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कभी-कभी बच्चा भी बनना चाहिए!

 

जीवन की भागदौड़ और आपाधापी में हम वक्त के साथ तेज रफ्तार चलने की कोशिश में अक्सर कुछ पलों के लिए कहीं ठिठकना भूल जाते हैं। ऐसे पल, जो हमें किसी और माहौल में ले जाएं। ऐसे माहौल में, जहां हम कुछ हल्के-फुल्के क्षणों से रूबरू हों। ऐसे हल्के-फुल्के क्षण, जो हमारे मन को भी हल्का कर दें। इतना हल्का कर दें कि हम अपने खोल से बाहर निकल आएं। खोल से इस कदर बाहर निकल आएं कि बच्चे बन जाएं। इस तरह बच्चे बन जाएं कि बड़ों के तमाम समीकरण, कैलकुलेशन और दंद-फंद भूल जाएं… और यह सब करके मासूमियत की ऐसी दुनिया में पहुंच जाएं, जहां हमें अहसास हो कि काश हम बच्चे ही रहते।

 

जीवन की भागदौड़ और आपाधापी में हम वक्त के साथ तेज रफ्तार चलने की कोशिश में अक्सर कुछ पलों के लिए कहीं ठिठकना भूल जाते हैं। ऐसे पल, जो हमें किसी और माहौल में ले जाएं। ऐसे माहौल में, जहां हम कुछ हल्के-फुल्के क्षणों से रूबरू हों। ऐसे हल्के-फुल्के क्षण, जो हमारे मन को भी हल्का कर दें। इतना हल्का कर दें कि हम अपने खोल से बाहर निकल आएं। खोल से इस कदर बाहर निकल आएं कि बच्चे बन जाएं। इस तरह बच्चे बन जाएं कि बड़ों के तमाम समीकरण, कैलकुलेशन और दंद-फंद भूल जाएं… और यह सब करके मासूमियत की ऐसी दुनिया में पहुंच जाएं, जहां हमें अहसास हो कि काश हम बच्चे ही रहते।
ऐसे ही कुछ घंटे जीने का मौका पिछले हफ्ते अकस्मात मिल गया। शुरू में लग रहा था कि इस तरह पूरी रात निकालना बहुत मुश्किल, थकाऊ और पकाऊ होगा। मगर, जब रात गुजर गयी, तो लगा कि वे चंद घंटे हम सबके जीवन के पिछले कुछ बरसों का शायद सबसे खूबसूरत वक्त था।
 
25 जनवरी की रात को ऑफिस में बिजली सप्लाई का सोर्स बदलने का परीक्षण था। रात को 2 बजे से भोर के 5 बजे तक बेस्ट बिजली सप्लाई की जगह डीजी सेट से सप्लाई का टेस्ट किया जाना था। इसमें टाइम्स समूह के सभी अखबारों को 26 जनवरी के संस्करण छोड़ने के बाद तीन घंटे तक बिजली सप्लाई की पूरी क्षमता का इस्तेमाल करना था। यानी सारे एसी और बिजली की ट्यूबलाइट चालू करके कंप्यूटर ऑन रखने थे। एक तरह से रात्रि जागरण ही करना था। सबको यह बहुत भारी काम लग रहा था, क्योंकि रात 11 बजे तक पूरी ड्यूटी करने के बाद ऑफिस में छह घंटे और रुकना था, वह भी जगे रहकर। हालांकि अगले दिन 26 जनवरी का अवकाश था, फिर भी यही लग रहा था कि रात तो खराब होगी ही, नींद न लेने के कारण अगला दिन भी खराब होगा।
 
ऐसे में, सबके मन में एक सवाल और भी था- परीक्षण रात को 2 बजे शुरू होगा, उससे पहले 11 से 2 बजे तक 3 घंटे का वक्त कैसे कटेगा? किसी को अनुमान तक नहीं था कि ये तीन घंटे तो मजेदार होने ही वाले हैं, इनकी बदौलत अगले तीन घंटे भी बोझिल नहीं लगेंगे। इसकी शुरुआत हुई सबके लिए बाहर से खाना मंगाने से। ऑफिस में रुके सभी सहकर्मियों ने घर या कैंटीन के खाने से हटकर, एक साथ, एक जैसा खाना खाया।
 
खाना खाकर सतीश जी और राय साहब ने कहा, 'अभी तो काफी वक्त काटना है। चलो, पान-वान ही खाने चला जाए।' तब तक भी कुछ तय नहीं था कि बीच के वक्त में क्या किया जाए। बस यों ही, पान के लिए पूरी टीम निकल गयी। सतीश जी, राय साहब, विनीत शर्मा, राजकुमार सिंह, सर्वेश पाठक, दामोदर व्यास, भाविन पंड्या, मनीष झा, लक्ष्मण सिंह, ब्रिजेश ओझा, विजय पांडे, कमलेश मेस्त्री, राकेश पाठक, संजय खाड्ये और मैं। हम रात 11.15 बजे कैपिटल के पास पान की दुकान पर पहुंचे। मगर, 26 जनवरी के तैयारियों के लिए पुलिस ने दुकान जल्दी बंद करा दी थी। राय साहब का मूड ऑफ। फिर उन्हें कुछ याद आया। वे बोले, 'चलो, सामने बारिस्ता के पास मिलेगा पान।' सचमुच, बरिस्ता के बाहर पान की दुकान खुली थी और उस पर भारी भीड़ थी। हम वहां पहुंचे, तो पान वाला खुश होकर जल्दी-जल्दी हाथ चलाने लगा। रात के 12 बजने को थे। बरिस्ता खचाखच भरा था। पार्किंग में एक भी कार पार्क करने की जगह नहीं थी। पास ही स्थित चार सिनेमाघरों के आखिरी शो छूटने को थे। यानी, कुछ मिनट बाद इस सड़क पर हजारों लोगों की भीड़ दिखने वाली थी। मुंबई की 'रतजगे' की यही आदत सबको सबसे ज्यादा लुभावनी लगती है, क्योंकि यह सुरक्षा का अहसास भी कराती है।
 
सबको पान खाते देखकर मैंने भी कई साल बाद पान खाया। अभी ऑफिस में हमारा काम शुरू होने में दो घंटे बाकी थे। रात को 12 बजे हममें से शायद कोई भी बरसों से मुम्बई की सड़कों पर टहला-भटका नहीं था। इसलिए सबके मन में सड़कें नापने की बात आयी। मगर जाएं कहां? किसी ने मरीन ड्राइव कहा, तो किसी ने गेटवे ऑफ इंडिया। मैंने कहा, 'ये जगह दूर पड़ेंगी। टैक्सियों में जाने के बजाय क्यों न हम पैदल ही घूमें?' पास की किसी अच्छी जगह के बारे में सब सोच ही रहे थे कि मेरे मुंह से निकला- हुतात्मा चौक। सतीश जी ने तुरंत इसका अनुमोदन करते हुए कहा, 'हां डियर, हुतात्मा चौक ही चलते हैं। यह पास भी है और रोशनी से नहाया हुआ भी होगा।'
 
बॉम्बे जिमखाना की ओर जाने के बजाय हम डीएन रोड के भीतर वाली समानांतर सड़क पर चल रहे थे। वहां से डी.एन. रोड की ओर मुड़े, तो कुछ स्काउट्स को 26 जनवरी की परेड के लिए 'सावधान, विश्राम आदि' के निर्देशों का अभ्यास करते देखा। दामोदर और कमलेश एक साथ बोले, 'सर, परेड हो जाये?' सतीश जी और राय साहब ने कहा, 'हां, 26 जनवरी शुरू हो चुकी है। परेड तो बनती है। पूरे देश में कूछ घंटे बाद होगी। हम सबसे पहले कर लेते हैं।' तो हमारी परेड शुरू हो गयी। लेफ्ट-राइट, लेफ्ट-राइट, लेफ्ट-राइट…. गारद दाएं देखेगा दाएं देख, गारद सलामी देगा- सलामी दे, लेफ्ट-राइट… पास से गुजरते लोग कौतूहल से देखने लगे। कुछ ने अपने मोबाइल फोन से हमारे फोटो भी ले लिए। दामोदर ने पूरी परेड मोबाइल पर शूट कर ली।
 
अब हम हुतात्मा चौक के सामने थे। हवा में मामूली सी ठंडक थी। हुतात्मा चौक रोशनी से नहाया हुआ था। शहीद ज्योति प्रज्ज्वलित थी। आसपास की इमारतों पर भी रोशनियां नाच रही थीं। शायद हम सबने हुतात्मा चौक का यह रंगीला  और सजीला रूप बरसों बाद देखा था। मन में क्या आया कि दिन में तो यह जगह भीड़भाड़ और शोरशराबे से परेशान रहती है, अब कितने सुकून से आराम कर रही है! दिन में कंक्रीट का जंगल लगने वाली यह जगह रात होते ही कितनी खूबसूरत हो जाती है!
 
हमने सड़क पार की। चौक पर, शहीद ज्योति के सामने फोटो सेशन हुआ। अभी तक दामोदर ही फोटो क्लिक कर रहा था, अब राय साहब भी मूड में आ गए। उन्होंने सड़क के बीच में खड़े होकर फोटो क्लिक किए। इक्का-दुक्का वाहनों से हम उन्हें आगाह करते रहे। इस बीच बेस्ट की कुछ बसें गुजरीं। उनमें बैठे यात्रियों ने अचरज से हमें देखा कि आधी रात के बाद हम पिकनिक जैसा क्या कर रहे हैं।
 
हमारे दाईं ओर की सड़क मरीन ड्राइव के लिए थी, तो सामने की सड़क गेटवे ऑफ इंडिया के लिए। हममें से कुछ को वहां जाने का विचार भी आया, पर आखिर यह तय किया गया कि हम यहीं पर रुककर कुछ ऐसा करेंगे, जो बरसों से न किया हो।
 
इस खयाल को अमली जामा पहनाने के लिए हम हुतात्मा चौक के कोरिडोर में आ गए। यह दिन में चर्चगेट स्टेशन से अकबरअलीज की ओर जाने वाले पैदल लोगों का रास्ता है। गणतंत्र दिवस की वजह से इसकी सफाई की जा चुकी थी और यह घर के आंगन जैसा साफ-शफ्फाक लग रहा था। किनारे पर सफाई जारी थी। अचानक वाघा बोर्डर के दृश्य की चर्चा चली, तो कमलेश ने इच्छा जतायी कि वैसा ही कुछ हम यहां भी करें। तो हमने बीएसएफ और पाकिस्तान रेंजर्स की भूमिका निभाई। छाती से ऊपर तक पैर उठाकर की गयी इस परेड को वहां से गुजरते लोगों ने ठिठककर देखा।
 
अब क्या किया जाए?
 
सभी इस सवाल का जवाब खोज रहे थे। इसका जवाब मिला सतीश जी को। वे बोले, 'चलो, डम्ब्स आर्ट शेयर खेला जाए। आप सबने बचपन में यह खेल खूब खेला होगा। उन्हीं यादों को ताजा किया जाए।'
 
फटाफट दो टीमें बन गयीं। सतीश जी निर्णायक बने और राय साहब मुख्य अतिथि। पहली टीम का एक सदस्य सतीश जी के कान में एक फिल्म का नाम बताता। फिर उसे अभिनय से व्यक्त करता। दूसरी टीम को उससे समझकर फिल्म का नाम बताना होता। करीब 10-15 मिनट तक यह खेल चला। कमलेश ने 'कामसूत्र' और लक्ष्मण ने 'पत्थर के सनम' का बहुत सजीव अभियन किया।
 
रात के एक बज चुके थे। इतने लोगों को वहां देखकर एक चायवाला चला आया। मुम्बई में रात को चायवाले साइकिलों पर घूमते हैं। जहां चाय के तलबगार दिखें, वहीं रुककर उन्हें चाय पिला देते हैं। चाय का दौर भी चला। इस बीच, कुछ नौजवान भी वहां आ गए। वे उस जगह के विडियो बना रहे थे। एक जीप में कुछ नौजवान गुजरे। उन्होंने हमें देखकर 'वंदे मातरम' के नारे लगाए। मोटरसाइकल पर एक युवा जोड़ा गुजरा। उन्हें देखकर हमें इसका गर्व भी हुआ कि शायद और किसी शहर में इतनी रात को कोई युवती सड़क पर निकलने की हिम्मत भी न करे, मगर मुम्बई में वैसी दहशत कभी महसूस नहीं होती।
 
अब हमारा 'रिट्रीट' शुरू हुआ। ऑफिस लौटते हुए भी हंसी-मजाक का सिलसिला जारी रहा। रात पौने दो बजे हम ऑफिस लौटे। मिथिलेश सिन्हा, लालचंद यादव और अवधनारायण मिश्रा ऑफिस में रह गए थे। वे इस मजे से वाकई वंचित रह गए।
 
ठीक दो बजे सबने कंप्यूटर ऑन किए और एसी चला दिए। बिजली सप्लाई का सोर्स बदला गया और तीन घंटे तक उसका परीक्षण हुआ। सब कुछ ठीक तरह से हो गया। ये तीन घंटे भी बहुत मजेदार रहे। आखिर भोर में पांच बजे परीक्षण पूरा हुआ, तो डमिनिस्ट्रेशन विभाग के लोगों ने आकर सबको सहयोग के लिए धन्यवाद दिया। रतजगे के बावजूद कोई भी शिथिल नहीं हुआ था।
 
सबने कंप्यूटर बंद किए। एसी भी बंद करके हम ऑफिस से निकले। कुछ घंटे बाद देश 64वां गणतंत्र दिवस मनाने वाला था। उससे पहले हमें घर पहुंचकर थोड़ी नींद लेनी थी, ताकि टीवी पर दिल्ली की परेड देख सकें और अपनी बिल्डिंग में झंडा फहरा सकें।
 
ऑफिस की ड्रॉप कारों में बैठते समय हम सबके मन में एक ही ख्याल था-

 
ताजगी, ऊर्जा और सकारात्मकता के लिए कभी-कभी बच्चा भी बनना चाहिए…. आखिर पिछले कुछ घंटों में हम सब बच्चे ही तो बन गए थे!
 
अपने दिल की बात को बेबाकी से बयान करने वाले भुवेन्द्र त्यागी इन दिनों मुंबई में नवभारत टाइम्स में चीफ सब एडिटर के पद पर कार्यरत हैं. उनका यह लेख नवभारत टाइम्‍स के ब्‍लॉग से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है. 
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