कहा जाता है कि सत्ता के खेल में जय-पराजय स्थाई नहीं होती और घायल योद्धा पराजय के बाद अगली लड़ाई या मौके की तलाश में पुनः उठ खड़े होते हैं. यदि यह कहा जाए कि मौके की तलाश ही राजनीति का दूसरा नाम है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. हिमाचल प्रदेश के अभी हाल में ही संपन्न हुये चुनावी दंगल में उतरी कांग्रेस व भाजपा, अंत तक गुटबाजी के कोढ़ से निजात नहीं पा सकी थी. प्रदेश की कमान वीरभद्र सिंह को मिलने के साथ भले ही जहाँ कांग्रेस की गुटबाजी सतही तौर से समाप्त हो गई, वहीँ प्रदेश की चुनावी राजनीति का सारा परिदृश्य ही बदल गया था, जिसके चलते बिखराव के कगार पर खड़ी कांग्रेस को अंततः सत्ता तक पहुंचाया.
दूसरी ओर प्रदेश भाजपा ने सत्ता पर कायम रहने के मार्ग पर अनेक प्रकार के कांटे स्वयं बो लिए थे, जिन्हें अंत तक निष्कंटक नहीं किया जा सका. अब भाजपा चितन करे या मंथन, धरातल पर गलती सुधारे बिना और संगठित हुये बिना आने वाले पांच क्या दस वर्षों में भी प्रदेश की सत्ता पर उसकी वापसी असंभव सी लगती है.
६८ सदस्यीय विधानसभा के ३६ क्षेत्रों पर विजय प्राप्त कर सत्ता पर आसीन कांग्रेस ने कहने को भले ही गुटबाजी से निजात पा ली हो और सत्ता का सुख सभी मिलकर भोगते दिखाई दे रहे हों, परन्तु अंदर की खबर कुछ और ही बता रही है. तमाम प्रयत्नों के बाद भी मुख्यमंत्री की दौड में पिछड़ने वाले अपने ही दल के प्रतिद्वंदी अभी भी उचित समय व मौके की तलाश में हथियार भांजने में लगे हुये हैं. हिमाचल में नव-निर्वाचित कांग्रेस सरकार का नेतृत्व वीरभद्र सिंह को मिलने और शपथग्रहण समारोह के साथ ही यह लगभग निश्चित हो गया था कि मुख्यमंत्री जो मंडी संसदीय क्षेत्र के सांसद भी हैं, विधानसभा के लिए निर्वाचित होने के कारण लोकसभा की अपनी सीट से त्यागपत्र दे देंगे. वैसे उन्हें छह माह के अंदर किसी एक सीट से त्यागपत्र देना है, क्यूंकि नियमानुसार कोई भी व्यक्ति लोकसभा या विधानसभा में से किसी एक सदन का ही सदस्य रह सकता है. इस प्रकार उनके त्यागपत्र देने के छह माह के भीतर ही मंडी संसदीय क्षेत्र का उपचुनाव होना निश्चित है. मंडी, कुल्लू व लाहोल-स्पीति जिले तक फैले इस विशाल मंडी संसदीय क्षेत्र के आगामी उपचुनाव के लिए कांग्रेस और भाजपा के प्रत्याशी कौन होंगे, यह अभी तक तय तो नहीं है. परन्तु सूत्रों की माने तो इस सम्बन्ध में पक्ष विपक्ष के साथ-साथ कांग्रेस के दोनों गुटों के अनेक संभावित प्रत्याशियों ने अभी से लामबंदी शुरू कर दी है. वैसे इस उपचुनाव में चुने जाने वाले सांसद का कार्यकाल महज कुछ महीनों के लिए ही होगा क्यूंकि वर्तमान संसद का कार्यकाल जून २०१४ को समाप्त होने जा रहा है. ऐसे में चुने जाने वाले सांसद को मात्र कुछ माह के पश्चात पुनः चुनावी मैदान में उतरना होगा.
अभी हाल में संपन्न हुये विधानसभा के चुनावों में विजयी होकर सरकार बनानेवाली कांग्रेस पार्टी में मंडी लोकसभा उपचुनाव के टिकट के लिए होनेवाला घमासान बहुत ही दिलचस्प होगा. इसमें कोई शक नहीं कि जहाँ अभी हाल में ही विजय प्राप्त कर सत्ता पर काबिज हुई कांग्रेस और उसके कार्यकर्ता उपचुनाव में भी विजय के लिए अतिआत्मविश्वासी हैं, वहीँ दूसरी ओर पराजित भाजपा अपना खोया हुआ जनाधार बटोरने की तलाश में रहेगी, क्यूंकि जहाँ मंडी जिले के कुल १० विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा के मात्र ३ विधायक ही अपनी विजय सुनिश्चित करने में सफल रहे थे. वहीँ कुल्लू जिले व लाहोल-स्पीति की कुल ५ सीटों में उसे मात्र १ सीट पर ही संतोष करना पड़ा. भाजपा व कांग्रेस के लिए विजयी क्षेत्रों के साथ-साथ पराजित क्षेत्रों में भी अपनी सम्मानजनक उपस्थिति दर्ज करवाना आवश्यक होगा क्यूंकि इस उपचुनाव को २०१४ का रिहर्सल बताया जा रहा है.
इन सब के विपरीत यदि दोनों दलों की स्थिति को टटोलने की कोशिश करें तो तस्वीर कुछ और ही दिखाई देती है. गुटों में बंटी हुई भाजपा व कांग्रेस की अंतर्कलह का साया इस उपचुनाव में भी इन दलों का पीछा छोड़ता दिखाई नहीं देता. वीरभद्र सिंह के मुख्यमंत्री बनते के साथ ही भले ही कांग्रेस में कौन बनेगा मुख्यमंत्री की प्रतियोगिता का पटाक्षेप हो गया हो, परन्तु वास्तव में ऐसा है नहीं. मध्य हिमाचल से मुख्यमंत्री बनाये जाने की मांग अभी भी अंदर ही अंदर सुलग रही है और शिमला व दिल्ली बैठे इस मुहिम को चलानेवाले इतनी आसानी से चुप बैठ जायेंगे ऐसा लगता नहीं. उचित मौके व समय की बाट जोह रहे यह धुरंधर कब सर उठा लें पता नहीं. वहीँ दूसरी ओर ऐसा लगता नहीं कि राजनीति के चतुर खिलाड़ी वीरभद्र सिंह इन सब ख़बरों से अनभिज्ञ हों. मंडी उपचुनाव में भी कांग्रेस के दोनों गुटों की ओर से खूब राजनीति खेली जायेगी ऐसा आभास अभी से हो रहा है.
उपचुनाव के बहाने भविष्य की गोटियां बिछाने और शह और मात की तैयारी भीतर ही भीतर अभी से जोर पकड़ रही है. कांग्रेस संगठन किसको इस चुनाव में उतारेगा यह अभी निश्चित तो नहीं है परन्तु दोनों गुट और संभावित प्रत्याशी भी विभिन्न कोणों से स्थित का आंकलन कर लाभ-हानि की गणना अभी से करने में व्यस्त हो गए है. स्थिति तब और दिलचस्प हो जायेगी यदि दोनों गुट उपचुनाव के संभावित प्रत्याशी के लिए एक दूसरे के नाम की संतुति हाईकमान को करेंगे. इस प्रकार विरोध का झंडा उठानेवाले को प्रदेश की राजनीति से बाहर का रास्ता दिखाने की कूटनीति चाल भी चली जाएँ तो कोई आश्चर्य नहीं होगा. इन सब के मध्य विधानसभा में प्रवेश पाने में असफल रहे नेता इस होनेवाले उपचुनाव के रास्ते लोकसभा के लिए भाग्य आजमाने वालों की संख्या भी कम नहीं है दोनों दलों में. निष्पक्ष आंकलन से इतना तो स्पष्ट है कि भीतरघात की प्रबल स्थिति को देखते कोई भी बड़ा नेता मात्र कुछ माह के लिए भविष्य जोखिम में डालने को सरलता से तैयार नहीं होगा, क्यूंकि पराजय की स्थिति में २०१४ में पुनः टिकट मिले इसकी कोई गारंटी नहीं है.
ज्ञात हो कि २००९ के चनावों में पूर्व सांसद प्रतिभासिंह के चुनाव लड़ने से इनकार करने पर ही राजा वीरभद्र सिंह को पार्टी ने मंडी संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़वाया था. इस चुनाव में वीरभद्र सिंह ने अपने निकटतम प्रत्याशी भाजपा के महेश्वरसिंह को लगभग 14000 हजार मतों से पराजित किया था. अब चूँकि कांग्रेस पार्टी सत्ता में है तो टिकट के दावेदारों की फेहरिस्त भी लम्बी होने की पूरी सम्भावना लग रही है. वहीँ भाजपा भी इस उपचुनाव में उतारने के लिए किसी कद्दावर नेता की तलाश में है परन्तु भाजपा को सबसे बड़ा खतरा हिलोपा के महेश्वर सिंह से है, जो भाजपा को नुकसान पहुँचाने की दृष्टि से ही सही, अपना उम्मीदवार उतार कर भाजपा को परेशानी में डाल सकते हैं. उत्तरप्रदेश के कन्नौज उपचुनाव की तरह यहाँ भी भाजपा यदि अपना उम्मीदवार ना उतारे तो कोई अचरज की बात नहीं होगी. मंडी उपचुनाव के बहाने दोनों बड़े दलों में होनेवाली सियासत कितनी गरमाएगी यह आनेवाले दिनों में स्पष्ट दिखलाई देगी.
लेखक विनायक शर्मा साप्ताहिक अमर ज्वाला के संपादक हैं.






