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एनडीए का डीएनए बदलने की फिराक में कांग्रेस

नरेंद्र मोदी के मामले में कांग्रेस एनडीए का डीएनए बदलने की फिराक में है। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पीएम पद के लिए अपनी हवा बनाने में कामयाब हो गए हैं। लेकिन अच्छे अच्छों की हवा निकालने में माहिर कांग्रेस ने भी अपनी रणनीति तैयार कर ली है। वह सीधे तो मोदी पर प्रहार नहीं करेगी, लेकिन एनडीए के साथियों की सांसों में जहर घोलकर बीजेपी को बहुत परेशान जरूर करेगी। कांग्रेस की कोशिश है कि कैसे भी करके एनडीए के सहयोगियों को अपने हितों की याद दिलाकर माहौल की रफ्तार को रोका जाए। बीजेपी के साथी दलों के सरोकारों की समझ को बढ़ाया जाए। एनडीए इसी से कमजोर होगा।

नरेंद्र मोदी के मामले में कांग्रेस एनडीए का डीएनए बदलने की फिराक में है। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पीएम पद के लिए अपनी हवा बनाने में कामयाब हो गए हैं। लेकिन अच्छे अच्छों की हवा निकालने में माहिर कांग्रेस ने भी अपनी रणनीति तैयार कर ली है। वह सीधे तो मोदी पर प्रहार नहीं करेगी, लेकिन एनडीए के साथियों की सांसों में जहर घोलकर बीजेपी को बहुत परेशान जरूर करेगी। कांग्रेस की कोशिश है कि कैसे भी करके एनडीए के सहयोगियों को अपने हितों की याद दिलाकर माहौल की रफ्तार को रोका जाए। बीजेपी के साथी दलों के सरोकारों की समझ को बढ़ाया जाए। एनडीए इसी से कमजोर होगा।

लोकसभा चुनाव में अभी डेढ़ साल बाकी है। जो लोग इस आस में बैठे हैं कि चुनाव वक्त से पहले होंगे, अपनी नजर में वे कोई बहुत समझदार सोच के स्वामी नहीं हैं। कांग्रेस इतनी बेवकूफ नहीं हैं, जो रात ढलने से पहले ही अपनी चलती दुकान बंद करके घर बैठ जाए। ऐसा कोई नहीं करता। जो करता है, वो भरता है। अपने अटलजी को ही देख लीजिए, इंडिया शाइनिंग की चकाचौंध में आकर फील गुड के फैक्टर में वक्त से कुछ पहले ही चुनाव मैदान में उतर गए थे। लेकिन मैदान से सीधे घर गए, जो आज तक घर से बाहर नहीं निकले। लेकिन फिर भी बीजेपी में इस बार भी वक्त से बहुत पहले से ही हलचल बहुत तेज है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि वक्त से बहुत पहले दावेदारी के केंद्र में आने से कई बार जो सहज नुकसान संभव है, उसकी भरपाई लगभग असंभव हुआ करती है। पर, मोदी तो असंभव में भी संभव की तलाश के लिए माहिर माने जाते हैं। शायद यही कारण है कि वे अभी से तैयार हैं। और यशवंत सिन्हा के बाद अब पार्टी के निलंबित नेता राम जेठमलानी ने भी फिर एक बार नए सिरे से मोदी राग आलापना शुरू कर दिया है।

कांग्रेस जेडीयू के जरिये एनडीए के डीएनए को बदलने के मौके तलाश रही है। माहौल का मामला देखें, तो लगता है कि बीजेपी में अकेले मोदी ही राजनीतिक रूप से बहुत सक्षम हैं। बाकी कोई नहीं। पर, कांग्रेस में तो ऐसे बहुत सारे लोग हैं, जो पूरे देश में, हर वर्ग और हर समाज में राजनीतिक रूप से मोदी से कई गुना ज्यादा ताकतवर हैं। जबकि मोदी की मुश्किल यह है कि वे सिर्फ और सिर्फ हिंदू मानसिकता के लोगों में भी फिलहाल तो पूर्णरूप से स्वीकार्य नहीं हैं। प्रवीण तोगड़िया तो डंडा लेकर मोदी के पीछे पड़े हुए हैं। कांग्रेस माहौल देख रही है। वक्त हाथ में आते ही वह मोदी की सारे माहौल का मटियामेट कर देगी। कांग्रेस चाहती है कि बयानबाजी से दूर रहकर मौका देखा जाए। कांग्रेस सीधे मोदी का नाम नहीं लेगी, लेकिन वक्त आने पर जेडीयू पर उसका हमला बढ़ेगा। वह जेडीयू को धर्मनिरपेक्षता की याद दिलाई जाएगी। एनडीए में दरार के बाद जेडीयू कांग्रेस के साथ रहे या भाड़ में जाए, फायदा कांग्रेस को ही मिलेगा। अपनी खबर है कि हैं कि मोदी की तरफ बीजेपी के कदम बढ़ते ही कांग्रेस अपना दांव चलेगी। खुद को सीधे मोदी पर केंद्रित करने और राहुल गांधी को उनसे भिड़ाने के बजाय कांग्रेस धर्मनिरपेक्षता का मुद्दा उठाकर चुनाव से पहले ही एनडीए में बीजेपी को अलग-थलग करने की कोशिश करेगी।

शिवसेना ने वैसे भी अपनी ओर से पीएम के मामले में मोदी की बजाय श्रीमती सुषमा स्वराज का नाम आगे कर दिया है। हमेशा भावनाओं की राजनीति करनेवाली शिवसेना के पास जवाब में तर्क यह है कि दिवंगत शिवसेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे ने भी सुषमा को प्रधानमंत्री के योग्य बताया था। पार्टी फिलहाल तो साहेब के उसी सपने पर कायम है, बाद में बदल भी सकती है, राजनीति में हमेशा कुछ भी बहुत तय नहीं होता। जेडीयू को वैसे भी मोदी के नाम पर शुरू से ही एतराज रहा है। वैसे, नीतीश कुमार यह जानते हैं कि वे अभी इतने बड़े नहीं हुए हैं कि देश उनको पीएम के मामले में गंभीरता से ले। लेकिन मोदी विरोध के जरिए अपने बिहार के अल्पसंख्यकों के दिलों को जीतकर फिर बिहार पर राज करने ने की उनकी मंशा हैं। उधर, एनडीए के संयोजक शरद यादव ने सिर्फ इतना सा, कि – गठबंधन बहुत मुश्किल से बनते हैं, कहकर बीजेपी को लगभग डरा सा दिया है। कांग्रेस इस माहौल के बढ़ने का मौका देख रही है और मुश्किल यह है कि बीजेपी को भी यह सब समझ में भी आ रहा है। लेकिन करे तो क्या करे।

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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