भाजपा और संघ में अलग-अलग सत्ता केन्द्रों की अभूतपूर्व और त्वरित चालों के बीच राजनाथ सिंह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ‘चुनें’ गये। भले ही उन्होंने अपनी दूसरी अध्यक्षीय पारी की शुरुआत यह कहते हुए किया कि ‘‘मैं एक दुखद स्थिति में राष्ट्रीय अध्यक्ष बना हूं’’, पार्टी अब उन्हें एक चमत्कारिक अध्यक्ष के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है। भाजपा के मुख्यमंत्रियों और छत्रपों का उनसे आनुष्ठानिक ढंग से मिलने का सिलसिला जारी है। जिसमे सबसे बड़ी हेडिंग बनी है गुजरात के दबंग नेता नरेन्द्र मोदी का उनसे मिलना। तीन घण्टें की बैठक के बाद मोदी ने पत्रकारों से कहा कि वे नवनिर्वाचित अध्यक्ष से मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए दिल्ली आये है। साथ ही उन्होंने अर्थपूर्ण ढंग से यह भी कह दिया कि 2014 के चुनाव पर उनकी विस्तारित बातचीत हुई हैं।
पूर्व में मोदी और राजनाथ सिंह के बीच का खट्टा-मीठा रिश्ता जगजाहिर है। ऐसे में उनके आकस्मिक दिल्ली भ्रमण और अतिमहत्वपूर्ण इस बैठक के विवेचन में अटकलों से बचा नहीं जा सकता है। राजनीति के जानकारों की राय में निश्चित तौर पर यह भाजपा के अन्दर सत्ता संतुलन में बदलाव का संकेत है। पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान राजनाथ सिंह ही पार्टी के अध्यक्ष थे। लेकिन वे कुछ खास नहीं कर पाये और एक असफल नेता के रूप में चिन्हित हुए। कांग्रेस पुनः सत्ता में आ गई। भाजपा के अन्दर अफरा-तफरी मच गई। तब आरएसएस को वफादार नितिन गडकरी में उम्मीद की किरण दिखी थी, जो अब भ्रष्टाचार के थपेड़ों से असमय ही बुझ गयी है।
नितिन गडकरी सन् 2010 में महाराष्ट्र की राजनीति से एकाएक उठकर राष्ट्रीय फलक पर स्थापित हुए। लेकिन ज्यादा दिलचस्प रहा उनका बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद से जाना। जिसका एक मात्र कारण रहा उन पर लगे ‘भ्रष्टाचार के आरोप’। भाजपा एक बार पहले भी अपने अध्यक्ष के कारनामों से शर्मसार हो चुकी है। 2001 में तत्कालीन अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण एक स्टिंग आपरेशन में रिश्वत लेते हुए पकड़े गये। उस केस में बंगारू लक्ष्मण को 4 साल की सजा भी हो चुकी है। गडकरी राजनीति में आने से पहले एक मझले स्तर के व्यवसायी थे। महाराष्ट्र में पीडब्ल्यूडी मंत्री रहने के दौरान उनका आर्थिंक साम्राज्य खड़ा हुआ। आरोप है कि उन्होंने कुछ कंपनियों को फायदा पहुंचा कर धन अर्जित किया। इसके अलावा उन पर जमीन हड़पने के भी आरोप लगे हैं।
जब शुरू में गडकरी पर भ्रष्ट्राचार का आरोप लगे तो वे सीना तान कर बोले- झूठ है, किसी भी ऐजेंसी से जांच करा लिया जाय। भाजपा और आरएसएस के नेता भी उनके बचाव में आये और कहा कि आरोप सोची-समझी साजिश के तहत लगाया गया है। अब जब जांच शुरू हुई है और आयकर विभाग ने पूर्ति पावर और शुगर लिमटेड के नौ ठिकानों पर छापे डाले, नितिन गडकरी आग बबूला हो गये और अपनी पार्टी की सत्ता आने पर अफसरो को ‘देख लेने’ की धमकी देने लगे। संघ का अत्यन्त प्रिय होने के बावजूद आगामी राज्यों के चुनाव और 2014 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए उन्हें निर्वासित कर दिया गया। राजनाथ सिंह इसे एक दुःखदायी स्थिति और गडकरी के दुबारा अध्यक्ष न बन पाने की हालत में स्वंय के अध्यक्ष बनने को एक मजबूरी मानते हैं।
सन् 2000 में राम प्रकाश गुप्ता को हटा कर राजनाथ सिंह को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया था। तब से राज्य में पार्टी की हालत लगातार गिरती चली गयी। उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है और केन्द्र की राजनीति को तय करता रहा है। भाजपा को केन्द्र का सत्ता दिलाने में यूपी सबसे महत्वपूर्ण राज्य था। आज उत्तर प्रदेश पार्टी के लिए एक अनिश्चितता का माहौल पैदा करता है। किसी भी चुनाव में भाजपा वहां पहले या दूसरे स्थान के लिए नहीं बल्कि तीसरे या चौथे पोजिशन की लड़ाई लड़ता दिख रहा है। ऐसे में राजनाथ सिंह का उत्तर प्रदेश में भी सीमित राजनैतिक आधार कैसा चमत्कार दिखा सकता है? अभी राजनाथ सिंह अपनी ताजपोशी का जश्न भी नहीं मना पाये थे कि कर्नाटक का उठापटक शुरू हो गया। राज्य भाजपा के हाथ से जाने के कगार पर है। उनका प्रिय राज्य झारखण्ड पहले ही भाजपा की झोली से निकल चुका है।
संकट के समय घूम फिर कर भाजपा नेताओं को ना चाहते हुए भी अपने ‘अड़ियल’ स्टार नेता नरेन्द्र मोदी की याद आती है। राजनाथ सिंह ने भी यहीं किया। उन्हें दिल्ली बुलाकर आने वाले राज्य के चुनावों और 2014 लोकसभा चुनाव के संदर्भ में विचार विमर्श किया। हालांकि मोदी ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि वें खुद अध्यक्षजी से समय लेकर मिलने आये हैं। अगर ऐसा है तो राजनाथ सिंह के लिए ये भी एक सिरदर्द हो सकता है, क्योंकि मोदी का एकमात्र ऐजेण्डा है भाजपा का प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनना, जो अभी भी दिल्ली और नागपुर के मठाधीशों को स्वीकार्य नहीं है। मोदी भाजपा को ना निगला जाता है, ना उगला। प्रमुख सहयोगी नीतीश कुमार हो या संभावित शिकार उड़ीसा के नवीन पटनायक जैसे नेता, मोदी भाजपा के समर्थक पार्टियों को बिल्कुल रास नहीं आते। बस पंजाब के अकाली नेतृत्व को मोदी से कोई आपत्ति नहीं है। शिवसेना सुप्रीमो ने पहले ही सुषमा स्वराज के रूप में अपनी पसन्द जाहिर कर चुके हैं।
पार्टी के अन्दर भी मोदी विरोधी खेमा काफी मजबूत है। नरेन्द्र मोदी को 2001 में संघ की कृपा से मुख्यमंत्री का सिंहासन मिला था। अब मोदी आरएसएस के सरपरस्तों को भी ऑख दिखा रहे हैं। जिससे आरएसएस भी उनसे खुश नहीं है। संघ के एक धड़े का मानना है कि गडकरी के खिलाफ पूर्ति ग्रुप से संबन्धित जानकारियां मीडिया में लीक करने की साजिश भी मोदी सर्मथकों ने की थी। इन सब के बावजूद भाजपा के पास कोई तुरूप का इक्का है तो वह है नरेन्द्र मोदी। हाल में एक पत्रिका द्वारा किये गये सर्वे में नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पद के दावेदारो में सबसे लोकप्रिय बताये गये। सर्वे में एनडीए की स्थिति यूपीए से बेहतर दिखायी गयी। हालांकि सर्वे का आधार शहरी मतदाताओं का एक छोटा सा हिस्सा ही रहा है। इसमे मोदी के मार्केटिंग मैनेजरों की कोई भूमिका रही है या नहीं दावे के साथ नहीं कहा जा सकता है।
पर एक बात साफ है कि प्रश्न पूछे गये लोगों के दिमाग में अप्रत्यक्ष रूप से मोदी की तस्वीर स्थापित की गयी होगी। यह संभव है कि सर्वे में शामिल हर व्यक्ति से प्रधानमंत्री उम्मीदवार की लोकप्रियता का प्रश्न पूछा गया होगा और उसे एनडीए को मिलने वाली सीटों का आधार मान लिया गया होगा। पर राजनैतिक प्रेक्षकों का मानना है कि 2014 की अंकगणित किसी प्रधानमंत्री के पद के दावेदार के स्टार वैल्यू से अधिक राज्यों में शक्ति संतुलन की जमा-घटा पर निर्भर करेगा। यह भी संभव है कि दिल्ली के दावेदार के रूप में आधिकारिक तौर पर मोदी का नाम आते ही नीतीश की जेडीयू बिदक कर यूपीए या किसी और मोर्चा के साथ हो सकती है। ऐसे में एनडीए की स्थिति और दयनीय हो जायेगी।
ऐसी स्थिति में राजनाथ सिंह और उनके संघी पहरुओं का काम और भी जटिल हो जाता है। एक तरफ है बेहतरीन मार्केटिंग की मदद से बनायी गयी मोदी की गुजरात के विकास पुरूष की छवि और दूसरी तरफ मोदी का भाजपा के सहयोगियों को अस्वीकार होना। किसी न किसी बहाने मोदी की 2002 वाली दागदार छवि बार-बार देश के सामने उभर आने से भी भाजपा के लिए संकट की स्थिति पैदा हो जाती है। राजनाथ सिंह को सबसे पहले इसी यक्ष प्रश्न से जूझना पड़ेगा कि मोदी का करे तो क्या करे। उगले या निगले। दोनों स्थितियों में घोटालों और महंगाई से यूपीए शासन के खिलाफ जनता में व्यप्त रोष का भरपूर फायदा शायद बीजेपी ना उठा सके।
लेखक प्रवीण कुमार सिंह पत्रकारिता से जुड़े हुए है.





