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प्रिंट-टीवी...

क्‍या अब नेशनल टीवी चैनल पर भी न्‍यूज फिक्सिंग होने लगी है?

 

विश्व हिंदू परिषद के अशोक सिंघल अतर्ध्यान थे. मीडिया में कहीं दिख नहीं रहे थे. खबरों से गायब थे. मान लिया गया था कि राम मंदर आंदोलन अस्ताचल की ओर जा रहा है. तभी अचानक से एक नैशनल हिंदी न्यूज चैनल उन्हें रात 10 बजे अपने प्राइम टाइम प्रोग्राम में लेकर प्रकट होता है और अशोक सिंघल को पूरा-पूरा मौका देता है कि एक खास समुदाय के खिलाफ वो जितना विष उगल सकते हैं, उगलें. भावनाएं भड़काएं. राम नाम और हिंदुत्व का राग अलापें.

 

विश्व हिंदू परिषद के अशोक सिंघल अतर्ध्यान थे. मीडिया में कहीं दिख नहीं रहे थे. खबरों से गायब थे. मान लिया गया था कि राम मंदर आंदोलन अस्ताचल की ओर जा रहा है. तभी अचानक से एक नैशनल हिंदी न्यूज चैनल उन्हें रात 10 बजे अपने प्राइम टाइम प्रोग्राम में लेकर प्रकट होता है और अशोक सिंघल को पूरा-पूरा मौका देता है कि एक खास समुदाय के खिलाफ वो जितना विष उगल सकते हैं, उगलें. भावनाएं भड़काएं. राम नाम और हिंदुत्व का राग अलापें.
 
इस क्रम में ऐसा लग रहा था कि प्रोग्राम की एंकरिंग करने वाले 'नामी पत्रकार' बंधु और न्यूज चैनल, अशोक सिंघल की पीआरशिप कर रहे हैं…एंकर उन्हें बोलने का पूरा मौका देता है और ऐसा लगता है कि अशोक सिंघल किसी टीचिंग क्लास में लेक्चर दे रहे हैं और एंकर एक आदर्श छात्र की तरह उन्हें देख-सुन रहा है…
 
एंकर महोदय बड़े पत्रकार माने जाते हैं…कहा जाता है कि राजनीतिक मामलों पर उनकी अच्छी पकड़ है लेकिन उनको सांप सूंघ जाता है…वे चुप रहते हैं… ऐसे मौकों पर देखा जाता है कि एंकर अगर तेज-तर्रार हो और खबर पर उसकी पकड़ हो, तो वह सामने वाले को उसकी बात में ही लपेट कर grill करता है…लेकिन यहां एंकर साब तमाशा देखते रहते हैं…पूरा प्रोग्राम देखकर ऐसा लग रहा था कि VHP और अशोक सिंघल ने विश्वसनीय चैनल का prime time खरीद लिया है…यह कुछ ऐसा ही लग रहा था, जब कई चैनलों पर SLOT खरीदकर जयोतिषाचार्य आते हैं और एंकर उनसे वहीं पूछता-बोलता है, जो सब पहले से ही fix होता है…
 
आखिर में climax आता है…पता नहीं ये fix था या नहीं लेकिन अशोक सिंघल घोषणा करते हैं कि 7 फरवरी को इलाहाबाद में संत समाज ऐसा फैसला करेगा, जो देश का इतिहाल बदल देगा….सिंघल का यह 'ऐतिहासिक उवाज' खबर बनती है और फिर दूसरे चैनल भी इस पर पिल पड़ते हैं…
 
दरअसल टीवी मीडिया को मैं इस मामले में बड़ा सशक्त मानता हूं कि उसमें बातचीत के दौरान व्यक्ति के हाव-भाव भी बहुत कुछ कहते हैं और अगर एंकर-पत्रकार दमदार हो, तो सामने वाले की पोल-पट्टी खुलने में देर नहीं लगती…या तो वह खिसिया कर लैपल माइक उखाड़ कर-फेंक कर, वहां से भाग जाता है या फिर बगलें झांकता हुआ अपनी बेशर्मी का शानदार प्रदर्शन करता रहता है…
 
लेकिन अशोक सिंघल से हुई इस बातचीत में ऐसा कूछ भी नहीं था…सिर्फ वही बोल रहे थे और बीच-बीच में अपनी उपस्थिति दिखाने के लिए एंकर साब भी मुंह खोल ले रहे थे…आखिर में सिंघल साब 'राष्ट्र के नाम संदेश' देकर चलते बने…शंखनाद हो चुका था…रामधुन सुनाई पड़ रही थी…
 
लेकिन एक दर्शक की हैसियत से मैं ठगा सा महसूस कर रहा था…मेरे जैसे कम लिखने-पढ़ने वाले पत्रकार के ही मन में कई सवाल थे, जो अगर अशोक सिंघल से पूछ लिया जाता तो टीवी पर, देश के सामने वो पानी-पानी हो जाते…फिर भी ना जाने क्यों, सबसे विश्वसनीय चैनल में नए-नवेले आए उन भारी-भरकम पत्रकार बंधु ने सिंघल साब को खुला मैदान क्यों दे दिया, खेलने के लिए…
 
क्या match fixing की तरह अब नेशनल टीवी पर NEWS FIXING भी होने लगी है…???!!! दुखद तो ये है कि दर्शक-पाठक को न्यूज रूम में बैठा व्यक्ति अभी भी 'मूर्ख गुड़िया' मानता है लेकिन उसे ये पता नहीं कि सूचना क्रांति के इस युग में आपका पाठक-दर्शक आपसे ज्यादा AWARE हैं और चोरी पकड़ते उसे देर नहीं लगती.
 
पत्रकार नदीम एस अख्‍तर के फेसबुक वॉल से साभार. 
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