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चीन इस उपमहाद्वीप में एकमात्र गेम चेंजर है, जरा उसकी औकात तो आंकिए

अब राजनीति और जनता, आगे बढ़ गये हैं. देश पीछे छूट गया है. देश के हालात, अब राष्ट्रीय मुद्दे नहीं बनते. न मुल्क को बेचैन करते हैं. देशप्रेम की बात पुरातनपंथी है. अप्रगतिशील और पिछड़े मानस की पहचान. राष्ट्रीय मुद्दे क्या हैं? राहुल गांधी या नरेंद्र मोदी? अपनी सत्ता, अपना स्वार्थ, अपने को महानतम सिद्ध करने की होड़? बाजार के भोग में डूबे युवा वर्ग के बीच फैशन, फ्रेंडशिप वगैरह पर फेसबुक पर होते विवाद. इन सबके बीच भारत मुल्क कहां खड़ा है? उसका भविष्य क्या है? इसी सप्ताह की खबर है. चीन, भारत को चौतरफा घेर चुका है. पाकिस्तान ने एक फरवरी को ग्वादर पोर्ट (बंदरगाह) को बनाने और विकसित करने का काम चीन को सौंप दिया है. पाकिस्तान की इच्छा है कि चीन इस बंदरगाह को नौसैनिक अड्डा भी बना दे.

अब राजनीति और जनता, आगे बढ़ गये हैं. देश पीछे छूट गया है. देश के हालात, अब राष्ट्रीय मुद्दे नहीं बनते. न मुल्क को बेचैन करते हैं. देशप्रेम की बात पुरातनपंथी है. अप्रगतिशील और पिछड़े मानस की पहचान. राष्ट्रीय मुद्दे क्या हैं? राहुल गांधी या नरेंद्र मोदी? अपनी सत्ता, अपना स्वार्थ, अपने को महानतम सिद्ध करने की होड़? बाजार के भोग में डूबे युवा वर्ग के बीच फैशन, फ्रेंडशिप वगैरह पर फेसबुक पर होते विवाद. इन सबके बीच भारत मुल्क कहां खड़ा है? उसका भविष्य क्या है? इसी सप्ताह की खबर है. चीन, भारत को चौतरफा घेर चुका है. पाकिस्तान ने एक फरवरी को ग्वादर पोर्ट (बंदरगाह) को बनाने और विकसित करने का काम चीन को सौंप दिया है. पाकिस्तान की इच्छा है कि चीन इस बंदरगाह को नौसैनिक अड्डा भी बना दे.

पाकिस्तान ने इस काम के लिए तय कुल 1331 करोड़ रुपये के 75 फीसदी का भुगतान भी चीन को कर दिया है. मालदीव के मराओ में चीन उपस्थित है. 1991 में मालदीव ने इस द्वीप को चीन को लीज पर दिया. श्रीलंका के हंबनटोटा पोर्ट पर चीन मौजूद है. डीप-वाटर पोर्ट बनाने का काम लेकर. भारत के रणनीतिक हिसाब से यह बंदरगाह बेहद महत्वपूर्ण है. भारत के मालवाहक जहाज और नौसेना के जहाज भी इधर से गुजरते हैं. बांग्लादेश के चटगांव बंदरगाह में चीन मौजूद है. उसने बांग्लादेश को चटगांव पोर्ट के विस्तार के लिए लगभग 47,000 करोड़ रुपये की मदद की है. चीनी नौसेना के लड़ाकू जहाज यहां आते हैं. इस बंदरगाह से बांग्लादेश का 90 फीसदी व्यापार होता है. म्यामांर (बर्मा) के शीतबे बंदरगाह का अलग सितम है. इसे एक भारतीय कंपनी ने लगभग साढ़े छह सौ करोड़ रुपये में तैयार किया. पर इस बंदरगाह से ज्यादा लाभ चीन ले रहा है. नेपाल में चीन की उपस्थिति अलग है. जम्मू-कश्मीर से अरुणाचल तक चीन, भारतीय सीमा पर तीन तरह से उपस्थित है. अच्छी, मजबूत और चौड़ी सड़कें बना कर. कई हवाई अड्डे बना कर. कई जगहों पर रेल लाइनें बिछा कर.

अब चीन, भारत की सेना की हर कोशिश विफल करने की स्थिति में है. वह हवाई मार्ग और समुद्र मार्ग से 70 हजार चीनी सैनिकों को एक पहल पर, एक जगह जुटा सकता है और भारत? सिर्फ समुद्री रास्ते महज तीन हजार सैनिकों को एक पहल में एकजुट कर सकता है. यानी 70 हजार बनाम तीन हजार का मुकाबला? पिछले सप्ताह ही चीन ने अपने वाई-20 वायुयान का परीक्षण किया है. देश में ही बना वायुयान. 66 टन भार ढोनेवाला. इस तरह चीन, तीस हजार सैनिकों को अपने हवाई बेड़े से ढो सकता है. साथ-साथ सर्वश्रेष्ठ सड़कें और हवाई अड्डे, भारत-चीन सीमा पर चीन ने बना दिये हैं. आज चीन इस उपमहाद्वीप में एकमात्र निर्णायक हैसियत (गेम चेंजर) है.

रूस ने अपना मालवाहक आइएल-76 जहाज चीन को नहीं दिया, चीन ने इसके जवाब में वाई-20 तैयार कर लिया. चीन बारह बड़े जलपोतों का निर्माण कर रहा है. बीस हजार टन से अधिक भार के, जो सेना के तीन डिविजनों यानी तीस हजार सैनिकों को ढो सकते हैं. इससे भारत अपने ही समुद्री क्षेत्र में चीन से मात खा जायेगा. इनके अलावा चीन ने दो लैंडिंग प्लेटफार्म डाक्स भी भारतीय समुद्री इलाके में लगाये हैं, जिनमें दस हजार सैनिक, टैंक और लड़ाई के हेलीकाप्टर रह सकते हैं. इन सबके मुकाबले भारत के पास महज एक जहाज है, आइएनएस जलाश्व. यह जहाज महज तीन हजार सैनिकों को ढो सकता है. यह भी अमेरिका से खरीदा गया है.

भारतीय सीमा में लद्दाख और अरुणाचल के क्षेत्र में खराब नेटवर्क, सड़कों का न होना, अलग गंभीर मुद्दे हैं. चीन की लगातार तेजी से विकास करती अर्थव्यवस्था, नौसेना और वायुसेना की मारक क्षमता में स्तब्धकारी विस्तार भारत के लिए शुभ नहीं है. भारतीय समुद्र में स्थित मालदीव और सेसेल्स द्वीप जैसे देशों से चीन ने प्रगाढ़ रिश्ते बना लिये हैं. अब ये छोटे द्वीप भी भारत को आंख दिखा रहे हैं. आज चीन समुद्री जहाज बनाने में दुनिया में दूसरे नंबर पर है. क्षमता और विस्तार के हिसाब से. अब भारत को भारतीय समुद्र में ही चीन ने घेर लिया है. घर में ही भारत घिर चुका है.

न्यूयार्क टाइम्स में हाल में छपे एक लेख में स्टीवन रैटनर ने भारत और चीन की तुलना की है. काफी खोज और परिश्रम के बाद रैटनर का निष्कर्ष है कि हर मापदंड पर भारत, चीन से बहुत पीछे है. चीन ने 21 वीं शताब्दी में छलांग लगा ली है. झपट कर आगे बढ़ गया है. पर भारत अब भी 21 वीं सदी में घुसने में ही पछाड़ खा रहा है. लंगड़ा और लड़खड़ा रहा है. भाव है कि एक चीते की तरह छलांग लगा चुका है, दूसरा कछुए की चाल में भी नहीं है.

अर्जुन की नजर की तरह चीन ने एक झटके में ही अपने भविष्य के निर्माण में अपनी ताकत झोंक दी है. भारत बहुत पीछे है. आज चीन में प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद 9416 डॉलर है, भारत से दोगुना. 2012 में इसकी अर्थव्यवस्था 7.7 फीसदी की दर से आगे बढ़ी. भारत किसी तरह 5.3 फीसदी के आसपास रेंगा. प्रति व्यक्ति आमद, वार्षिक विकास दर, मुद्रास्फीति, सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में निवेश, बेरोजगारी, बजट घाटा और भुगतान संतुलन की स्थिति में चीन, भारत से बहुत आगे निकल गया है. हर मापदंड और मोरचे पर बहुत आगे.

दुनिया का सच है कि ताकतवर के आगे सब दंडवत होते हैं. आज यही स्थिति चीन की है. भारत के मामूली पड़ोसी देश (मालदीव और सेसेल्स द्वीप) भी भारत को आंख दिखाते हैं. नेपाल तो पूरी तरह चीन की गोद में है. तिब्बत की ऊंचाई पर अब चीन सुपरहाइवे बना रहा है. इधर भारतीय सड़कें मैदानी इलाकों में भी दुर्दिन में हैं. यहां बिजली की खराब हालत है. इन्फ्रास्ट्रक्चर जर्जर हैं. क्योंकि सरकारें सिर्फ गद्दी बचाने में लगी हैं. नेता धन कमाने में लगे हैं या परिवार-रिश्तेदार को उपकृत करने में. राजनीतिक दल पारिवारिक कंपनियों में बदल गये हैं. सिर्फ और सिर्फ कुरसी की लड़ाई है. कुरसी भी क्यों चाहिए? भ्रष्टाचार बढ़ाने, बेईमान, जर्जर और बोझ बन चुकी व्यवस्था को ढोने के लिए?

यह सच है कि ध्वस्त और इनइफीशिएंट व्यवस्था को बदले बिना भारत फिर गुलाम बनने की ओर अग्रसर है. पर यह व्यवस्था बदलने के लिए शासक वर्ग तैयार नहीं है, क्योंकि इसी व्यवस्था में यह वर्ग फल-फूल सकता है. पहले रजवाड़ों के झगड़ों ने देश को गुलाम बनाया, अब भ्रष्ट राजनीतिक दलों की संकीर्ण दृष्टि, तंग मकसद और संकुचित विजन देश को गुलामी की ओर ठेल रहा है. इधर भारत से उच्चतम स्तर पर चीन बात भी करता है, पर भारत को बाहर से पता चलता है कि ब्रह्मपुत्र पर चीन चौथा बांध बना रहा है. हालांकि वर्षों से यह बात सार्वजनिक है. भारत, इन गंभीर मुद्दों पर गहरा आक्रोश व्यक्त करने की भी स्थिति में नहीं है. खबर सार्वजनिक होने के एक सप्ताह बाद छह फरवरी को भारत के रक्षा मंत्री कहते हैं, ग्वादर बंदरगाह पर चीन का काम, भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय है.

उधर छह फरवरी को दिल्ली में भारत के प्रधानमंत्री कहते हैं कि यह शर्मनाक है कि विश्व के शीर्ष 200 विश्वविद्यालयों की सूची में एक भी भारतीय संस्थान नहीं है. चीन, इस क्षेत्र में भी भारत से बहुत आगे है. यह साफ होना चाहिए कि चीन के उकसावे पर हम युद्ध की बात नहीं कर रहे, पर मजबूत संस्थाएं बनाने, श्रेष्ठ इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने, अधुनातन अस्त्र-शस्त्र देश में बनाने यानी वह हर प्रयास करने की बात, जो देश को सर्वश्रेष्ठ बना सके, यही सृजन का काम हम कर दें, चीन को जवाब मिल जायेगा. पर हम-हमारी कौम बातूनी, अकर्मण्य, भ्रष्टाचार-भोग में लिप्त है.

पांच फरवरी की खबर है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भारत की विकास दर का आकलन किया है. कुछ वर्षों पहले तक भारत दुनिया में चीन को पीछे छोड़ आगे निकलता दिखायी दे रहा था. दुनिया के विश्लेषकों, चिंतकों, कंपनियों एवं अर्थशास्त्रियों की नजर में. पर केंद्र सरकार के अनिर्णय की स्थिति (पॉलिसी पैरालिसिस) ने भारत को बांग्लादेश से भी पीछे पहुंचा दिया है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार वर्ष 2012 में भारत साढ़े चार फीसदी की दर से आगे बढ़ा, जबकि इंडोनेशिया, फिलीपींस के साढ़े छह फीसदी की दर से बढ़ने के अनुमान है. इन छोटे देशों से भी हम मात खा रहे हैं. बांग्लादेश 6.3 फीसदी की दर से बढ़ रहा है. हम भारतीय, इंडोनेशिया, फिलीपींस, बांग्लादेश को छोटे मुल्क कह सकते हैं. अपने अकर्म या हीन पुरुषार्थ को छुपाने के लिए. पर उधर चीन जैसा बड़ा देश है. उससे मुकाबला करने के प्रसंग में तो हम कहीं टिकते ही नहीं. इसके लिए बाहरी देश दोषी नहीं हैं. विश्व अर्थव्यवस्था की मुसीबतें जिम्मेदार नहीं हैं. यह तो हमारी अकर्मण्यता, अक्षमता और अकर्म का परिणाम है. सिस्टम कोलैप्स (ध्वस्त) हो जाने की देन है. राजनीतिक इच्छाशक्ति या संकल्प के खत्म हो जाने का सबूत है.

राजनीतिक दलों के दिवालियापन और वैचारिक दरिद्रता का परिणाम. भारत के शहीदों ने इस मुल्क के लिए एक सपना देखा था. यह एक सपने की मौत है. क्या इस तरह के सवाल को आज मुल्क में सबसे अधिक बहस का विषय नहीं होना चाहिए था? पूरे देश के लिए चिंता का विषय! पर इस पर कहीं चर्चा है? 1962 में चीन ने इस मुल्क पर हमला किया, तो अपढ़ और गरीब महिलाओं ने अपने जेवर उतार कर राष्ट्रकोष में दे दिये. देशप्रेम में. इस देश में एक गरीब का बेटा प्रधानमंत्री (लालबहादुर शास्त्री) बना. पाकिस्तान ने हमला किया, तो लोगों ने एक शाम खाना बंद कर दिया. क्योंकि तत्कालीन प्रधानमंत्री का आवाहन था, जय जवान, जय किसान. भूखे रह कर अन्न बचायेंगे, देश को यह बचत देंगे, इसके पीछे यह भाव था. स्वाभिमान के साथ जीना. उस प्रधानमंत्री ने भी एक दिन उपवास शुरू कर दिया. यह थी, भारत की राजनीति और जनता का देशप्रेम. क्योंकि चरित्र वाले लोगों के हाथ में बागडोर थी.

आज किसे याद है कि इस देश की चौथी लोकसभा ने शपथ ली थी कि जब तक चीन, भारत की अधिकृत (1962 में जिस भारतीय जमीन पर कब्जा किया) जमीन नहीं छोड़ता, कोई बात नहीं होगी. आज भारत की सेना के जवान का सिर काट कर दुश्मन ले जाते हैं. पर हम शब्दवीर चुपचाप दर्शक बन जाते हैं. आज कोई चीन के एक जवान को मार कर देख ले. सिर हरिवंशकलम करने की बात तो दूर है. धर्म की राजनीति, जाति की राजनीति, वोट बैंक की राजनीति, अकर्मण्यता की राजनीति, भ्रष्टाचार की राजनीति, सपनों की हत्या करनेवाली राजनीति ने आज मुल्क को कहां पहुंचा दिया है?

लेखक हरिवंश देश के जाने माने पत्रकार हैं. प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं.  हरिवंश जी के लिखे अन्य पठनीय और प्रेरणादायी लेखों / विश्लेषणों / समीक्षाओं को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें-

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