नेशनल दुनिया में आलोक मेहता की स्थिति को लेकर अब किसी को संशय नहीं रह गया है. ग्रुप एडिटर के पद पर कुमार आनंद एवं एडिटर के पद पर प्रदीप सौरभ की नियुक्ति के बाद स्पष्ट हो गया है कि आलोक मेहता के लिए नई दुनिया में करने को कुछ बचा नहीं रह गया है. प्रबंधन ने भले ही उनको एडिटोरियल डाइरेक्टर बना दिया है, पर संस्थान के नीतिगत फैसले में अब उनकी कुछ भी नहीं चलेगी. स्पष्ट कर दिया गया है कि अब सारे फैसले प्रदीप सौरभ एवं कुमार आनंद लेंगे. यानी अब फैसला लेने का अधिकार आलोक मेहता के पास से छीन लिया गया है.
अब यह दिलचस्प संयोग है कि नेशनल दुनिया में भी यह सब फरवरी माह में हो रहा है. ऐसा नईदुनिया में आलोक मेहता के साथ काम कर चुके कई पुराने कर्मचारियों का कहना है. आलोक मेहता ने पिछले साल फरवरी माह में ही कई कर्मचारियों को छंटनी के नाम पर संस्थान से निकाल दिया था, जबकि उनको स्पष्ट रूप से पता था कि नईदुनिया बंद होने वाला है तथा जागरण समूह इसे खरीद चुका है. फरवरी में निकाले गए कर्मचारियों को कोई आर्थिक लाभ नहीं मिला, परन्तु मार्च में नईदुनिया के बंद होने के दौरान काम करने वाले कर्मचारियों को तीन-तीन महीने की सैलरी दी गई.
समय चक्र एक साल आगे घूम चुका है. यह फरवरी का ही महीना है कि आलोक मेहता को ऐसा प्रमोट कर दिया गया कि अब वे नीतिगत फैसले भी नहीं ले सकते हैं. फरवरी में ही उनके कई अजीज लोग इस्तीफा दे रहे हैं. फरवरी में ही उनकी जगह किसी और को ग्रुप एडिटर बनाया जा रहा है. फरवरी में ही उनके खास लोगों से जिम्मेदारियां ली जा रही है. आखिर इतने बड़े कद के पत्रकार आलोक मेहता को इतने के बाद भी पत्रकारिता पर लिखी गई अपनी किताब 'पत्रकारिता की लक्ष्मण रेखा' की याद नहीं आ रही है. आखिर इतना होने के बाद भी उनके निर्णय को लेकर उनके करीबी ही असमंजस में हैं.
वैसे भी जिस तरीके से एसबी मीडिया के चेयरमैन शैलेंद्र भदौरिया ने नए संपादक प्रदीप सौरभ को अखबार के कर्मचारियों से इंट्रोड्यूस करवाया है, उससे साफ है कि आलोक मेहता का अध्याय इस अखबार से लगभग खतम हो चुका है. परिचय मीटिंग में स्पष्ट कहा गया कि अब सारे फैसले प्रदीप सौरभ लेंगे तो फिर ग्रुप एडिटर से एडिटोरियल डाइरेक्टर बनाए गए आलोक मेहता क्या करेंगे? अब उनके करीबी भी नहीं समझ पा रहे हैं कि आखिर इतना होने के बाद भी मेहताजी वहां टिके क्यों हुए हैं? उनके खासमखास रवि अरोड़ा समेत कई ने इस्तीफा दे दिया है. रास बिहारी से मेट्रो एडिटर का पद ले लिया गया है. फिर अब मेहता जी को समझाने को बाकी क्या रह गया है?
क्या इतना सब होने के बावजूद आलोक मेहता इतने नासमझ हैं कि वे कुछ सोच ही नहीं पा रहे हैं? मीडिया में ऐसा अक्सर होता आया है कि जब मालिकान किसी को संस्थान से हटाते हैं तो उनके फैसले लेने की जिम्मेदारी ले ली जाती है. उनके ऊपर या नीचे किसी और को लाकर बैठा दिया जाता है. उन्हें बिना काम का पद देकर प्रमोट कर दिया जाता है. इतिहास गवाह रहा है कि ऐसा तमाम मीडिया संस्थानों में कई बार हो चुका है. और इशारा समझते हुए गैरतमंद पत्रकार संस्थान छोड़ देते हैं. प्रभु चावला से लेकर राहुल देव जैसे पत्रकार ऐसी स्थितियों से गुजर चुके हैं तथा अपनी ठसक और तेवर के साथ संस्थानों से इस्तीफा दे चुके हैं.





