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बूटासिंह तो बड़े आदमी हैं, पर लुच्चे लफंगों को भी सुरक्षा!

सुप्रीम कोर्ट सरकार से नाराज है। बार बार कहने, कई बार आदेश देने और कुछेक बार लताड़ने के बावजूद वीआईपी सुरक्षा के मामले में सरकार गंभीर नहीं है। सवाल किसी किसी वीआईपी की सुरक्षा करने या देने का नहीं है। मामला फालतू लोगों को सुरक्षा देने का है। देश में बहुत सारे लोगों को उनके पद और कद के हिसाब से सुरक्षा तो दे दी जाती है, लेकिन पद से विदाई के बाद भी सुरक्षा अमला उनके साथ ही रहता है। सरकार के लिए यह बहुत बड़ा बोझ है। आर्थिक रूप से भी और पदों की कमी के हिसाब से भी। सुप्रीम कोर्ट नाराज इसलिए भी है क्योंकि ऐसे मामलों की समीक्षा तक नहीं की जा रही है। यही वजह है कि मायावती और मुलायम सिंह जहां जाते हैं, सुरक्षा दस्ते से घिरे रहते हैं। दोनों सिर्फ सांसद हैं। फिर भी हमारे गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे की सवारी उनके सामने फीकी है।

सुप्रीम कोर्ट सरकार से नाराज है। बार बार कहने, कई बार आदेश देने और कुछेक बार लताड़ने के बावजूद वीआईपी सुरक्षा के मामले में सरकार गंभीर नहीं है। सवाल किसी किसी वीआईपी की सुरक्षा करने या देने का नहीं है। मामला फालतू लोगों को सुरक्षा देने का है। देश में बहुत सारे लोगों को उनके पद और कद के हिसाब से सुरक्षा तो दे दी जाती है, लेकिन पद से विदाई के बाद भी सुरक्षा अमला उनके साथ ही रहता है। सरकार के लिए यह बहुत बड़ा बोझ है। आर्थिक रूप से भी और पदों की कमी के हिसाब से भी। सुप्रीम कोर्ट नाराज इसलिए भी है क्योंकि ऐसे मामलों की समीक्षा तक नहीं की जा रही है। यही वजह है कि मायावती और मुलायम सिंह जहां जाते हैं, सुरक्षा दस्ते से घिरे रहते हैं। दोनों सिर्फ सांसद हैं। फिर भी हमारे गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे की सवारी उनके सामने फीकी है।

देश के गृह मंत्री तो हमारे बूटा सिंह भी रहे हैं। सुरक्षा आज भी उनकी कोई कम नहीं है। वैसे, देखा जाए तो बूटा सिंह बड़े आदमी हैं। बड़े इसलिए क्योंकि वे अब भी पूरी तरह से खत्म नहीं हुए हैं। कांग्रेस मानती है कि उनके साथ अब कोई नहीं हैं। दलितों के एक बहुत बड़े तबके ने उनसे किनारा कर लिया है। लग रहा है कि कांग्रेस बूटासिंह के खत्म होने के इंतजार कर रही है। लेकिन बूटासिंह हैं कि हर बार लगभग समाप्त हो जाने के बाद फिनिक्स की तरह फिर से जीवित हो उठते हैं। और देश भर में सभी जानते हैं कि उनको ह बार राजनीतिक पुनर्जीवन प्राप्त करने की संजीवनी जालौर सिरोही से प्रप्त होती है। वैसे यह भी सच है कि बूटासिंह की शिराओं, कोशिकाओं और धमनियों में धधक भी तो जालौर सिरोही की ही है, जिसे वे अकसर साबित भी करते रहते हैं। इसीलिए वे 1984 से लेकर अब तक बार बार यहीं आते हैं। दलितों के झंडाबरदार वे अब भी हैं। कितने दलित उनके साथ हैं, यह कोई नहीं जानता। लेकिन सुरक्षा अमला इतने सालों बाद भी उनके साथ जस का तस है, यह सभी जानते हैं। अब ना तो वे देश के गृह मंत्री है और ना ही किसी और सरकारी पद पर, फिर भी ब्लैक कैट कमांडो दस्ता उनकी सेवा में तैनात है। भटकने के लिए क्षमा करें। क्योंकि बात तो बात तो अपन सुरक्षा की कर रहे थे, और कहां बूटा सिंह की जिंदगी में घुस गए!
 
खैर, मामला वीआईपी सुरक्षा पर होने वाले बेतहाशा खर्च पर देश की सबसे बड़ी अदालत की नाराजगी का है। जब पुलिसकर्मियों की कमी है तो वीआईपी की सुरक्षा पर इतना खर्च क्यों किया जा रहा है। सिर्फ पिछले एक साल में ही दिल्ली सरकार ने वीआईपी सुरक्षा पर 341 करोड़ रुपये खर्च किए। दिल्ली पुलिस के आठ हजार जवानों को वीआईपी सुरक्षा में तैनात किया गया है। दिल्ली में 459 लोगों को उच्च स्तरीय वीआईपी सुरक्षा है। अपना मानना है कि अगर आठ हजार जवानों में से आधे जवानों को भी आम आदमी की सुरक्षा में लगा दिया जाता तो दिल्ली की सीएम यह रोना नहीं रोती कि उनकी दिल्ली महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं है। अपन ने देखा है कि बहुत सारे वीआईपी अपने राज्यों में सुरक्षा लेते ही हैं

 और दिल्ली पहुंचकर भी अलग से सुरक्षा ले लेते हैं। इसी तरह दिल्ली से निकलकर देश के प्रदेशों में जानेवाले वीआईपी की सेवा में दिल्ली का सुरक्षा अमला तो साथ रहता ही है, लोकल सुरक्षा भी दस्ता भी अलग से उनकी सेवा में तैनात रहता है। बूटासिंह की तरह। बूटासिंह तो बड़े आदमी हैं। पर हमारे देश की राजनीति में बहुत सारे लुच्चे – लफंगे और ढेर सारे दो कौड़ी के लोग भी जब सरकारी सुरक्षा भोगते दिखते हैं, तो अपने को तो गुस्सा आता है। आपको भी आता ही होगा।  
 
लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं.
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