खबर है कि एनडीटीवी की अंदरूनी आर्थिक हालत ख़राब हो गयी है. चैनल के स्ट्रिंगर्स को तीन महीनों से पैसा नहीं दिया गया है. खबर लेने में भी कंजूसी बरती जा रही है. दूसरी तरफ ब्यूरो कार्यालयों में अनाप-शनाप खर्चों को लेकर भी चैनल प्रबंधन ने चिंता जाता दी है. कई कार्यालयों से ओबी वैन वापिस मंगवा ली गयी है, जो अभी तक सफ़ेद हाथी साबित हो रही थी. चर्चा है कि ऑडिट टीम ने इनके डीजल खर्चे में घालमेल पकड़ा है. इन सभी जगहों में ओबी की जगह थ्री जी बैग सिस्टम भेज दिए गए हैं.
यही नहीं ब्यूरो में लगी टैक्सियों के खर्चों पर भी सवालिया निशान लगे हैं. चर्चा है कि कई ब्यूरो प्रमुख टैक्सी मालिक भी हैं और ट्रैवल एजेंसी के मार्फ़त अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं. राजा महाराजों की तरह जिंदगी जीने वाले एनडीटीवी के रिपोर्टर्स, कैमरामैन आर्थिक सख्तियों से इन दिनों परेशान हैं. एनडीटीवी में हिंदी और अंग्रेजी में भेदभाव की भी खबरें हैं. अंग्रेजी चैनल में खर्चों में कोई कंजूसी नहीं बरती जाती, जबकि हिंदी वालों को दोयम दर्जे जैसा व्यवहार झेलना पड़ रहा है.
हिंदी रिपोर्टर्स जो कि अभी तक पांच सितारा सुविधाएँ पाते थे, उनके होटल खर्च और अन्य खर्चों पर भी पाबंदियां लगादी गयी है. चर्चा इस बात की भी है कि जब खर्चों में इतनी पाबंदियां हैं तब राज्यों में ब्यूरो और स्थानीय स्ट्रिंगर के रहते में दिल्ली से रिपोर्टर्स, कैमरामैन भेजकर भारी खर्चे क्यों किये जा रहे हैं? जबकि इतने खर्चों में स्ट्रिंगर्स का बकाया चुकाया जा सकता था, जो कि तीन महीनों से दिया नहीं गया.






