गोरखालैंड आंदोलन को लेकर हमने पहले भी काफी कुछ लिखा है। कई अहम् खुलासे किये, आंदोलन की आफ़ियत को ले संबंधित जमैयत को हर कठिन मोड़ व सही वक़्त पर आगाह किया। नेताओं को मेरी बात शायद नागवार गुज़री। उन्हें लगा कि हम सियासत की ज़मीन तलाश रहे, उनके आबोताब में ख़लल डाल रहे…। और समतल के जिन नेताओं को आंदोलन पर सख़्त एतराज था, उन्होंने तो म्यान से तलवारें खींच लीं, शायद उन्हें लगा कि हम भी समतल से पहाड़ को अलग करने के सियासी खेल में शामिल हैं।
दरअसल अतीत में सत्ता-शतरंज व सियासत का जो ग़ैबी खेल समतल व पहाड़ के दग़ीले नेताओं ने शुरू किया था, वह अब भी जारी है। हम तो सिर्फ़ वक़्त के गवाह हैं। कलम के सिपाही हैं। जम्हूरियत के पहरेदार हैं। लोकमत की अवहेलना कर हम सिर्फ़ रेंग सकते हैं। जिस तरह आज हमारे शूरमानी नेता रेंग रहे…। ज़ाहिर है इससे समस्या का कतई समाधान नहीं हो सकता। अगर आज हम आम-अवाम के बीच तन कर खड़े हैं तो यह हमारी जनप्रतिबद्धता की कुव्वत है। हमारा निष्पक्ष भाव है। पत्रकारिता के मान को बनाये रखने का एक लघु प्रयास अर्थात् यह हमारी कलम की ताकत है जिस पर हमें गर्व है। ग़ैरत व भय तो उन फरफंदी नेताओं को होना चाहिए… जिनका साम्राज्य रेत पर खड़ा है जो किसी भी वक़्त ढह सकता है। फिर भी हमारे इन नेताओं को अपनी ताक़त पर इतना ग़ुरूर!
पूर्व के दार्जिलिंग पार्वत्य परिषद का शेर सुवास घीसिंग आज गीदड़ बनकर भागे-भागे फिर रहा। जिसने 8० के दशक में खूब जमकर गोरखालैंड का नारा बुलंद किया, खूब जंग की…और खूब शोहरत बटोरी, ताज्जुब तो इस बात का है कि गोरखालैंड के सवाल पर पूरा पहाड़ जिसके पक्ष में मज़बूती से खड़ा हुआ, आज उसे पहाड़ पर खड़े होने की ज़मीन नहीं मिल रही…। गोरखालैंड आंदोलन में शामिल हर उम्र के लोगों ने अपने जेहन में पृथक राज्य की हसरत को ले अपनी कुर्बानी दी थी। प्रचंड भावावेग व अंध आवेग का ही वह असर था कि जिसने भी गोरामुमो की राजनीति से असहमति जतायी, या हिंसक नेतृत्व पर सवाल खड़ा किया उसे पहाड़ छोड़कर भागना पड़ा। उसे बर्बर हिंसा का शिकार बनाया गया। गोरामुमो ने अपने विरोधियों के घर जलाये, मकान जलाये, उनके जीवन व जीविका का सर्वनाश कर डाला। हालांकि हिंसा के शिकार सबसे ज़्यादा माकपा के लोग ही हुए।
सिलीगुड़ी के 31 नं. नेशनल हाइवे पर पीडब्ल्यूडी की ज़मीन में अवस्थित बस्ती-'हिमाली शहीद नगर’ पहाड़ से खदेड़े गये लोगों के जख़्मों का एक जीवंत दस्तावेज़ है, गोरामुमो के अत्याचार का एक ऐसा किस्सा है जो शायद ही कभी खत्म हो। तत्कालीन मुख्यमंत्री का. ज्योति बसु ने परवर्ती काल में उसी घीसिंग की सराहना की, उसे ही महिमा मंडित किया। सत्ता-शिखर पर पहुंचते ही उनके सारे पाप धुल गये। घीसिंग व का. बसु बिल्ली व चूहे का अभिनव खेल खेलते रहे। पहाड़ का दर्द समझने की जगह केंद्र सरकार भी सिफ़र सियासी खेल में पासा पर पासा फेंकती रही। जिस धन से पहाड़ का विकास होना चाहिए घीसिंग ने उसे निजी संपत्ति समझ ली। बाद में बुद्धदेव बाबू ने भी वही किया। घीसिंग के लूटतंत्र को विकसित व मज़बूत बनाने में वे मददगार बने। उन्होंने जनभावनाओं को नजरअंदाज किया। एक समय जिस घीसिंग ने माकपा कार्यकर्ताओं का सर्वनाश किया, जम्हूरियत की क़ब्र खोदी, उसी घीसिंग को पहाड़ से खदेड़े जाने पर तत्कालीन मुख्यमंत्री का. बुद्धदेव भट्टाचार्य व नगर विकास मंत्री का. अशोक भट्टाचार्य ने खूब आंसू बहाये।
इतिहास खुद को दुहराता है। दरअसल पहाड़ के किंग घीसिंग भी पहाड़ से बेआबरू कर खदेड़ दिये गये। सिफ़र सियासी खेल के माहिर खिलाड़ी गोरामुमो अध्यक्ष सुवास घीसिंग ने त्रिपाक्षिक समझौते द्बारा गोरखालैंड न सही, पर दार्जिलिंग पार्वत्य परिषद तो हासिल कर ही लिया था, मगर वह परिषद को ठीक तरह से नहीं चला पाये। पहाड़ के समग्र विकास को नजरअंदाज कर वह अपनी सात पीढ़ियों को संभालने में लग गये। परिस्थितियों ने उन्हें पहाड़ छोड़ने पर मज़बूर कर दिया। और परिवर्तित परिस्थितियों में गोजमुमो अध्यक्ष बिमल गुरूंग ने भी घीसिंग के ही तर्ज पर गोरखालैंड का नारा बुलंद कर गोरखा अवाम में अपनी विश्वसनीयता कायम की। शिष्य के आंदोलन की सिफ़त यह कि गांधी की मूर्ति उसके साथ थी जबकि गुरु काली मां के उपासक रहे। फिर भी हिंसा का दौर नहीं थमा। गोजमुमो के लोगों ने सरेआम गोरखालीग अध्यक्ष मदन तमांग की गर्दन काट ली। जबकि दोनों ही पृथक राज्य के लिए लड़ रहे थे।
दरअसल घीसिंग के सोहबत का ही यह असर रहा जो बिमल गुरूंग हिंसक हो गये। घटना के पूर्व डालिम गेस्ट हाउस में हमने बिमल गुरूंग से साफतौर पर कहा था कि आप ऐसा कुछ न करें, जिसके कारण यह पूरा आंदोलन ही विपथगामी हो जाये। फिलहाल आप लोग मदन तमांग को भूल जायें। गोरखालैंड की लड़ाई अपने घर में न लड़ें। घात-प्रतिघात व हिंसा से बचने की कोशिश करें। आप लोग प्रशासन के जाल में फंसते जा रहे हैं…। मगर वही हुआ जिसकी हमें आशंका थी। राज्य सरकार की सिफ़र सियासी चाल को शायद गुरूंग नहीं समझ पाये, बेचारे बुरी तरह फंस गये। साथ ही अपने कथित शूरमानी नेताओं को कानून के शिकंजे में फंसा लिया। दरअसल प्रशासन जो चाहता था वही हुआ। ज़ाहिर है अपनी मर्जी से नहीं बल्कि कानून के डर से गोजमुमो ने जीटए पर अपनी मुहर लगायी।
दरअसल राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी जल्दबाजी में थीं। उन्होंने सोचा, 'भागते भूत की लंगोटी भली’। जो सांड़ अब तक लाल रंग का पीछा कर रहा था, अचानक हरियाली देख कर वह ठहर गया। ऐसे भी उसे महफूज़ ठिकाने की तलाश थी। घीसिंग ने अपना खेल खत्म होते देख छठी अनुसूची में पहाड़ को शामिल करने की मांग दुहरायी और पुलिस सुरक्षा में चोंच मारना शुरू किया। दूसरी ओर बुद्धदेव बाबू ने भी घीसिंग के साथ अपना सुर मिलाया। जीटीए की वैधता पर सवाल उठाये। मगर इसे नजरअंदाज कर गोजमुमो, राज्य सरकार व केंद्र सरकार के बीच जीटीए पर सहमति बन गयी। दरअसल उद्देश्य समस्या का स्थाई समाधान करना नहीं रहा, बल्कि सभी को राजनैतिक श्रेय लेने की जल्दबाजी रही। जीटीए समझौता के दौरान कानूनी प्रावधानों को नजरअंदाज किया गया।
संविधान के अनुबंध की धारा 244 के तहत 5वीं अनुसूची को परिशोधित किया जाना चाहिए था। साथ ही संविधान के अनुबंध की धारा 243 (M)(3) में संशोधन किया जाना चाहिए था। इन कानूनी विसंगतियों को लेकर जहां एक ओर जीटीए का भविष्य अधर में लटका हुआ है, वहीं गोजमुमो अध्यक्ष बिमल गुरूंग व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का अहं भी टकरा रहा है। साथ ही पहाड़ के विरोधी दल भी गोरखालैंड के सवाल पर आंदोलित हो रहे हैं। असली मुद्दे से भटकने को ले जहां बिमल पर पहाड़ का दबाव बढ़ता जा रहा है, वहीं ममता बनर्जी के सख्त रुख को देखते हुए गोजमुमो भाजपा से संबंध बनाने को ले आतुर है। अपने अस्तित्व को बचाने को ले गोजमुमो फिर से पहाड़ में आर-पार की लड़ाई का हुकांर भर रहा है। मगर इस बार की लड़ाई उसके लिए इतनी आसान नहीं होगी। पहाड़ पहले से ही काफी जर्जर हो चुका है। गोजमुमो के पास जीटीए का रोटी है। पहाड़ भूखा है। एकटक लोग रोटी को देख रहे…।
बहरहाल लंबी लड़ाई में उतरने से पहले रोटी को त्यागना होगा। दूसरी ओर मदन तमांग की हत्या का मामला है जिसे राज्य सरकार व सीबीआई राजनैतिक कारणों से अब तक दबाये हुए हैं, उसका भी एक बड़ा खतरा है। 29 जनवरी,2013 को दार्जिलिंग के चौरास्ता पर उत्तर बंग उत्सव के दौरान बिमल गुरूंग व ममता बनर्जी की उपस्थिति में खूब नारे लगे, 'वी वांट गोरखालैंड’। इसके बाद मुख्यमंत्री के तेवर कड़े हो गये। उन्होंने इशारे-इशारों में मदन तमांग के हत्यारों को कानून का भय दिखा दिया। मदन तमांग की पकड़ जो अर्से से चाह कर भी मुख्यमंत्री से नहीं मिल पा रही थीं वह उनके लिए सहज-सुलभ हो गयीं। भारतीय गोरखाओं की पहचान व पहाड़ के विकास का सवाल इन्हीं भुल-भुलैया में खोता जा रहा है। ज़ाहिर है किसी ख़ास नेता व मुंसिफ़ की तरफ़दारी को ले हमने कलम नहीं पकड़ी है। भारतीय गोरखा पतवार विहीन एक ऐसी नाव पर सवार हैं जिसमें सहस्र छिद्र हैं। पहाड़ को नाव और नेता की हक़ीक़त समझना चाहिए। फिलहाल इतना ही…।
लेखक डा. राजेंद्र प्रसाद सिंह सिलीगुड़ी से प्रकाशित 'आपका तिस्ता हिमालय' के संपादक हैं.