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टो‍डरिया की कलम आमजन के पक्ष में मजबूती के साथ खड़ी रही

आज दिन में हल्द्वानी से वरिष्ठ पत्रकार साथी ओपी पाण्डे ने मोबाइल पर दुखद सूचना दी कि उत्तराखंड के वरिष्‍ठ पत्रकार और उत्तराखंड जनमंच के संस्थापक राजेन टो‍डरिया जी का मंगलवार की सुबह देहरादून के सीएमआई अस्पताल में निधन हो गया है। ओपी ने बताया कि उन्‍हें हार्ट अटैक के बाद कल ही अस्‍पताल में भर्ती कराया गया था। आज सुबह चल बसे। इस दुखद सूचना के बाद ह्रदय बेहद व्यथित है। नियति ने राजेन टो‍डरिया जी के रूप में एक जनपक्षीय सोच के लड़ाकू पत्रकार को असमय उत्तराखंड से छीन लिया। महज छप्पन साल की उम्र में राजेन टो‍डरिया जी का अचानक चला जाना निश्चित ही बेहद दुखद घटना है।

आज दिन में हल्द्वानी से वरिष्ठ पत्रकार साथी ओपी पाण्डे ने मोबाइल पर दुखद सूचना दी कि उत्तराखंड के वरिष्‍ठ पत्रकार और उत्तराखंड जनमंच के संस्थापक राजेन टो‍डरिया जी का मंगलवार की सुबह देहरादून के सीएमआई अस्पताल में निधन हो गया है। ओपी ने बताया कि उन्‍हें हार्ट अटैक के बाद कल ही अस्‍पताल में भर्ती कराया गया था। आज सुबह चल बसे। इस दुखद सूचना के बाद ह्रदय बेहद व्यथित है। नियति ने राजेन टो‍डरिया जी के रूप में एक जनपक्षीय सोच के लड़ाकू पत्रकार को असमय उत्तराखंड से छीन लिया। महज छप्पन साल की उम्र में राजेन टो‍डरिया जी का अचानक चला जाना निश्चित ही बेहद दुखद घटना है।

राजेन टो‍डरिया जी पिछले बत्तीस सालों से सक्रिय पत्रकारिता से जुड़े थे। वे कई प्रतिष्ठित दैनिक समाचार – पत्रों में सम्पादक भी रहे। सम्पादकी से इस्तीफा देने के बाद उन्होंने "जनपक्ष" मैगजीन का सफल सम्पादन किया। "जनपक्ष" के जरिये उत्तराखंड राज्य के हितों से जुड़े समसामयिक मुद्दों को बेवाकी के साथ उठाया। राजेन टो‍डरिया उत्तराखंड के गिने – चुने विद्वान और जागरूक पत्रकारों में शामिल थे। उनमें पहाड़ और पहाड़ से जुड़े असल मुद्दों की व्यापक समझ थी। वे ऐसे चुनिन्दा पत्रकारों में से एक थे, जो पहाड़ की समस्याओं को उठाने के साथ उनका हल भी सुझा सकने का माद्दा रखते थे। वे धारदार और निर्भीक लेखनी के मालिक थे। राजेन टो‍डरिया उत्तराखंड के हितों के प्रति बेहद संवेदनशील और चिंतित रहते थे। अलग उत्तराखंड राज्य के वजूद में आने के बाद राजेन टो‍डरिया ने  पत्रकारिता के साथ-साथ जन सामान्य से जुड़े अहम मुद्दों से खुद को शिद्दत से जोड़ने की कोशिश की।

टिहरी बांध विस्थापितों का मसला हो या मूल निवास, राजेन टो‍डरिया की कलम आम जनता का पक्ष में बड़ी मजबूती के साथ खड़ी रही। उत्तराखंड राज्य गठन के असल और बुनियादी सवालों को राजेन टो‍डरिया सरीखे पहाड़ के चंद पत्रकारों ने ही वाणी दी। इस महत्वपूर्ण काम में वे काफी हद तक कामयाब भी रहे। इधर के कुछ वर्षों से उनका समाज से बहुत बड़ा और घनिष्ट सम्बन्ध रहा। कतिपय अपवादों को छोड़ दें, राजेन टो‍डरिया की हालिया पत्रकारिता ने समाज और नए नवेले इस राज्य के हुक्मरानों  को सही राह दिखाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कलम को उत्तराखंड की बेहतरी से जोड़ने की कोशिश की।

राजेन टो‍डरिया ने जनपक्षीय पत्रकारिता ही नहीं की, केवल ख़बरें ही नहीं लिखीं। बल्कि उन्होंने उत्तराखंड और उत्तराखंडी समाज की बेहतरी के लिए हर क्षेत्र में सक्रिय भागीदारी की। संघर्ष किया। वे उत्तराखंड के असल और ज़मीनी सवालों को लेकर भी खूब लड़े। और लड़ रहे थे। राजेन टो‍डरिया ने पत्रकारिता के माध्यम से जनमानस में अपनी और उत्तराखंड की पत्रकारिता की जो पहचान बनाई, वह जनपक्षधरता की एक जिन्दा मिसाल है। पहाड़ के हकों की लड़ाई कलम – कागज से सड़कों तक लड़ने के लिए सदैव तत्पर संघर्षशील, जुझारू और जनपक्षीय सोच से लैस वरिष्ठ पत्रकार राजेन टो‍डरिया जी का असमय विदा होना पत्रकारिता जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। बाजारवाद की पत्रकारिता के मौजूदा दौर में राजेन टो‍डरिया जैसे लड़ाकू और क्रांति धर्मी पत्रकारों की सख्त जरूरत है। उत्तराखंड को भी और देश को भी। राजेन टो‍डरिया जी को हमारा अंतिम सलाम!

लेखक प्रयाग पांडेय उत्‍तराखंड के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.

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