अपने आप को नम्बर एक बताने वाले दैनिक जागरण के गोरखपुर संस्करण के रिर्पोटर अन्य अखबारों से कंटेंट की लड़ाई लड़ने की बजाय अपने ही अखबारों के दूसरे एडिशनों की पुरानी खबरें नई चासनी में लपेट पर परोसने लगे हैं. चोरी का दिमाग रखने वाले ऐसे रिपोर्टरों की संपादकीय प्रभारियों एवं जिला प्रभारियों द्वारा पीठ भी थपथपाई जा रही है. इसके बाद से चोर रिपोर्टरों का हौसला और भी बुलंद हुआ है.
दैनिक जागरण, कानपुर संस्करण ने 20 अप्रैल 2010 को पेज संख्या चार पर ''बेशर्म व्यवस्था ने ओढ़ा कूड़े का चोला'' शीर्षक से एक खबर प्रकाशित किया था. उसी खबर को गोरखपुर संस्करण के देवरिया जिले के पन्ने पर दिनांक 1 दिसम्बर 2011 को पेज संख्या पांच पर ''व्यस्था ने ओढ़ा कूड़े का चोला'' शीर्षक से खबर प्रकाशित किया है. दोनों खबरों के शीर्षक में मात्र बेशर्म शब्द का अंतर है, जो शायद देवरिया वाले रिपोर्टर ने अपने लिए बचा रखा है. खबरों की थीम एक, खबर एक, नागरिक प्रतिक्रियाएं भी लगभग वही, जो साल भर पहले कानपुर वाले बोले थे.
जो भी हो दूसरे अखबारों से बराबरी करने से घबराए जागरण के रिपोर्टर ऐनकेन प्रकारेण जनता को मूर्ख बनाने में लगे हुए हैं. वो भी तब जब जागरण के कई बड़े लोग यहां लगातार जमे रहे हैं, इसके बाद भी इन सेनापतियों के सिपाही चोरी की खबरें लिख रहे हैं और पाठकों को ताजा बनाकर परोस रहे हैं. इस स्थिति में यह कहना ही उचित होगा कि इस व्यवस्था से प्रशासन की व्यवस्था ही शायद अच्छी है, जो कम से कम चोरी करके तो नम्बर एक नहीं बनते.


एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.





