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भारतीय मीडिया के बारे में भ्रामक है विश्‍व प्रेस इंडेक्‍स की रिपोर्ट

“रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स” नामक गैर –सरकारी संस्था की “वर्ल्ड प्रेस इंडेक्स” शीर्षक ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार प्रेस की आज़ादी में भारत दस साल में न्यूनतम रैंक पर आ गया है. रिपोर्ट का मतलब है कि भारत में इन दस सालों में मीडिया की स्वतन्त्रता राज्य अभिकरणों द्वारा बाधित की गयी है याने लोकतंत्र की जड़ें कमजोर हुई हैं. रिपोर्ट के अनुसार भारत विश्व के १७९ देशों में जहाँ २००२ में १३१वें पायदान पर था, सन २०१२ की दिसम्बर माह तक आते –आते १४०वें पायदान पर फिसल गया.

“रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स” नामक गैर –सरकारी संस्था की “वर्ल्ड प्रेस इंडेक्स” शीर्षक ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार प्रेस की आज़ादी में भारत दस साल में न्यूनतम रैंक पर आ गया है. रिपोर्ट का मतलब है कि भारत में इन दस सालों में मीडिया की स्वतन्त्रता राज्य अभिकरणों द्वारा बाधित की गयी है याने लोकतंत्र की जड़ें कमजोर हुई हैं. रिपोर्ट के अनुसार भारत विश्व के १७९ देशों में जहाँ २००२ में १३१वें पायदान पर था, सन २०१२ की दिसम्बर माह तक आते –आते १४०वें पायदान पर फिसल गया.

शायद विश्व स्तर पर प्रजातंत्र और उसकी मूल अवधारणाओं को लेकर इतनी बचकानी लेकिन घातक रिपोर्ट पहले कभी नहीं आई है. रिपोर्ट बनाने वालों ने ना तो इसकी समझ है कि तथ्यों को प्रजातंत्र की मूल अवधारणाओं से कितना जोड़ा जाये और ऐसा करते वक़्त किस हद तक तात्कालिक परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाये, ना हीं वे यह जानते हैं कि अनेक पहचान-समूह वाले समाज में राज्य की भूमिका किस तरह की होती है खासकर उस समाज में जहाँ धर्म, जाति, उप-जाति, क्षेत्र एवं भाषाई आधार पर एक-दूसरे से द्वंदात्मक समन्वयता सम्बन्ध रहे हों.

भारत में मीडिया (प्रेस) की आज़ादी को लेकर उस समय अन्तर्राष्ट्रीय संस्था आरोप लगा रही है, जिस समय देश की सरकार ने सूचना का अधिकार दे कर लोकतंत्र की गुणवत्ता को आसमान पर पहुंचा दिया हो और जिस समय एक नहीं दो-दो देशव्यापी लेकिन पूर्णरूप से अहिंसक आन्दोलनों ने सत्ता वर्ग की चूलें हिला दी हों. कहना न होगा कि इन दोनों आन्दोलनों में —एक भ्रष्टाचार के खिलाफ और दूसरा बलात्कार को लेकर – मीडिया की भूमिका अप्रतिम रही है.

रिपोर्ट पढ़ने से ऐसा लगता है कि भारत में पिछले दस सालों में सत्ता में बैठे लोगों ने मीडिया को दबाने और नतीज़तन लोकतंत्र के मूल पर आघात करने की सफल कोशिश की हो. यह बात सही है कि सत्ता और मीडिया का द्वंदात्मक सम्बन्ध रहा है और ऐसे मौके आयें है जब एक समय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया खासकर न्यूज़ चैनलों पर लगाम लगने की एक सरकारी कोशिश हुई जब इनके खिलाफ एक कानून का मसौदा तैयार किया गया. लेकिन यह भारतीय प्रजातंत्र की खूबी है कि ऐसी कोशिशे स्वतः हीं सत्तावर्ग ने दबाव देखते हुए ख़ारिज की. सभी संपादकों ने अपना विरोध ऐसे किसी दुष्प्रयास के खिलाफ देश सबसे बड़ी सत्ताधारी पार्टी की मुखिया सोनिया गाँधी और देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के यहाँ दर्ज करायी. स्वयं दोनों नेताओं ने इसे गलत बताया और कानून का मसौदा ठन्डे बस्ते में डाल दिया गया.

उधर इलेक्ट्रॉनिक चैनलों के संपादकों ने अपने न्यूज़ के विषयवस्तु को अधिकाधिक जनोपादेय बनाने के लिए एक संस्था “ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन बनायीं और स्व-नियंत्रण की रह पर चलने लगे. सत्ता पक्ष हीं नहीं सभी वे लोग जो लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका को लेकर संजीदा थे, इस प्रयास की सार्थकता को पिछले तीन वर्षों में सराहा. यह सही है कि गाहे-बी-गाहे आज भी कुछ लोग मीडिया को सरकार द्वारा परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से नियंत्रित किये जाने की बात करते हैं, लेकिन यह प्रजन्तंत्र का आभूषण है जिसमे विरोधी स्वर को द्वन्द के भाव से नहीं बल्कि आत्म-शुद्धि के नए प्रयास के रूप में मीडिया देखती है.

वर्ल्ड प्रेस इंडेक्स की वर्तमान रिपोर्ट में भारत का स्थान नौ बिंदु नीचे गूगल के एक अधिकारी के हाल के बयान के आधार पर किया गया है जिसमे इस अधिकारी का कहना था कि सरकार के अधिकारियों ने सोशल मीडिया खासकर गूगल से कई बार इस आशय से कि कुछ टिप्पणियां उपद्रव उभर सकती है, निवेदन किया कि वह अपने साईट से उन टिप्पणियों को हटा लें. यहाँ यह साफ़ करना ज़रूरी है कि सरकार अगर कहीं कानूनों का अभिव्यक्ति को लेकर दुरुपयोग करने कि कोशिश कराती भी है तो स्वयं प्रजातान्त्रिक शक्तियां, अदालत और मीडिया इतना बड़ा दबाव बना देती है कि ऐसे प्रयास सफल होना तो दूर, सरकार की किरकिरी का सबब बन जाते है. हाल में बाल ठाकरे के निधन के बाद एक युवा लड़की की टिपण्णी को लेकर ऐसा हीं हुआ. सरकार को मुक़दमा वापस लेना पड़ा.

महज कुछ इस तरह की सामान्य घटनाओं को लेकर यह मान लेना कि भारत में मीडिया पर सरकार दबाव बनती है कतई गलत होगा. यहाँ एक घटना वास्तु-स्थिति को बताता है. फेस-बुक पर बुलंदशहर के एक युवा ने किसी सम्प्रदाय –विशेष के बारे में कोई टिपण्णी की जिसकी वजह से सैकड़ों लोग मेरठ जिले में प्रदर्शन करने लगे. उसी संप्रदाय के धार्मिक नेताओं ने तथा जिले के अधिकारियों ने समझा-बुझा कर उग्र भीड़ को शांत किया और उस युवा को गिरफ्तार किया गया. जिस देश में संकीर्ण –सोच के आधार पर इतने समूह एक दूसरे से वैमनस्य रखते हों उसमे सरकार के लिए मुश्किल होता है कानून –व्यवस्था बनाये रखना.

जैसे –जैसे प्रजातंत्र मजबूत होता है लोगों की समझ बेहतर होती है और आपसी बैर-भाव ख़त्म करने के तंत्र स्वतः हीं विकसित होने लगते हैं. यह मान लेना कि अन्य देशों के मुकाबले भारत में मीडिया की स्वायत्तता पर कोई सरकारी हमला हो रहा है विश्व भारत ऐसे प्रजातान्त्रिक देश के बारे में गलत संकेत देते हैं. प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया औपचारिक संस्थाएं हैं जो कानून की ज़द में रह कर अपना काम कर रहें है जब कि दूसरी ओर सोशल मीडिया अभी अनौपचारिक है, अपरिपक्व है और ज़रुरत है कि इसका उपयोग करना वाले स्वयं संयम बरतें.

रिपोर्ट बनाने वाली संस्था ने यह नहीं देखा कि प्रजातंत्र के उद्गम-स्थल ब्रिटेन में किस तरह सरकार द्वारा प्रायोजित ह्यूटन इन्क्वायरी रिपोर्ट और हाल में जारी लार्ड लेविसन रिपोर्ट ने जिस तरह का हमला उस देश की मीडिया पर किया है वह आने वाले दिनों में एक बदनुमा दाग साबित होगा. ह्यूटन रिपोर्ट के कारण पड़ से हटने वाले बीबीसी के पत्रकार गिल्लिगन ने अपने इस्तीफा –पत्र में लिखा “यह रिपोर्ट न केवल बीबीसी बल्कि देश की पत्रकारिता को कुंठित करने वाला साबित होगा”. लेकिन वर्ल्ड प्रेस इंडेक्स में ह्यूटन और लाविसन की रिपोर्टों इस रिपोर्ट को संज्ञान में नहीं लिया गया है.
अंतर्राष्ट्रीय गैर-सरकारी संस्थाओं की एक मानसिकता रही है कि वह गैर-यूरोपीय देशों की अच्छी बातों को सहज भाव से नजरंदाज़ कर देती हैं और उनकी सामान्य एवं परिस्थितिजन्य गलतियों को “प्रजातंत्र पर कुठाराघात” या “मानव अधिकार पर हमले” की संज्ञा देकर अपने को विश्व गुरु के रूप में पुनर्प्रतिष्ठापित करना चाहती हैं. 

लेखक एनके सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. ईटीवी, साधना न्‍यूज समेत कई संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पद पर रह चुके हैं. संप्रति वे ब्रॉडकास्ट एडीटर्स एसोसिएशन के महासचिव हैं. उनका यह लेख दैनिक भास्‍कर में भी प्रकाशित हो चुका है.

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