वासिंद्र मिश्र को कमजोर करने के लिए उसके ख़िलाफ़ साजिश करने की बात बेमानी है। ये सभी जानते हैं कि जी न्यूज प्रबंधन को देश की सबसे आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में अपने ‘जी लर्न’ के धंधे से लेकर फन सिनेमा के धंधे को मैनेज करने वाला मैनेजर चाहिए। वासिंद्र से बड़ा मैनेजर उसे शायद ही दूसरा मिले। इसलिए वासिंद्र को हटाने का तो सवाल ही नहीं उठता। भले ही जी यूपी चैनल नाम से इस ग्रुप को एक चकलाघर ही क्यों न चलाना पड़े। वासिंद्र की तारीफ उनके अक्खड़पन और बेबाकी के लिए की जा सकती है। लेकिन एक संजीदा पत्रकार के रुप में इसकी छवि उसके मुहल्ले में नहीं बन पाई तो प्रदेश और देश में कैसे बन पाएगी?
जिस शख्स को अपने घर के आगे ..’वासिंद्र मिश्र..वरिष्ठ पत्रकार’ की तख्ती लगानी पड़े वो बस खुद को ही पत्रकार कह सकता है, बाकी कौन कहेगा। जिसके नाम पर उसके चैनल के लोग गर्व नहीं शर्म महसूस करें, उसकी तरफदारी करनेवाले लोगों की मानसिकता पर सिर्फ तरस ही आ सकती है। रही बात सबूत की तो जी यूपी के ये संपादक अब अपने आका के फरमान का इंतजार करें कितने सबूत और कैसे सबूत, सब उन तक पहुंच चुके हैं। अब ये कलाकारी दिखा सकते हैं तो सिर्फ अपना ‘हुनर’ दिखाकर, इसलिए दांव लगा लें। ऐसे ‘एस्सेल प्रॉपर्टीज’ के नाम से देश के सबसे बड़े मुनाफे के धंधे में उतरने को तैयार ये ग्रुप इतनी जल्दी वासिंद्र से पिंड नहीं छुड़ाएगा। उसे अभी वासिंद्र और उसकी पूरी जमात की पूरी जरूरत है। क्योंकि यूपी में हर बड़ी खबर को दबाने की वासिंद्र की विशेषज्ञता इस समूह को बड़े फायदे दिला रही है। इस रास्ते का एक बड़ा मील का पत्थर इस ग्रुप ने हाल ही में पार किया है। और इसकी वासिंद्र को खुश होने लायक कीमत मिल चुकी है।
रही बात वासिंद्र की छवि खराब करके टीआरपी गिराने की, तो देश में ऐसा कौन सा चैनल है जिसे लोग उसके संपादक की छवि की वजह से देखते या नहीं देखते हैं? भड़ास पर वासिंद्र को पाक साफ बतानेवाली टिप्पणी उनके किस सिपहसालार ने लिखी ये तो वही जानें लेकिन निकम्मों की फौज कहकर वो सच को खारिज नहीं कर सकते। दरअसल पुण्य प्रसून वाजपेयी के साथ वासिंद्र की बदतमीजी पर जी न्यूज प्रबंधन की हालत खराब है। बात ऊपर तक पहुंच चुकी है और सबके लिए जवाब देना मुश्किल हो रहा है, वो भी तब जबकि जवाब लिखित में मांगा गया है, पूरा ब्यौरा विजुअल के साथ तलब किया गया है। वाजपेयी की मालिकान के साथ इस मुद्दे पर हुई बैठक के बाद वासिंद्र के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही हैं।
पिछले दस दिनों में जी न्यूज प्रबंधन के आला हाकिमों ने तीन ऐसे व्यक्ति के साथ मीटिंग की है, जिन्हें जी यूपी का अगला संपादक बनाया जा सकता है। इसमें से एक शख्स के साथ तो मालिकान ने महरौली के अपने घर पर तीन घंटे तक बातचीत की। ऐसे में चुनाव से पहले मानसिक तौर पर वासिंद्र को तोड़ने की साज़िश करने की क्या जरूरत है। रही बात ऐसा करने की तो ये बेहद मुश्किल है। 55 साल की उम्र में जो शख्स अपने से आधी से भी कम उम्र की युवतियों को अपने शारीरिक शैष्ठव की कहानियां बेहिचक सुनाता हो, उसे कोई मानसिक रुप से क्या तोड़ेगा? कहते हैं चापलूसी सनक को सौ गुना बढ़ा देती है, ऐसे में माना जाना चाहिए कि वासिंद्र अपनी मजबूत मानसिकता दिखाने के लिए डेस्क के तमाम बचे लोगों का जीना फिर हराम करेंगे क्योंकि चापलूसों की फौज ने यहां नकारा लोगों पर भी बढ़त ले रखी है। और ‘रंगीला सुल्तान’ हर बाज़ी आजमाने में जुटा है।
वासिंद्र ने कितने अच्छे और कर्मठ लोगों को प्रमोट किया ये जी यूपी में ही नहीं बल्कि जी न्यूज में काम करनेवाले किसी शख्स से पूछ लीजिए। बेशक वो ‘काम’ के पुजारी हैं लेकिन आखिर पुरुष सदस्य उनकी पूजा के अंग कैसे बनें ये बड़ा सवाल है। जी यूपी पत्रकारिता जगत में एक ऐसा टापू है जिसका बाकी दुनिया से कोई सरोकार नहीं, यहां न तो पत्रकारिता की नीतियां चलती हैं और न ही सच जैसी किसी चीज का वजन है। दुर्भाग्य ये है कि कलम के कुछ धनी लोग भी कपोल कल्पित मजबूरियों के नाम पर वासिंद्र के लिए चारण बन रहे हैं जबकि उन्हें भी पता है कि आखिर ये स्तुति पत्रकारिता के पेशे की पवित्रता की कीमत पर है। रही बात बदनाम करने की तो वासिंद्र और बदनामी का एक दूसरे से कोई विरोध नहीं…ये अब एक दूसरे के पर्याय हैं।
कुमार अंशु
कुमार अंशु ने यह मेल वासिन्द्र मिश्र के पक्ष में भेजे गए मेल के जवाब में दिया है. खबर पढ़ने के लिए आगे दिए गए शीर्षक पर क्लिक करें : एक पत्र वासिंद्र मिश्र के पक्ष में
(कानाफूसी कटेगरी के लिए)





