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पाकिस्‍तानी अखबार ने छापी थी अफजल के आत्‍महत्‍या की खबर

नई दिल्ली। पाकिस्तान के एक न्यूजपेपर में एक बार अफजल के सूइसाइड करने की खबर छपने से भारत सरकार सकते में आ गई थी। इसकी पुष्टि करने के लिए खुफिया एजेंसियों के टॉप अफसर ने उस वक्त तिहाड़ जेल के डीजी बी. के. गुप्ता से संपर्क कर अफजल के ताजा हालत जाने। जब उन्हें उसके जिंदा होने की खबर मिली तब उन्होंने चैन की सांस ली। उसके ऊपर 24 घंटे सीसीटीवी कैमरों से निगरानी रखी जाती थी।

नई दिल्ली। पाकिस्तान के एक न्यूजपेपर में एक बार अफजल के सूइसाइड करने की खबर छपने से भारत सरकार सकते में आ गई थी। इसकी पुष्टि करने के लिए खुफिया एजेंसियों के टॉप अफसर ने उस वक्त तिहाड़ जेल के डीजी बी. के. गुप्ता से संपर्क कर अफजल के ताजा हालत जाने। जब उन्हें उसके जिंदा होने की खबर मिली तब उन्होंने चैन की सांस ली। उसके ऊपर 24 घंटे सीसीटीवी कैमरों से निगरानी रखी जाती थी।

जेल के एक अधिकारी ने बताया कि उसके सेल के अंदर और बाहर सीसीटीवी कैमरे लगे थे। इससे उसकी हर पल की हलचल कैमरों में कैद होती रहती थी। जब उसके मरने की खबर पाकिस्तानी अखबार में छपी थी, तब पहले उसकी फुटेज कंट्रोल रूम में देखी गई। वहां उसे लेटे हुए ही देखा गया। काफी देर तक भी उसके न हिलने की वजह से उस वक्त जेल नंबर-3 के सुपरिंटेंडेंट मनोज द्विवेदी को उसके सेल में भेजकर हालात जाने गए थे।
 
सूत्रों ने बताया कि 2010 में उसने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर तिहाड़ की जेल नंबर-3 के साबिर, शहजाद और सोनू नाम के कैदियों से ब्लेडबाजी करने का डर जताया था। उसने इन तीनों कैदियों को पेशेवर अपराधी बताते हुए इन्हें अन्य जेल में शिफ्ट करने की मांग की थी। हालांकि, उसके सेल में आम कैदी तो क्या खुद सारे जेल अधिकारी भी नहीं जा सकते थे। लेकिन फिर भी उन कैदियों को अन्य जेल में शिफ्ट कर दिया गया था। अफजल की निगरानी और सुरक्षा के लिए 24 घंटे राउंड द क्लॉक तमिलनाडु स्पेशल पुलिस (टीएसपी) के 10 जवान तैनात रहते थे।
 
हाई सिक्युरिटी वॉर्ड में प्रवेश करने के लिए लोहे का जो दरवाजा है वह उन्हीं जेल अधिकारी, वॉर्डर, हेड वॉर्डर या टीएसपी के जवानों के लिए खोला जाता है, जिन्हें डीआईजी ने उसके सेल में जाने की इजाजत दे रखी थी। 8 सेल के उस वॉर्ड के पूरे हिस्से में सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं। वॉर्ड की दीवारों पर कंटीलें तारों वाली फेंसिंग लगी हुई है।
 
तिहाड़ जेल के पूर्व डीजी बी. के. गुप्ता ने बताया कि वह आमतौर पर शांत रहता था। वह किताबें पढ़ने और घूमने जैसी मांगें करता था। उसे पढ़ने का बहुत शौक था। जेल के एक अन्य अधिकारी ने बताया कि उसे कभी कोई गंभीर बीमारी नहीं हुई। दो-तीन बार बुखार हुआ और एक बार उसके कान में दर्द हुआ था। हर वक्त उसके लिए एक डॉक्टर उपलब्ध होता था। खाने के लिए उसे लंगर में नहीं जाना पड़ता था, बल्कि उसे खाना उसके सेल में ही दिया जाता था। उसे मैगजीन और न्यूजपेपर पढ़ने का शौक था। हिंदी और इंग्लिश के अलावा वह उर्दू का पेपर भी पढ़ता था। उसे हिंदी की अच्छी समझ नहीं थी। आमतौर पर उससे जेल में उसकी पत्नी और बच्चे मिलने आते थे। (एनबीटी)
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