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लोकपाल से भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी?

संपूर्ण विश्व में भ्रष्टाचार का बोलबाला है। हमारा देश भी इसका अपवाद नहीं है, भ्रष्ट देशों की सूची में हम ऊंचे पायदान पर खड़े हैं। पर हाल के वर्षों में भ्रष्टाचार की व्यापकता में अकूत वृद्धि हुई है। इतने घोटाले हो चुके हैं कि अब नये घोटाले के खुलासे पर किसी की पेशानी पर शिकन तक नहीं आती है। भ्रष्टाचार की परिभाषा और दायरा काफी व्यापक है। रिश्वतखोरी के अलावा यदि हम अपना काम समय से या ईमानदारी पूर्वक नहीं करते हैं तो वह भी भ्रष्टाचार है। आज भ्रष्टाचार हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है और हम सभी किसी न किसी स्तर पर इसमें भागीदार हैं।

संपूर्ण विश्व में भ्रष्टाचार का बोलबाला है। हमारा देश भी इसका अपवाद नहीं है, भ्रष्ट देशों की सूची में हम ऊंचे पायदान पर खड़े हैं। पर हाल के वर्षों में भ्रष्टाचार की व्यापकता में अकूत वृद्धि हुई है। इतने घोटाले हो चुके हैं कि अब नये घोटाले के खुलासे पर किसी की पेशानी पर शिकन तक नहीं आती है। भ्रष्टाचार की परिभाषा और दायरा काफी व्यापक है। रिश्वतखोरी के अलावा यदि हम अपना काम समय से या ईमानदारी पूर्वक नहीं करते हैं तो वह भी भ्रष्टाचार है। आज भ्रष्टाचार हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है और हम सभी किसी न किसी स्तर पर इसमें भागीदार हैं।

देश की नसों में दौडने वाले भ्रष्टाचार पर प्रभावी रोकथाम के लिए पिछले दो वर्षों से समाजसेवी अन्ना हजारे जन लोकपाल बिल के लिए संघर्षरत हैं लेकिन सरकार उनके विचारों पर ध्यान देने की बजाय मन मुताबिक लोकपाल बिल बनाने पर अमादा है। कानून के जानकार मानते हैं कि मौजूदा कानून भ्रष्टाचार को रोकने में पूरी तरह सक्षम है। ऐसे में अहम् सवाल यह है कि अन्ना जन लोकपाल कानून के लिए संघर्षरत क्यों हैं। क्या जन लोकपाल कानून भ्रष्टाचार की बीमारी को ठीक करने की रामबाण औषधि साबित होगा। अगर भ्रष्टाचार पर जनलोकपाल कानून से रोक लग सकती है तो फिर सरकार को इससे क्या परेशानी है। अन्ना और सरकार मिलकर कहीं देश की जनता का भ्रष्टाचार के मुद्दे से ध्यान हटाने और पनपते आक्रोश को ठण्डा करने के लिए षडयंत्र तो नहीं कर रहे हैं।

पिछले एक दशक में हुए घोटालों ने नये-पुराने सारे रिकार्ड ध्वस्त कर दिये हैं। इन बड़े घोटालों के अलावा छोटे स्तर पर भी भ्रष्टाचार बजबजा रहा है। आज यह आम जीवन में इस तरह से घुल-मिल गया है कि कोई भी यह दावा नहीं कर सकता है कि उसके दामन पर भ्रष्टाचार का दाग नहीं लगा हुआ है। चपरासी से लेकर प्रधानमंत्री तक इस भ्रष्टाचार में संलिप्त हैं। व्यापारी और कॉरपोरेट समूह इसमें सबसे आगे हैं। जिस तरह से पैसा से पैसा बनता है। उसी तरह भ्रष्टाचार से भ्रष्टाचार में और भी इजाफा होता है। लेकिन भ्रष्टाचार के इस विकृत स्वरुप से किसी को कोई सरोकार नहीं है। हम अपनी दिनचर्या में हर पल गलत तरीके से फायदा लेना चाहते हैं। दस-बीस रुपये के लिए अपना ईमान बेचना आज आम बात बन चुका है। इसतरह से देखा जाए तो हर व्यक्ति अपने फायदे के लिए दूसरे का नुकसान करने पर आमादा है।

लोकपाल कानून पर मचे ताजा विवाद और जनलोकपाल और सरकारी बिल में अंतर समझना जरूरी है। सरकारी लोकपाल के पास भ्रष्टाचार के मामलों पर खुद या आम लोगों की शिकायत पर सीधे कार्रवाई शुरू करने का अधिकार नहीं होगा। प्रस्तावित जनलोकपाल बिल के तहत लोकपाल खुद किसी भी मामले की जांच शुरू करने का अधिकार रखता है। सरकारी विधेयक में लोकपाल केवल परामर्शदात्री संस्था बन कर रह जाएगी। जनलोकपाल सशक्त संस्था होगी। सरकारी विधेयक में लोकपाल के पास पुलिस शक्ति नहीं होगी। जनलोकपाल न केवल प्राथमिकी दर्ज करा पाएगा बल्कि उसके पास पुलिस फोर्स भी होगी। सरकारी विधेयक में लोकपाल का अधिकार क्षेत्र सांसद, मंत्री और प्रधानमंत्री तक सीमित रहेगा। जनलोकपाल के दायरे में प्रधानमत्री समेत नेता, अधिकारी, न्यायाधीश सभी आएंगे। लोकपाल में तीन सदस्य होंगे जो सभी सेवानिवृत्त न्यायाधीश होंगे। जनलोकपाल में 10 सदस्य होंगे और इसका एक अध्यक्ष होगा। चार की कानूनी पृष्ठभूमि होगी। बाकी का चयन किसी भी क्षेत्र से होगा।

सरकार द्वारा प्रस्तावित लोकपाल को नियुक्त करने वाली समिति में उपराष्ट्रपति। प्रधानमंत्री, दोनो सदनों के नेता, दोनों सदनों के विपक्ष के नेता, कानून और गृहमंत्री होंगे। प्रस्तावित जनलोकपाल बिल में न्यायिक क्षेत्र के लोग, मुख्य चुनाव आयुक्त, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, भारतीय मूल के नोबेल और मैगासेसे पुरस्कार के विजेता चयन करेंगे। सरकारी लोकपाल विधेयक में दोषी को छह से सात महीने की सजा हो सकती है और घोटाले के धन को वापिस लेने का कोई प्रावधान नहीं है। जनलोकपाल बिल में कम से कम पांच साल और अधिकतम उम्र कैद की सजा हो सकती है। साथ ही दोषियों से घोटाले के धन की भरपाई का भी प्रावधान है। सरकार ने सिविल सोसायटी के ड्राफ्ट को शुरुआती दौर में ही खारिज कर दिया था, ऐसे में सरकार से यह उम्मीद करना कि वो जनआंकक्षाओं के अनुरूप कोई निर्णय लेगी बेवकूफी के सिवाय कुछ और नहीं है। टीम अन्ना भी बिखर चुकी है, केजरीवाल सियासत के मैदान में उतर चुके हैं और जनता का जोश भी ठण्डा पड़ चुका है। सरकार बेईमान और भ्रष्टों का पुरस्कृत करने का काम कर रही है।

पटना के गांधी मैदान में अन्ना ने रैली कर सरकार को अपनी ताकत का एहसास कराया और आंखें तो जरूर तरेरी लेकिन सच्चाई है कि उनके पीछे उमड़ी भीड़ में सिर्फ निम्न व मध्यम वर्ग के लोग हैं। कुछ के राजनीतिक पार्टी के कार्यकर्त्ता होने से इंकार नहीं किया जा सकता है। इस भीड़ में मस्ती करने वाले भी हैं जिनको जनलोकपाल के बारे में कुछ नहीं मालूम है और न ही भ्रष्टाचार से कोई लेना-देना है। बावजूद इसके मशाल व कैंडल लाईट मार्च करने की चोंचलेबाजी बढ़ती चली जा रही है। देश में करोड़ों लोग भूख, अकाल, कुपोषण, दंगे, विस्थापन, निर्वासन, शोषण, लूट, भ्रष्टाचार, अन्याय, उत्पीड़न, बाढ़, बीमारियों के शिकार हैं। एक अकेले भ्रष्टाचार दूर करने या कम करने के लिये लोकपाल बनाकर सभी समस्याओं का समाधान ढूंढने की राजनीति करने की रणनीति आधुनिक लोकतंत्रवादियों का ऐसा हथियार हैं जिसे साधारण जनता समझ ही नहीं पा रही है। मेहनतकश वर्ग आजादी के इतने वर्ष गुजर जाने पर अपने आपको ठगा सा महसूस कर रहा हैं। देश में आजादी के समय कृषि पर भगभग 80 फीसदी से अधिक जनसंख्या निर्भर थी तथा उनका राष्ट्रीय आय में योगदान लगभग 67 फीसदी के आसपास था। आज लगभग 66 फीसदी जनसंख्या कृषि पर निर्भर हैं तथा उनका राष्ट्रीय आय में योगदान लगभग 12 फीसदी के आसपास ही रह गया है। क्या हम इस समस्या की गंभीरता को नहीं पहचानते? क्या यह स्थिति केवल भ्रष्टाचार के कारण उत्पन हुयी हैं? क्या इसके पीछे देश की जन-विरोधी सामाजिक-राजनीतिक नीतियां व व्यवस्था दोषी नहीं हैं? वर्तमान घोटाले व भ्रष्टाचार के कांड जन-विरोधी सामाजिक-आर्थिक नीतियों से पैदा हुआ था उससे मेहनतकश जनता का ध्यान हटाने के लिये लोकपाल को मुद्दा बनाया गया।

जनलोकपाल विधेयक को भ्रष्टाचार निवारण का सबसे बड़ा हथियार माना जा रहा है। जबकि यह आधा सच है। सरकारी संस्थानों को तो अन्ना जनलोकपाल की परिधि में ला रहे हैं, किंतु निजी क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार का निवारण कैसे होगा या हम अपने अंतस के अंदर शुचिता का संचार कैसे करेंगे, जैसे मुद्दों पर अन्ना चुप हैं। प्रधानमंत्री, न्यायाधीश और संसद को लोकपाल के दायरे में लाने से भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया जा सकेगा, यह निरूसंदेह संदेहास्पद है। दरअसल आज भ्रष्टाचार लाइलाज रोग बन चुका है और इसका फैलाव हमारे पूरे शरीर में हो चुका है। सच कहा जाए तो वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भ्रष्टाचार व्यापार बन चुका है तथा हम इसकी जमकर खरीद-फरोख्त कर रहे हैं। स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार हमें दिलोजान से पंसद है। जो भीड़ अन्ना के आगे-पीछे घूम रही है वह भी दिल पर हाथ रखकर अपने को ईमानदार नहीं कह सकती है। दूसरी बात यह है कि जिस व्यवस्था में परिवर्तन लाने की बात अन्ना कर रहे हैं, उसके ठोस विकल्प फिलहाल तो उनके पास भी नहीं है। गौरतलब है कि जनलोकपाल का उद्देश्य जनोन्मुख है। इसलिए आम जनता का इसके साथ जुड़ाव होना स्वभाविक है। लेकिन यह कहना कि इससे भ्रष्टाचार का खात्मा किया जा सकता है, गलत होगा।

लेखक डा. आशीष वशिष्‍ठ स्‍वतंत्र पत्रकार हैं.

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