राहुल कोटियाल : राजेन टोडरिया जी के लेख तब से पढता आ रहा हूँ जब उनका अर्थ समझ पाने की सोच भी पैदा नहीं हुई थी. उस वक्त से जब पत्रकार के नाम पर सिर्फ टोडरिया जी का नाम ही याद आता था. बचपन के उस दौर में उनकी बातों की गहराई को तो समझ नहीं पाता था लेकिन उनकी लेखनी ने हमेशा प्रभावित किया. छात्र जीवन में भी जब उन्हें पढता तो कई बार उनके विचारों से सहमत नहीं हो पाता था लेकिन फिर भी उनकी लेखनी में जो धार होती थी उससे प्रभावित होने से खुद को कभी रोक नहीं पाया.
वो जिस धार के साथ लिखा करते थे उतने ही प्रभावी अंदाज़ में अपनी बातों को मौखिक रूप में भी प्रस्तुत करते थे. कई मुद्दों
पर उनसे बहस हुई लेकिन अपनी बातों को बयां करने का जो अंदाज़ टोडरिया जी का था, बहुत की कम लोग वैसा कर पाते हैं. उनकी एक और खासियत जो प्रभावित करती थी वह यह कि भले ही उनके आलोचकों ने उन पर कई व्यक्तिगत हमले किये हों लेकिन उन्होंने हमेशा अपने तर्कों और वैचारिक बातों से ही सबका जवाब दिया. उन्हें कभी किसी पर व्यक्तिगत आरोप लगाते नहीं देखा …. अपने उन निंदकों पर भी नहीं, जिन्होंने उन पर खूब व्यक्तिगत होकर लिखा ….. मैं और मेरे कई युवा साथियों ने हमेशा उनकी लेखनी को आदर्श मान कर यह बातें की हैं कि यदि उनकी लेखनी की धार का एक अंश मात्र भी हम अपने लेखों में उतार पाए तो बड़ी कामयाबी होगी. इस बात पर विश्वास कर पाना बहुत ही मुश्किल हो रहा है कि अब वो हमारे बीच नहीं रहे. उनका जाना उत्तराखंड के लिए एक बड़ी क्षति है….
राहुल कोटियाल के ये विचार फेसबुक पर प्रकाशित हो चुके हैं.





