Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

विविध

ये वसुंधरा राजे की जीत है या संघ की हार?

अपने आपको सर्वाधिक अनुशासित बता कर पार्टी विद द डिफ्रेंस का नारा बुलंद करने और व्यक्ति से बड़ी पार्टी होने का दावा करने वाली भाजपा का शीर्ष नेतृत्व आखिरकार पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे के आगे नतमस्तक हो गया। उन्हें न केवल राजस्थान में पार्टी की कमान सौंपी गई है, अपितु आगामी विधानसभा चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। आगामी विधानसभा चुनाव में जीतने के लिए पार्टी के पास इसके अलावा कोई विकल्प था भी नहीं।

अपने आपको सर्वाधिक अनुशासित बता कर पार्टी विद द डिफ्रेंस का नारा बुलंद करने और व्यक्ति से बड़ी पार्टी होने का दावा करने वाली भाजपा का शीर्ष नेतृत्व आखिरकार पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे के आगे नतमस्तक हो गया। उन्हें न केवल राजस्थान में पार्टी की कमान सौंपी गई है, अपितु आगामी विधानसभा चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। आगामी विधानसभा चुनाव में जीतने के लिए पार्टी के पास इसके अलावा कोई विकल्प था भी नहीं।

भले ही समझौते तहत संघ लॉबी के गुलाब चंद कटारिया को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया गया है, मगर जीतने के लिए पार्टी को वसुंधरा के चेहरे का ही इस्तेमाल करना पड़ रहा है। उनकी नियुक्ति के साथ पिछले कई दिन से उहापोह में जी रहे पार्टी कार्यकर्ता, नेता व विधानसभा चुनाव में टिकट के दावेदारों ने राहत की सांस ली है और उनके चेहरे पर खुशी छलक आई है। पार्टी की अंदरूनी कलह की वजह से मायूस हो चुके कार्यकर्ता में उत्साह का संचार हुआ है। समझा जाता है कि अब पार्टी पूरी ताकत से चुनाव मैदान में ताल ठोंकेगी और उसका प्रदर्शन बेहतर होगा।

ज्ञातव्य है कि राजस्थान में पार्टी दो धड़ों में बंटी हुई है। एक बड़ा धड़ा वसुंधरा के साथ है, जिनमें कि अधिसंख्य विधायक हैं तो दूसरा धड़ा संघ पृष्ठभूमि का है, जिसमें प्रमुख रूप से प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी, पूर्व मंत्री ललित किशोर चतुर्वेदी, गुलाब चंद कटारिया आदि शामिल हैं। आपको याद होगा कि जब पूर्व प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने घोषणा की कि राजस्थान में अगला चुनाव वसुंधरा के नेतृत्व में लड़ा जाएगा तो ललित किशोर चतुर्वेदी व गुलाब चंद कटारिया ने उसे सिरे से नकार दिया। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी भी इस बात से नाइत्तफाकी जाहिर करते रहे। इसके बाद जब कटारिया ने मेवाड़ में रथ यात्रा निकालने ऐलान किया तो वसुंधरा ने इसे चुनौती समझते हुए विधायक किरण माहेश्वरी के जरिए रोड़ा अटकाया। नतीजे में विवाद इतना बढ़ा कि वसुंधरा ने विधायकों के इस्तीफे एकत्रित कर हाईकमान पर भारी दबाव बनाया। हालांकि नई घोषणा से पहले तक संघ लॉबी ने पूरा दबाव बना रखा था, मगर आखिरकार कटारिया को नेता प्रतिपक्ष बनाने की एवज में वसुंधरा का नेतृत्व स्वीकार करना ही पड़ा। हालांकि यह तय है कि टिकट वितरण में वसुंधरा को पूरा फ्रीहैंड तो नहीं मिलेगा और संघ लॉबी तय समझौते के तहत अपने कोटे के टिकट हासिल कर लेगी, मगर पार्टी के जीतने पर मुख्यमंत्री तो वसुंधरा ही बनेंगी।

असल में नितिन गडकरी के अध्यक्षीय काल में ही तय था कि राजस्थान में वसुंधरा के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ा जाएगा, मगर राजनाथ सिंह के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से समीकरणों में कुछ बदलाव आया। बदलाव सिर्फ इतना कि संघ लॉबी कुछ हावी हो गई। और यही वजह रही कि आखिरी वक्त तक खींचतान मची रही। संघ लॉबी अपने गुट के कटारिया को नेता प्रतिपक्ष  बनाने पर ही राजी हुई। वजह ये कि राजनाथ सिंह व वसुंधरा राजे के संबंध कुछ खास अच्छे नहीं रहे। पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी की पराजय होने की जिम्मेदारी लेते हुए तत्कालीन प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ओम प्रकाश माथुर ने तो इस्तीफा दे दिया, लेकिन नेता प्रतिपक्ष पद से इस्तीफे की बात आई तो वसुंधरा ने इससे इंकार कर दिया था। तब राजनाथ सिंह राष्ट्रीय अध्यक्ष थे और उन्होंने कड़ा रुख अख्तियार कर लिया था। आखिरकार वसुंधरा को पद छोडऩा पड़ा था। यह बात दीगर है कि उसके बाद तकरीबन एक साल तक यह पद खाली पड़ा रहा और उसे फिर से वसुंधरा को ही सौंपना पड़ा। आखिर तक भी वसुंधरा का अपर हैंड ही रहा और जीतने के लिए सिंह के लिए यह मजबूरी हो गई कि उन्हें वसुंधरा को ही कमान सौंपनी पड़ी।

राजस्थान में वसुंधरा राजे पार्टी से कितनी बड़ी हैं और उनका कोई विकल्प ही नहीं है, इसका अंदाजा इसी बात से हो जाता है कि हाईकमान को पूर्व में भी उन्हें विधानसभा में विपक्ष के नेता पद से हटाने में एडी चोटी का जोर लगाना पड़ गया था। सच तो ये है कि उन्होंने पद छोडऩे से यह कह कर साफ इंकार कर था दिया कि जब सारे विधायक उनके साथ हैं तो उन्हें कैसे हटाया जा सकता है। हालात यहां तक आ गए थे कि उनके नई पार्टी का गठन तक की चर्चाएं होने लगीं थीं। बाद में बमुश्किल पद छोड़ा भी तो ऐसा कि उस पर करीब साल भर तक किसी को नहीं बैठाने दिया। आखिर पार्टी को मजबूर हो कर दुबारा उन्हें पद संभालने को कहना पड़ा, पर वे साफ मुकर गईं। हालांकि बाद में वे मान गईं, मगर आखिर तक यही कहती रहीं कि यदि विपक्ष का नेता बनाना ही था तो फिर हटाया क्यों? असल में उन्हें फिर बनाने की नौबत इसलिए आई कि अंकुश लगाने के जिन अरुण चतुर्वेदी को प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनाया गया, वे ही फिसड्डी साबित हो गए। पार्टी का एक बड़ा धड़ा अनुशासन की परवाह किए बिना वसुंधरा खेमे में ही बना रहा।

वस्तुत: राजस्थान में वसु मैडम की पार्टी विधायकों पर इतनी गहरी पकड़ है कि वे न केवल संगठन के समानांतर खड़ी हैं, अपितु संगठन पर पूरी तरह से हावी हो गई हैं। उसी के दम पर राज्यसभा चुनाव में दौरान वे पार्टी की राह से अलग चलने वाले राम जेठमलानी को न केवल पार्टी का अधिकृत प्रत्याशी बनवा लाईं, अपितु अपनी कूटनीतिक चालों से उन्हें जितवा भी दिया। जेठमलानी को जितवा कर लाने से ही साफ हो गया था कि प्रदेश में दिखाने भर को अरुण चतुर्वेदी के पास पार्टी की फ्रैंचाइजी है, मगर असली मालिक श्रीमती वसुंधरा ही हैं। कुल मिला कर ताजा घटनाक्रम से तो यह पूरी तरह से स्थापित हो गया है के वे प्रदेश भाजपा में ऐसी क्षत्रप बन कर स्थापित हो चुकी हैं, जिसका पार्टी हाईकमान के पास कोई तोड़ नहीं है। उनकी टक्कर का एक भी ग्लेमरस नेता पार्टी में नहीं है, जो जननेता कहलाने योग्य हो। अब यह भी स्पष्ट हो गया है कि आगामी विधानसभा चुनाव में केवल वे ही पार्टी की नैया पार कर सकती हैं।

अजमेर निवासी लेखक तेजवानी गिरधर राजनीतिक विश्लेषक के रूप में जाने जाते हैं। दैनिक भास्कर में सिटी चीफ सहित अनेक दैनिक समाचार पत्रों  में संपादकीय प्रभारी व संपादक रहे हैं। राजस्थान श्रमजीवी पत्रकार संघ के प्रदेश सचिव व जर्नलिस्ट एसोसिएशन ऑफ राजस्थान के अजमेर जिला अध्यक्ष रह चुके हैं। अजमेर के इतिहास पर उनका एक ग्रंथ प्रकाशित हो चुका है। वर्तमान में अपना स्थानीय न्यूज वेब पोर्टल संचालित करने के अतिरिक्त नियमित ब्लॉग लेखन भी कर रहे हैं।

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...