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सुख-दुख...

लेखकों की रायल्‍टी मारकर हरम पर लुटाने लगे हैं प्रकाशक

ज्योति, जनसत्ता और प्रकाशक : आज की तारीख में जब कुछ प्रकाशक औरतखोर बन कर शहर-दर-शहर शिकारी बन कर आखेट कर रहे हैं। किताब छापने से ले कर पुरस्कार तक बांट रहे हैं। पुरस्कार खरीद कर दे दे रहे हैं, उन पर केंद्रित पत्रिकाओं के विशेषांक निकलवा दे रहे हैं और बिकवा दे रहे हैं। कुछ स्वनाम-धन्य लेखिकाएं भी गदगद हुई बहती जा रही हैं उन के प्रलो्भनों में। और अपने को अमर मानती जा रही हैं। 

ज्योति, जनसत्ता और प्रकाशक : आज की तारीख में जब कुछ प्रकाशक औरतखोर बन कर शहर-दर-शहर शिकारी बन कर आखेट कर रहे हैं। किताब छापने से ले कर पुरस्कार तक बांट रहे हैं। पुरस्कार खरीद कर दे दे रहे हैं, उन पर केंद्रित पत्रिकाओं के विशेषांक निकलवा दे रहे हैं और बिकवा दे रहे हैं। कुछ स्वनाम-धन्य लेखिकाएं भी गदगद हुई बहती जा रही हैं उन के प्रलो्भनों में। और अपने को अमर मानती जा रही हैं। 

ऐसे भयावह समय में किसी युवा लेखिका ने एक प्रकाशक के आगे झुकने से इंकार तो किया। ज्योति कुमारी को बहुत सैल्यूट कि खुल कर सामने आ गई हैं और साहित्येतर कारणों के आगे झुकने से इंकार करते हुए प्रकाशक के खिलाफ़ न सिर्फ़ बिगुल बजा कर खड़ी हुई हैं बल्कि उस के झूठ को भी तार-तार कर दिया है। पर इस सब में भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि जनसत्ता जैसे प्रतिष्ठित अखबार का प्रकाशक द्वारा दुरुपयोग और फ़र्जी खबर छपवाना। मेरा खयाल है कि ओम थानवी जी इस पर भी ध्यान देंगे। क्यों कि पुस्तक समीक्षा के नाम पर जो चंद प्रकाशकों और खेमे के लोगों को जनसत्ता उपकृत करता जा रहा है, उस पर तो उन का ध्यान नहीं ही है। पर जिस किताब को प्रकाशक ने छापा ही नहीं उस किताब को छापने और प्रचारित करने का दावा करने के लिए प्रकाशक ने जनसत्ता ही का उपयोग क्यों किया यह विचारणीय तो बनता ही है। उम्मीद है कि ओम जी इस पर तो ध्यान देंगे ही। यहां मित्र पढ़ना चाहें तो पढ़ें ज्योति कुमारी की वह चिट्ठी:
 
 
डॉ. सरोज गुप्ता : ज्योति जी ,यह कृत्य पूर्णता निंदनीय है ,मैं आपके साथ आपकी आवाज बन इसका खंडन करूंगी की एक लेखिका को उसकी अपनी पुस्तक के साथ खिलवाड़ करना ये प्रकाशक संस्थान बंद करे वरना इसके गम्भीर परिणाम भुगतने होंगे जो लेखक ,प्रकाशक और पाठक के स्वास्थ्य और चरित्र के लिए घातक होंगे !हर पाठक तक आपकी आवाज नहीं पहुंच पायेगी जिससे झूठ सच लगने लगेगा !
 
Bhupi Sood : bekar ka vitanda. kitab ka nam prakshak sujhata hai toisme kya bura hai? pustak use pracharit karke bechni hai, prakashak janta hai ki 'sharif ladki' nam saleble ho sakta hai. aur fir yah pramukh kahani bhi hai pustak me. han lekhika ka naam badalne ka anurodh thik nahi hai. sahitya se itar kya dabav rahe honge yah to lekhika behtar janti hain, pathak ka is se koi dur ka vasta bhi nahi hai. yah paraspar sahmati ho sakti hai.  yah bajarvaad ati ghrinit shabd ban chuka hai. kitab bazar me bikegi to bazar ka hissa to banegi hi, isme itna bura kya hai. khair kuchh baton ka jansatta ko sangyan lena chahiye, yah zaruri bhi hai,
 
Om Thanvi : कोई ख़बर नहीं छपी थी पाण्डेय जी। कार्यक्रमों की सूची वाले कोने "दिल्ली में आज" में सूचना मात्र थी, जो कार्यक्रम के आयोजक द्वारा प्रेस नोट भेजे जाने पर छापी जाती है! एक नहीं, पांच प्रकाशकों की सूचनाएं उस स्तम्भ में थीं! Yashwant Singh भी उसे "खबर" समझ बैठे?!
 
Dayanand Pandey : ठीक बात है ओम जी! पर ज्योति जी ने खबर ही लिखा है अपनी चिट्ठी में।
 
Deep Sankhla : Dayanand Pandey> शहर-दर-शहर घूमने वाले औरतख़ोर प्रकाशकों का नाम न सही, इशारा तो कीजिये. या ज़ाहिर न करने की कोई वज़ह भी है.
 
Dayanand Pandey : कर देंगे दीप जी जल्दी ही कर देंगे। नाम भी लिख देंगे। हम किसी से कभी डरते थोड़े ही हैं। ज़रा वक्त आने दीजिए। बाकी जानते सभी हैं, आप भी ज़रुर जानते होंगे।
 
Om Thanvi : Dayanand Pandey आपकी जानकारी के लिए उस चिठ्ठी में भी कहीं खबर नहीं लिखा है। पहली पंक्ति में ही लिखा है — जनसत्ता के कॉलम दिल्ली में आज …। आगे भी "सूचना" शब्द का इस्तेमाल है। पहले तथ्यों को जांच लिया करें।
 
Haresh Kumar : किताब राजकमल प्रकाशन से छपनी थी, लेकिन अब वह वाणी प्रकाशन से छप कर आ रही है। लेखिका का आरोप है कि राजकमल प्रकाशन के मालिक अशोक माहेश्वरी ने कई साहित्येत्तर शर्तें रख दी थीं। एक युवा लेखिकी से इस तरह की मांगों को समझा जा सकता है और इसी कारण से उसने फिर वाणी प्रकाशन वालों से संपर्क किया।
 
Om Thanvi : Deep Sankhla चौपाल में तशरीफ़ ले आएं! http://epaper.jansatta.com/88264/Jansatta.com/8-February-2013#page/6/1
Jansatta, 8 February 2013 :readwhere
www.readwhere.com
Jansatta is a leading Hindi daily belonging to the Indian Express Group. Establi…See More
 
Deep Sankhla : Dayanand Pandey> इसी बहाने ही सही, प्रकाशन व्यवसाय का कुछ तो भला हो, उडीक रहेगी.
 
Dayanand Pandey : जी ओम जी, पढ़ ली चौपाल भी। आप की बात बिलकुल दुरुस्त हैं।
 
Deep Sankhla : हम तो डरे-सहमें किनारे ही बैठें हैं, मँजधार में आने की हिम्मत ही नहीं कर पाते.
 
Ashutosh Kumar Singh : जनसत्ता ने अपनी स्थिति चौपाल में ज्योति जी की चिट्ठी को छाप कर पहले ही स्पष्ट कर दिया है…जनसत्ता अखबार को इस प्रकरण में घसिटना उचित नहीं है…आज के चौपाल को आपलोग पढ़ लें…ज्योति की पूरी कथा-व्यथा प्रकाशित हुई है..
 
Udai Bhan Mishra : मैं इस पर अन्यत्र अपनी राय दे चुका हूँ . प्रकाशक ने यह निंदनीय कार्य किया है .
 
Rachit Pankaj : सर क्या बताएंगे Deep Sankhla जी, इन प्रकाशकों के नाम हम ही बताए देते हैं। एक हैं राजकमल प्रकाशन के अरुण माहेश्वरी, दूसरे हैं सामयिक प्रकाशन के महेश भारद्वाज। महेश भारद्वाज अरुण माहेश्वरी को पीछे करते जा रहे हैं। अभी लमही पत्रिका में महेश ने मनीषा कुलश्रेष्ठ पर उन का चारणगान करवाया है और लमही पुरस्कार भी दिलवाया है। उन मनीषा को जो आएंगे भी लिखना नहीं जानती ठीक से। कानपुर के प्रियंवद को जलाने के लिए यह सब किया गया है। क्यों कि पहले मनीषा पर प्रियंवद मेहरबान थे। अब किसी कारण से वह नाराज हैं। तो मनीषा ने महेश को फांसा। उन को जलाने के लिए। महुआ माजी पर अरुण माहेश्वरी मेहरबान हैं तो महेश भारद्वाज मनीषा कुलश्रेष्ठ पर। इन दोनों प्कीरकाशकों की लेखिकाओं पर मेहरबानी की सूची बहुत लंबी है। हर महत्वपूर्ण शहर में ये किसी न किसी को पाले हुए हैं और लेखिकाएं बिछी पड़ी है। यह प्रकाशक अब किताबें छापने और सरकारी खरीद का पैसा डसने के बाद अब अपना हरम बढ़ाने में लगे है। लेखकों की रायल्टी मार कर हरम पर लुटाने में लगे हैं यह सब। ज्योति जी ने भले राजेंद्र यादव के कंधे का सहारा ले रखा है पर यह काम तो अच्छा किया है। बड़ा काम है। यह आइना दिखाने का।
 
वरिष्‍ठ पत्रकार दयानंद पांडेय के फेसबुक वॉल से साभार. 
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