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लखनऊ

माया से डरने वाली ब्‍यूरोक्रेसी इतनी बेलगाम कैसे हो गई?

उत्तर प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी को स्कूली बच्चों की तरह नित्य फटकार लगाई जा रही है। स्कूलों में बच्चों को शारीरिक दंड दिये जाने की मुखालफत करने वाले नेतागण जब यह कहने लगे कि अफसर डंडे के आदि हो गए हैं तो स्थिति की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है। मोटी तनख्वाह और सुख सुविधाएं लेने वाले ब्यूराक्रेट्स के लिये यह स्थिति शर्मनाक है। ऐसा लगता है कि नौकरशाही उत्तर प्रदेश की सभी समस्याओं की जड़ बन गई है। समाजवादी पार्टी की सरकार के गठन के बाद से ही नौकरशाही पर उंगली उठाने लगी थी, जिसका क्रम आज तक जारी है।

उत्तर प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी को स्कूली बच्चों की तरह नित्य फटकार लगाई जा रही है। स्कूलों में बच्चों को शारीरिक दंड दिये जाने की मुखालफत करने वाले नेतागण जब यह कहने लगे कि अफसर डंडे के आदि हो गए हैं तो स्थिति की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है। मोटी तनख्वाह और सुख सुविधाएं लेने वाले ब्यूराक्रेट्स के लिये यह स्थिति शर्मनाक है। ऐसा लगता है कि नौकरशाही उत्तर प्रदेश की सभी समस्याओं की जड़ बन गई है। समाजवादी पार्टी की सरकार के गठन के बाद से ही नौकरशाही पर उंगली उठाने लगी थी, जिसका क्रम आज तक जारी है।

ब्यूरोक्रेसी ठीक से काम नहीं कर रही है यह तो सही है, लेकिन यह बात भी समझ से परे हैं कि जिस नौकरशाही को बसपा सुप्रीमो मायावती अपने हिसाब से चलाने में सफल रहीं थीं, उनके सामने बड़े-बड़े नौकरशाह थर्राते थे। माया के आंख के इशारे को नौकरशाह उनका हुक्म मानकर जी हजूरी करने लगते थे, वह नौकरशाही एक दम से सपा राज में बेलगाम कैसे हो गई। ऐसा लगता है कि इसी स्थिति के लिये काफी हद तक वह जिम्मेदार हैं तो, अपनी सरकार अपनी नाकामयाबी को नौकरशाही को कटघरे में खड़ा करके ढंकना चाहता है। यह नहीं भूलना चाहिए कि नौकरशाही तभी बेलगाम होती है जब वह सरकार की खामियां समझने लगती है। अगर सपा सरकार की नियत में खोट न होता तो कई ईमानदार और योग्य अधिकारी हाशिये पर न पड़े होते। जब कोई सरकार अपने अधिकारियों की नियुक्ति और तबादला उसकी जाति और उनकी पार्टी के प्रति निष्ठा देखकर करती है तो यह सब तो होगा ही। नौकरशाह अपने आप जनसेवक की जगह सत्तारूढ़ पार्टी के कार्यकर्ता की तरह ही पेश करना चाहेंगे।

पिछले दिनों एटा की उस घटना लोग भूले नहीं हैं जहां वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अजय मोहन शर्मा सपा महासचिव और सांसद रामगोपाल यादव के पैर छूकर आशीर्वाद लेते हुये देखे जाते हैं, यही नहीं उन्होंने सांसद महोदय को ‘गार्ड आफ ऑनर’ तक से सम्मानित किया। लेकिन सपा संगठन और सरकार में किसी की हिम्मत नहीं पड़ी कि वह रामगोपाल यादव को इस बारे में कोई नसीहत देता। इतना ही नहीं पैर छूने वाले पुलिस अधिकारी आज भी एटा में शान के साथ तैनात हैं। अगर सपा आलाकमान की ‘कथनी और करनी’ में कोई भेद न होता तो उसी समय इन ‘महाशय’ को कम से कम खाकी का अपमान करने के लिए निलंबित तो कर ही देना चाहिए था, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। इसी तरह जनता भूली नहीं है कि सपा सरकार के गठन के कुछ समय बाद पार्टी के एक वरिष्ठ नेता और लोक निर्माण मंत्री शिवपाल यादव विभागीय बैठक के दौरान अपने अधीनस्थ काम करने वालों अधिकारियों को डकैती नहीं चोरी करने की नसीहत देते सुने गये थे। ऐसी ही एक घटना के शिकार कुछ माह पूर्व मुख्यमंत्री स्वयं भी हुये थे, जब मथुरा की जिलाधिकारी ने करीब एक घंटे तक मुख्यमंत्री का फोन ही नहीं उठाया। बाद में उनको मैसेज भिजवाया गया कि मुख्यमंत्री बात करना चाहते हैं, तब उन्होंने बात की। इसी तरह बागपत के एसपी अपने आप को सपा के एक बड़े नेता का नुमांइदा बताते घूमते रहते हैं। यही हाल लखनऊ में तैनात डीआईजी स्तर के एक बड़े पुलिस अधिकारी का है। वह भी सपा के करीबी होने का दम भरते रहते हैं। कुछ माह पूर्व लखनऊ में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने महिला पुलिस हेल्प लाइन नंबर 1090 सेवा शुरू की थी, उस समय इन अधिकारी महोदय की चपलता देखने लायक थी, ऐसा लग रहा था वह पुलिस के कोई अधिकारी न होकर सपा के एजेंट बन कर रह गये हों।

सपा प्रमुख को भले ही हालात पता न हो लेकिन आम धारणा यही है कि प्रदेश भर में पुलिस थानों से लेकर जिले में अधिकारियों की तैनाती तक किसी सिस्टम के तहत नहीं होती है। सपा नेता स्वयं इसके लिये जिम्मेदार हैं। वह जनता की परेशानियों को सुनने के बजाये काम करने वाले अधिकारियों को अपने जिलों से हटा कर अपनी पसंद के अधिकारियों की तैनाती में ज्यादा व्यस्थ रहते है। इस बात का अहसास मुलायम की बातों से भी होता ही है। यही वजह थी पार्टी मुख्यालय में अफसरों की क्लास लगाते समय समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव को अपने कार्यकर्ताओं को भी ताकीद देनी पड़ गई कि वे अफसरों की ट्रांसफर पेास्टिंग में रूचि न लें। उन्होंने कहा उत्तर प्रदेश एक बड़ा प्रदेश है। इसलिए एक बार ब्यूरोक्रेसी की ओवर हालिंग होनी चाहिए। कार्यकर्ता अधिकारियों की चापलूसी करने से बचें।

मुलायम सरकार और ब्यूरोक्रेसी को आईना दिखा कर उनकी ओवरहालिंग की बात कर रहे हैं तो उनके सबसे करीबी और विश्वासपात्र समझे जाने वाले सपा नेता और मंत्री आजम खॉ तो ब्यूरोक्रेसी से इतने नाराज हैं कि उन्होंने यह कहने में भी संकोच नहीं किया कि अधिकारी सिर्फ डंडे की भाषा समझते हैं। उन्होंने सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव को यहां तक सलाह दे दी कि आप चाबुक हाथ में उठा लें तो वे सुनने लगेंगे, लेकिन यह सब इतना आसान नहीं है। यदि नौकरशाही ने सरकार का बेड़ा गर्क कर रखा है, जैसा की बार-बार सपा नेताओं द्वारा दोहराया जा रहा है तो सुस्त और नाकारा नौकरशाहों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है। कार्रवाई के नाम पर तबादला समस्या का कोई स्थायी हल नहीं है। अगर तबादला स्थायी हल होता तो ब्यूराक्रेसी कब की सुधर गई होती। बेहतर होगा कि सरकार द्वारा ब्यूरोक्रेसी को जवाबदेही बनाया जाये। इसके साथ-साथ सपा नेता भी अपनी जिम्मेदारी समझे। वह नौकरशाही पर उलटा सीधा काम का दबाव न डालें। इससे बड़ी दुख की बात और क्या हो सकती है कि एक तरफ तो सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव तथा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और सपा के कद्दावर नेता आजम खॉ ब्यूरोक्रेसी के रवैये से दुखी हैं तो दूसरी तरफ कई नौकरशाहों के खिलाफ जांच ठंडे बस्ते में पड़ी है।

सरकार भ्रष्ट नौकरशाहों के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति ही नहीं दे रही है तो कहीं लचर पैरवी के चलते नौकरशाह छूट रहे हैं। ग्रेटर नोयडा प्राधिकरण के सीईओ संजीव शरण और चेयरमैन राकेश बहादुर दोनों के खिलाफ जांच चल रही है, हाईकोर्ट ने बार-बार सरकार से कहा कि दोनों आईएएस अधिकारियों को जांच होने तक यहां से हटा दिया, जाये लेकिन इन नौकरशाहों को सरकार बचाती ही रही। पानी जब सिर से ऊपर चला गया तो संजीव शरण को तो हटा दिया गया, लेकिन राकेश बहादुर को अभी भी नहीं छुआ गया है। कहा तो यहां तक जाता है कि यह दोनों अधिकारी मुलायम के विश्वसनीय हैं, इसी लिये उन्हें अदालत की मंशा के खिलाफ इतनी लम्बी तैनाती मिल गई। बहरहाल, आज जो स्थिति है उसको देखकर तो यही कहा जा सकता है कि जनता की अदालत में ब्यूरोक्रेसी और सरकार दोनों ही दागदार हैं। उनमें सुधार की

अजय कुमार

बेहद आवश्यकता है। ब्यूरोक्रेट्स और सरकार दोनों ही जनहित की बजाये निजहित पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं, जिस तरह की भाषा सपा नेता बोल रहे हैं, उसको सुन कर सलमान खान की फिल्म का एक गाना याद आता है, जिसके बोल कुछ इस तरह से थे ‘वो करें तो रास लीला, हम करें तो करेक्टर ढीला।’

लेखक अजय कुमार लखनऊ में पदस्थ हैं. वे यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों और पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. अजय कुमार वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं.

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