साहित्य के क्षेत्र में लंबे समय से मठाधीशों के वर्चस्व की बातें गाहे-बगाहे सामने आती रहती हैं. कुछ समय पहले तक माना जाता था कि अगर नए साहित्कार-लेखक-कवि को साहित्य में स्थापित होना है तो इन मठाधीशों के यहां दरबार लगाना जरूरी है. क्योंकि बड़े प्रकाशक इन तथाकथित मठाधीशों के अर्दब में रहते हैं और बिना इनके आशीर्वाद उनकी किताबों का प्रकाशन संभव नहीं है. पर नई पीढ़ी के साहित्कार-लेखक इन तथाकथित साहित्य के मठाधीशों-प्रकाशकों के सामने घुटने टेकने की बजाय अब इनसे दो-दो हाथ करने को तैयार हैं.

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