अक्सर कहा जाता है कि भारत में महिलाओं एवं लड़कियों के साथ भेदभाव होता है। लेकिन यर्थाथ में जो होता है वो बिल्कुल अलग होता है, भेदभाव के शिकार अक्सर लड़के होते हैं। आज विष्णु गुप्त से इसी पर बात हो रही थी कि किस तरह से मीडिया में सुंदर दिखने वाली उन लड़कियों को रख लिया जाता है जिन्हें कुछ नहीं आता है। मेरे पास भी कई उदाहरण हैं। एक उदाहरण खुद एक लड़की ने बताया था। एक मीडिया स्कूल में उसके साथ पढ़ने वाले एक लड़के ने अपने किसी जानने वाले के रेफरेंस से एक प्रमुख हिन्दी चैनल में वरिष्ठ पद पर काम करने वाले पत्रकार से मिलने का समय मांगा था।
उन्होंने मिलने का समय दे दिया। जब वह लड़का उनसे मिलने चैनल के नोएडा स्थित मुख्यालय जाने लगा तो उसने उस लड़की को भी बताया कि चाहे तो वह भी चल सकती है और अपना बायोडाटा उस चैनल में दे सकती है। वे दोनों जब चैनल के मुख्यालय के पास पहुंचे तब लड़के ने फोन करके उक्त पत्रकार को बताया कि वह चैनल दफ्तर आ चुका है। उक्त पत्रकार ने कहा कि वे इस समय आफिस में नहीं हैं, इसलिये बाद में आ जाये। जब दोनों लौटने लगे तभी लड़की ने उक्त पत्रकार का नम्बर उस लड़के से ले लिया और उसने भी सोचा कि कि उक्त पत्रकार से फोन पर बात करके मिलने का समय मांग ले। जब उस लड़की ने फोन किया तो पत्रकार ने सहर्ष जवाब दिया कि वह अपने आफिस में ही हैं और वह कभी भी मिल सकती है। वह लड़की उसी समय पत्रकार से मिली और उसे नौकरी पर भी रख लिया लेकिन उस लड़के को इतनी ग्लानि हुयी कि उसने मीडिया में नहीं आने की कसम खा ली।
चैनल और पत्रकार का नाम जानबूझ कर नहीं बता रहा हूं। हालांकि कुछ साल बाद उस लड़की ने भी मीडिया को छोड़ दिया। यह एक उदाहरण है कि किस तरह से मीडिया में लड़कों के साथ भेदभाव होता है। ऐसा केवल मीडिया में ही नहीं और भी क्षेत्रों में होता है….चैनलों में नौकरी और प्रमोशन का पैमाने केवल सुंदरता और अच्छी आवाज होती है, भेले ही उसके दिमाग में भूसा भरा हो।
लेखक विनोद विप्लव वरिष्ठ पत्रकार हैं तथा न्यूज एजेंसी एएनआई के साथ जुड़े हुए हैं.





