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सुख-दुख...

हुजूर मैं डायन नहीं हूँ

हिंदुस्तान चाहे जितनी तेज गति से दुनिया की महाशक्ति बनाने की ओर अग्रसर हो और प्रगति के चाहे जितने दावे किये जा रहे हों पर इसके गांवों में अभी भी सोलहवी सदी के दृश्य जीवंत हैं. विज्ञान के इस युग में प्रगति को मुंह चिढाती घटनायें अभी लगातार घट रही हैं और अन्धविश्वास के तर्कों के बहाने अकेली महिलाओं को प्रताड़ित करने और उनकी संपत्ति को हड़पने की साजिशें बदस्तूर जारी हैं. सोनभद्र जिले के बलियारिपुर ग्राम की सोमारी देवी को मकर संक्रांति के दिन ही उसके गांव के दुश्मनों में से एक शिवनारायण गौड़ ने उसे पकड़ कर डायन कहते हुए जलाते हुए कौड़ी में झोंक दिया. सोमारी ने किसी तरह भाग कर अपनी जान बचायी. उस दिन को याद करती हुयी सोमारी कहती है– मुझे अपने जलने की चिंता नहीं थी पर मेरे कान में डायन होने का आरोप गूंज रहा था.

हिंदुस्तान चाहे जितनी तेज गति से दुनिया की महाशक्ति बनाने की ओर अग्रसर हो और प्रगति के चाहे जितने दावे किये जा रहे हों पर इसके गांवों में अभी भी सोलहवी सदी के दृश्य जीवंत हैं. विज्ञान के इस युग में प्रगति को मुंह चिढाती घटनायें अभी लगातार घट रही हैं और अन्धविश्वास के तर्कों के बहाने अकेली महिलाओं को प्रताड़ित करने और उनकी संपत्ति को हड़पने की साजिशें बदस्तूर जारी हैं. सोनभद्र जिले के बलियारिपुर ग्राम की सोमारी देवी को मकर संक्रांति के दिन ही उसके गांव के दुश्मनों में से एक शिवनारायण गौड़ ने उसे पकड़ कर डायन कहते हुए जलाते हुए कौड़ी में झोंक दिया. सोमारी ने किसी तरह भाग कर अपनी जान बचायी. उस दिन को याद करती हुयी सोमारी कहती है– मुझे अपने जलने की चिंता नहीं थी पर मेरे कान में डायन होने का आरोप गूंज रहा था.

हालांकि पुलिस ने दूसरे दिन आरोपी को गिरफ्तार कर लिया पर सोमारी के माथे का कलंक आज भी कायम है. कोडरमा की सावित्री की जिंदगी तब तक एक सामान्य सी गति से चल रही थी जब तक उसके ससुराल में २५ वर्ष के युवक सरोज दास की मौत ट्रेन से कट कर नहीं हो गयी. इस मौत के बाद ही सावित्री को ससुराल वालों ने डायन करार दे दिया. पड़ोस के जिले से ओझा बुलाया  गया जिसने तमाम नाटकों के बाद सावित्री के डायन होने की तस्दीक कर दी. ओझा ने डायन को जलाने का प्रस्ताव रखा. अन्धविश्वास का असर इतना था की सावित्री की बेटी ने भी उस पर हामी भर दी. मगर सावित्री के बेटे की हिम्मत ने उसे बचा लिया. पर आज भी समाज उसे डायन ही कहता है और उसे गांव में अलग थलग कर दिया गया है. उसके घर पर आये दिन पथराव होता है.

सोनभद्र की मनबसिया को डायन करार देने के बाद उसे कुल्हाड़ी से मारने के पहले लाठियों से पीटा गया. मनबसिया को भी अपने पट्टीदार के बच्चे की मौत का जिम्मेदार माना गया था. हमले के समय डरा हुआ उसका पति बाद में उसे घर लाया. मनबसिया के आरोपी जमानत पर छूटे हुए हैं और उसे धमकाते रहते हैं. ज़लालत की मार सहते हुए मनबसिया पूरी तरह टूट चुकी है. म्योरपुर की जगेसरी के साथ भी इसी तरह की घटना घटी. उसकी चचेरी  बहन के दो बच्चे बीमारी के कारण मर चुके थे और बेटी सोनिया बीमार चल रही थी. रात में सोनिया की भी मौत हो गयी. जब जगेसरी वह पहुची तो उसे डायन कहते हुए उसपर हमला कर दिया गया. आरोप लगाया गया की डायन होने के कारण जगेसरी ने सोनिया को खा लिया. अगले दिन सोनिया की लाश निकल कर जगेसरी के गोद में डाल दिया गया और ओझा ने उससे इसे जिन्दा करने को कहा. असफल होने पर जगेसरी की जीभ काट दी गयी और उसे मुर्गियों को खिला दिया गया. पुलिस के आने से जगेसरी की जान तो बच गयी पर उसके जान पर खतरा अभी भी बढ़ा हुआ है.

जगेसरी, सोमारी और मनबसिया सरीखी अनगिनत महिलायें डायन होने का दंश झेल रही है. ऐसी ही एक दर्जन महिलाओं की पहचान कर पुनर्वासित और सम्मानित करने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ता डा. लेनिन कहते हैं: वास्तविकता तो यह है कि इन सारे मामलों के पीछे संपत्ति हड़पने की साजिश प्रमुख होती है. सुदूर गांवों के बंद समाज में अभी भी अन्धविश्वाश कायम है और वही इस तरह की साजिशों का आधार बनाता है. मानवाधिकार जन निगरानी समिति की श्रुति नागवंशी इन महिलाओं के पुनर्वास में लगी हैं. श्रुति के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन महिलाओं को समाज की मुख्यधारा में वापस पुनर्स्थापित करना है. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के जी तोड़ प्रयासों के बाद भी डायन का दंश झेल रही इन बेक़सूर महिलाओं का मुख्यधारा में आ पाना अभी दूर की कौड़ी ही लगता है.

लेखक उत्कर्ष कुमार सिन्हा सोशल एक्टिविस्ट और वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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