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टीवी चैनल बात का बतंगड बनाते हैं और गैर-जरूरी विवाद पैदा करते हैं?

जानेमाने समाजशास्त्री आशीष नंदी और अभिनेता शाहरुख खान के हालिया भाषण और लेख पर शुरू हुए विवाद में न्यूज मीडिया खासकर टी.वी न्यूज की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं कि क्या वे बात का बतंगड बनाते हैं और गैर-जरूरी विवाद पैदा करते हैं? यह भी कि क्या मीडिया जानबूझकर अधिक से अधिक पाठक या दर्शक आकर्षित करने के लिए ये विवाद पैदा करता है? क्या इसके लिए वह घटनाओं, बयानों, मुद्दों और प्रसंगों को उनके व्यापक सन्दर्भों, परिप्रेक्ष्यों, पृष्ठभूमि और अन्तर्निहित प्रक्रियाओं से काटकर पेश करता है? क्या न्यूज मीडिया खासकर टी.वी न्यूज का सनसनीखेज चरित्र उसकी स्वभावगत विशेषता है?

जानेमाने समाजशास्त्री आशीष नंदी और अभिनेता शाहरुख खान के हालिया भाषण और लेख पर शुरू हुए विवाद में न्यूज मीडिया खासकर टी.वी न्यूज की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं कि क्या वे बात का बतंगड बनाते हैं और गैर-जरूरी विवाद पैदा करते हैं? यह भी कि क्या मीडिया जानबूझकर अधिक से अधिक पाठक या दर्शक आकर्षित करने के लिए ये विवाद पैदा करता है? क्या इसके लिए वह घटनाओं, बयानों, मुद्दों और प्रसंगों को उनके व्यापक सन्दर्भों, परिप्रेक्ष्यों, पृष्ठभूमि और अन्तर्निहित प्रक्रियाओं से काटकर पेश करता है? क्या न्यूज मीडिया खासकर टी.वी न्यूज का सनसनीखेज चरित्र उसकी स्वभावगत विशेषता है?

ये और ऐसे ही अनेकों सवाल एक बार फिर से चर्चाओं में हैं. ताजा प्रसंग में न्यूज मीडिया खासकर न्यूज चैनलों की अपढ़ता और निष्कर्ष निकालने की जल्दबाजी के गंभीर खतरों को लेकर बहस शुरू हो गई है. खासकर इस साल के शुरू में जिस तरह से न्यूज मीडिया खासकर न्यूज चैनलों के एक बड़े हिस्से ने एल.ओ.सी पर भारत-पाकिस्तान की सेनाओं के बीच हुई झड़पों को जिस युद्धोन्मादी अंदाज़ और तेवर में पेश किया, उससे दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गया और स्थिति हाथ से निकलते-निकलते बची. इसके बाद समाजशास्त्री आशीष नंदी के बयान और अभिनेता शाहरुख खान के लेख को जिस तरह से सन्दर्भों और परिप्रेक्ष्य से काटकर पेश किया गया, उससे मीडिया की भूमिका को लेकर बहस और तेज हो गई है.

हालाँकि मीडिया खासकर टी.वी न्यूज को लेकर उठनेवाले ये सवाल नए नहीं हैं. उल्लेखनीय है कि बी.बी.सी के महानिदेशक रहे जान बर्ट ने ७० के दशक के मध्य में टेलीविजन न्यूज के बारे में एक बहुत महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी कि इसमें समझदारी के विरुद्ध एक पूर्वाग्रह है. उनके कहने का तात्पर्य यह था कि टी.वी न्यूज में दृश्यों पर अत्यधिक जोर के कारण उसमें उनके विश्लेषण और अर्थ को स्पष्ट करने की क्षमता सीमित होती है. यही कारण है कि टी.वी न्यूज किसी घटना के लिए जिम्मेदार प्रक्रियाओं, उसकी पृष्ठभूमि, सन्दर्भ और बारीकियों के भीतर गहराई से जाने के बजाय उसे बहुत ही सतही स्तर पर पकड़ता और पेश करता है.

असल में, भारत में मीडिया खासकर टी.वी न्यूज के अंदर सनसनी और विवाद पैदा करने की इस प्रवृत्ति के पीछे बुनियादी कारण उसके आर्थिक-बिजनेस ढाँचे/माडल और न्यूजरूम की सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना में निहित है. हुआ यह है कि पिछले डेढ़ दशकों में देश में न्यूज मीडिया खासकर न्यूज चैनलों की संख्या तेजी से बड़ी है और इसके साथ ही उनके बीच अधिक से अधिक पाठक या दर्शक खींचने की होड़ तेज और तीखी हुई है. इसकी वजह यह है कि उनकी आय और राजस्व का मुख्य स्रोत विज्ञापन हैं जो पाठकों/दर्शकों की संख्या और उनकी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि पर निर्भर करते हैं.

नतीजा यह कि अधिक से अधिक पाठक (रीडरशिप) और दर्शक (टी.आर.पी) खींचने के लिए उनमें प्रतिस्पर्द्धा बढ़ती जा रही है बल्कि इस होड़ में पत्रकारिता के मूल्य, नियम और एथिक्स को भी ताक में रखने में हिचक नहीं हो रही है. यही नहीं, इस होड़ में एक-दूसरे की नक़ल और एक ही जैसी रिपोर्टिंग की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है. इसकी वजह यह है कि सभी न्यूज चैनलों को लगता है कि अगर उन्होंने धारा के विरुद्ध जाकर रिपोर्टिंग की या मुद्दे उठाये या ख़बरें की तो वे पिछड़ जाएंगे और उनके प्रतिद्वंद्वी सारे दर्शक/पाठक बटोर ले जाएंगे.

यही कारण है कि जैसे एक चैनल किसी विवादस्पद मुद्दे को उठाता है, बाकी भी उसी की ओर लपक पड़ते हैं. दूसरे, दर्शकों/पाठकों का ध्यान लगातार आकर्षित करने के लिए उनपर हमेशा विवादस्पद मुद्दों/घटनाओं/बयानों की खोज का दबाव रहता है. ऐसे में, जब कोई विवाद या सनसनीखेज घटना नहीं होती है तो वे उससे ‘निर्मित’ (मैन्युफैक्चर) करने तक पहुंच जा रहे हैं. कहने की जरूरत नहीं है कि ताजा मामलों में भी मीडिया ने सनसनी/विवाद को ‘निर्मित’ करने की कोशिश की है.

लेकिन ताजा प्रसंग में न्यूज मीडिया खासकर न्यूज चैनलों की अपढ़ता भी खुलकर सामने आ गई है. यह किसी से छुपा नहीं है है कि मीडिया के अंदर गंभीर पढ़ने-लिखने की प्रवृत्ति कम हुई है और उसमें काम करनेवाले पत्रकारों और संपादकों का रिश्ता भी अकादमिक दुनिया से कमजोर हुआ है. इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि अखबारों में साहित्य और अकादमिक गतिविधियों की कवरेज लगातार कम से कमतर होती गई है. कवरेज की गुणवत्ता में गिरावट आई है. खासकर न्यूज चैनलों में तो साहित्य और अकादमिक दुनिया एक तरह से अघोषित रूप से प्रतिबंध का शिकार है. शायद ही किसी अखबार या चैनल में साहित्य या अकादमिक जगत को कवर करने के लिए बीट या खास संवाददाता हो.

आश्चर्य नहीं कि जब साहित्य या अकादमिक दुनिया में चलनेवाली बहसों को रिपोर्ट करने की बारी आती है तो मीडिया खासकर चैनलों की सीमाएं खुलकर सामने आ जाती हैं. यही कारण है कि जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में आशीष नंदी के बयान को न सिर्फ सन्दर्भ से काटकर पेश किया गया बल्कि उसे सनसनीखेज बनाने में मीडिया खासकर चैनलों की बड़ी भूमिका था. यही बात शाहरुख खान के लेख को लेकर भी सामने आई जिसे बिना पूरा सन्दर्भ के पेश किया गया. दोहराने की जरूरत नहीं है कि इन सभी प्रसंगों में मीडिया खासकर न्यूज चैनल खुद विवादों के घेरे में आ गए हैं और उनकी अपढ़ता और सनसनीखेज खबरें निर्मित करने की खतरनाक होती प्रवृत्ति उजागर हुई है.

ऐसा लगता है कि न्यूज चैनल लोगों की समझ को बिगाड़ने के मिशन पर निकल पड़े हैं और समझदारी के खिलाफ पूर्वाग्रह उनके डी.एन.ए में आ गया है. यह समूचे न्यूज मीडिया के लिए खतरे की घंटी है क्योंकि अखबारों में भी धीरे-धीरे चैनलों के नक़ल की प्रवृत्ति बढ़ रही है. इससे न्यूज मीडिया की विश्वसनीयता सवालों के घेरे में आ गई है. यह उसके भविष्य और उससे अधिक भारतीय लोकतंत्र के लिए अच्छी खबर नहीं है.

आईआईएमसी के प्रोफेसर आनंद प्रधान का यह लेख हरिभूमि में प्रकाशित हो चुका है. इसे उनके ब्‍लॉग तीसरा रास्‍ता से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है.

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