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क्या यशवंत ‘चोर’ है?

'भड़ास' पे खुद उसके मालिक ने अपने बारे में एक लेख छापा है सुशील गंगवार का…शीर्षक है, " भड़ास4मीडिया का पेड न्‍यूज का काला कारोबार". इस लेख में गंगवार ने एक सवाल उठाया है. कहा है कि विज्ञापन जब नहीं है तो वेबसाईट चलती कैसे है? वे लिखते हैं कि यशवंत पेड़ न्यूज़ और दलाली का धंधा करते हैं.

'भड़ास' पे खुद उसके मालिक ने अपने बारे में एक लेख छापा है सुशील गंगवार का…शीर्षक है, " भड़ास4मीडिया का पेड न्‍यूज का काला कारोबार". इस लेख में गंगवार ने एक सवाल उठाया है. कहा है कि विज्ञापन जब नहीं है तो वेबसाईट चलती कैसे है? वे लिखते हैं कि यशवंत पेड़ न्यूज़ और दलाली का धंधा करते हैं.

मैं न यशवंत के साथ हूँ, न खिलाफ़. इस लिए भी कि मैं उन्हें आज तक कभी नहीं मिला. हाँ, एक बार उन्हें वायस आफ इंडिया के दफ्तर में देखा ज़रूर है. उन के बारे में बातें बहुत सुनी हैं. सो, सुशील जो भी कह रहे हैं मैं उसकी तस्दीक कर पाने की हालत में नहीं हूँ. मुझे ये भी नहीं पता कि दोनों में अब बिगड़ी क्यों है. लेकिन एक बात सच है और वो ये कि वेबसाईट चलाना कोई आसान काम नहीं है. खासकर तब कि जब आप पर अदालतों में कुछ केस भी चल रहे हों.

'भड़ास' बेशक मीडिया जगत में काफी चर्चित साईट है. लेकिन उस के नाम का पहला शब्द कुछ ऐसा है जो आम तौर पर अंग्रेजी या हिंदी में किसी सर्च इंजन पर टाइप होता नहीं है. फिर भी इसे इतने लोग देखते हैं तो ये इस साईट के कंटेंट का कारण है. कंटेंट सही भी हो सकता है. गलत भी. विवादास्पद भी. बहुत सारे प्रतिष्ठित प्रकाशन और मीडिया संस्थानों ने अपने उत्पाद बेचने के लिए नंगई का सहारा लिया है. भड़ास अगर विवादास्पद लेख ही छाप रही है तो बुरा क्या है, जब तक वे असत्य न हों. रही पैसे लेकर खबर छापने की बात तो वो आसानी से मेरे गले उतरती नहीं है.

कोई अगर अपने उत्पाद (या अपनी साईट) को पापुलर करने के लिए किसी भी पापुलर साईट का इस्तेमाल कर रहा है तो उसे प्रचार की कीमत चुकानी ही चाहिए. मैंने भी चुकाई. 'बुद्धिजीवी.कॉम' की मेरी एड स्क्रिप्ट चली' भड़ास' पर. मैंने पैसे दिये. ये बिजनेस है. इस में बुरा क्या? रही एडमिशन वगैरह में पैसे खाने वाली बात तो वो व्यक्ति व्यक्ति पर निर्भर करता है. मैंने अपने पूरे पत्रकारीय जीवन में कभी किसी भी काम के लिए किसी का एहसान माँगा ही नहीं. कुछ मांगते हैं, पैसे नहीं लेते. कुछ ऐसे भी हैं जो काम के न धाम के मगर मालपानी फिर भी रगड़ जाते हैं. अपन तब तक नहीं मानेंगे जब तक कोई आ के न कहे कि हाँ मैंने दिए यशवंत को पैसे.

हाँ, वेबसाईट चलाना मुश्किल काम है. विज्ञापन मेरे पास भी नहीं है. जर्नलिस्टकम्युनिटी, श्रद्धांजलि और बुद्धिजीवी डाट काम मैं फिर भी चला रहा हूँ बौहुत बड़े सर्वर, डाटा स्टोरेज और स्पीड के साथ. विज्ञापन नहीं है. मैं मांगता भी नहीं. अब कोई कहे मैं ब्लैकमेल करता हूँ तो कहे लेकिन बताये तो कि किसको किया और क्यों?

बहरहाल एक बहस छिड़ ही जानी चाहिए. तय हो ही जाना चहिये कि 'भड़ास' का सच और यशवंत की असलियत क्या है? कोई और छापे न छापे, मैं छापूंगा. लिखो, भेजो [email protected] पर.

लेखक जगमोहन फुटेला चंडीगढ़ बेस्ड वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों में बड़े पदों पर रह चुके हैं. इन दिनों न्यू मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं.

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