज्यादा कलह है। अगर कुछ सालों के लिए संघ परिवार बीजेपी में दखल देना बंद कर दे, तो देश से लेकर देहात तक के बीजेपी संगठन के लाखों झगड़े यूं ही खत्म हो जाएंगे। संघ परिवार सुन रहा है कि नहीं ?

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक हैं

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