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‘दो दीनदयाल मिल जाते तो देश की तस्वीर बदल जाती’

: पंडित दीनदयाल उपाध्याय की पुण्यतिथि 11 फरवरी के लिए लेख : महान दार्शनिक विचारक चिंतक अर्थशास्त्री इतिहासवेत्ता शिक्षाविद और पत्रकार के रूप में जिसे समूचे भारत ही नहीं वरन पूरी दुनिया में जाना और पहचाना जाता था। समाज के आखिरी पायदान पर खड़े मजलूम व वंचितों के विकास के लिए जिनमें काफी गहरी तड़प और संवेदना थी। उनकी सोच यह थी कि जब समाज के निर्धनतम व्यक्ति के चेहरे पर खुशी के भाव उभरें तभी यह माना जा सकता है कि देश का सही मायने में विकास हो रहा है। एकात्म मानववाद की विचारधारा के प्रतिपादक थे। उनमें अदभुत संगठनात्मक क्षमता थी। उस महान शख्सीयत का नाम था पंडित दीनदयाल उपाध्याय।

: पंडित दीनदयाल उपाध्याय की पुण्यतिथि 11 फरवरी के लिए लेख : महान दार्शनिक विचारक चिंतक अर्थशास्त्री इतिहासवेत्ता शिक्षाविद और पत्रकार के रूप में जिसे समूचे भारत ही नहीं वरन पूरी दुनिया में जाना और पहचाना जाता था। समाज के आखिरी पायदान पर खड़े मजलूम व वंचितों के विकास के लिए जिनमें काफी गहरी तड़प और संवेदना थी। उनकी सोच यह थी कि जब समाज के निर्धनतम व्यक्ति के चेहरे पर खुशी के भाव उभरें तभी यह माना जा सकता है कि देश का सही मायने में विकास हो रहा है। एकात्म मानववाद की विचारधारा के प्रतिपादक थे। उनमें अदभुत संगठनात्मक क्षमता थी। उस महान शख्सीयत का नाम था पंडित दीनदयाल उपाध्याय।

उनके व्यक्तित्व की खूबियों को देखते हुए भारतीय जनसंघ के संस्थापक डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने सन 1951 में यह टिप्पणी की थी कि यदि उन्हें दो दीनदयाल मिल जाते तो वे पूरे देश की राजनीतिक तस्वीर को बदलकर रख देते। वे भारत के लिए देश की क्षमताओं और संस्कृति को ध्यान में रखकर विकास का देशी माडल विकसित करने के पक्षधर थे। यही वह प्रमुख कारण था कि भारतीय जनसंघ ने हर हाथ को काम और हर खेत को पानी नारा बुलंद किया था। आज भले ही वे हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी विचारधारा अब भी करोड़ों देशवासियों के मानस को झकझोर कर कुछ बेहतर करने की प्रेरणा दे रही है।

दीनदयालजी का जन्म उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के नगला चंद्रभान गांव में 25 सितंबर 1916 को हुआ था। उनके पिता भगवती प्रसाद प्रख्यात ज्योतिषाचार्य थे। उनकी माता रामप्यारी देवी बहुत धार्मिक प्रवृत्ति की थीं। मात्र तीन साल की आयु में उनके सिर से पिता का साया विधि ने छीन लिया। आठ साल की आयु से पहले ही मां की भी मृत्यु हो गई। ऐसे में उनकी परवरिस मामा के संरक्षण व देखरेख में हुई। विपत्तियों का पहाड़ टूटने के बावजूद उनकी पढ़ाई मेधाशक्ति की बदौलत जारी रही। बाद में उन्होंने सीकर के हाईस्कूल से मैट्रीकुलेशन की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की। सीकर के तत्कालीन महाराजा ने उन्हें स्वर्ण पदक देकर नवाजा। उन्होंने दीनदयालजी के लिए दस रूपए प्रतिमाह की छात्रवृत्ति और 250 रूपए की पुस्तकीय सहायता दी। उन्होंने पिलानी के बिड़ला कालेज से इंटरमीडिएट की परीक्षा पास की। सन 1939 में उन्होंने कानपुर के सनातन धर्म कालेज से स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की। बाद में अंग्रेजी साहित्य से परास्नातक की डिग्री हासिल करने के लिए उन्होंने आगरा के सेंट जोंस कालेज में दाखिला लिया। परास्नातक प्रथम साल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास कर ली लेकिन दूसरे साल यानी फाइनल की परीक्षा में वे कतिपय घरेलू कारणों से शामिल नहीं हो सके। अपने मामा की सलाह पर वे प्राविंशियल सर्विसेज की परीक्षा में शामिल हुए परीक्षा पास कर ली। साक्षात्कार के बाद चुन भी लिए गए लेकिन उनकी रूचि प्रशासनिक सेवा में नहीं थी इसीलिए उन्होंने नौकरी नहीं ज्वाइन की।

समाजशास्त्र और दर्शनशास्त्र उनको बहुत भाता था। समाजसेवा के क्षेत्र में उतरने से पहले उन्होंने इनका गहन अध्ययन किया। सन 1937 में जब वे कानपुर में सनातन धर्म कालेज में अध्ययनरत थे तो इसी दौरान संयोगवश राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक डाण् हेडगेवार से उनकी मुलाकात हुई। डाण् हेडगेवार ने उनको संघ की एक शाखा में बौदधिक विचार विमर्श के लिए बुलाया जिससे वे बडे़ प्रभावित हुए। सन 1942 में जब दीनदयालजी ने प्रयाग से बीटी की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली तो स्वयं संघ के पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में काम करने का फैसला किया। नागपुर में आयोजित 40 दिन के शिविर में उन्होंने संघ की कार्य रीतियों और उददेश्यों को गहराई से समझा और आत्मसात किया।बाद में जीवनपर्यंत संघ के प्रचारक के रूप में काम करने का संकल्प लिया।

उनमें आशावादिता कूट-कूटकर भरी हुई थी। साथ ही साथ सांगठनिक क्षमता भी अदभुत थी। उनके विचार लोगों को सम्मोहित कर देते थे। सन 1940 में लखनउ से उन्होंने राष्ट्रधर्म नामक पत्रिका की शुरुआत की। यह पत्रिका राष्ट्रवाद की विचारधारा को प्रसारित और प्रचारित करने की मंशा से निकाली गई थी। बाद में उन्होंने पांचजन्य और दैनिक स्वदेश की भी शुुरुआत कराई। सन 1951 में जब डाण् श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ की स्थापना की तो दीनदयालजी को उत्तर प्रदेश इकाई का महासचिव बनाया गया। बाद में राष्ट्रीय महासचिव चुने गए। सन 1953 में जब डाण् मुखर्जी का निधन हो गया तो पार्टी को पूरे देश में विस्तार देने और उसकी आंदोलनात्मक गतिविधियों को तेज करने की जिम्मेदारी दीनदयालजी के कंधों पर आ गई।उन्होंने करीब 15 साल तक इस काम को बखूबी अंजाम दिया।

हालांकि वे चुनाव भी लड़े लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। अलबत्ता वैचारिक प्रखरता के कारण विपक्षी भी उनका लोहा मानते थे। उनका मानना था कि भारत की अर्थव्यवस्था आत्मनिर्भर होनी चाहिए। गांवों को विकास की धुरी बनाया जाना चाहिए। विकेंद्रीकरण की नीति अपनाई जानी चाहिए। उनका मानना था कि ऐसी नीतियां बनाई जाएं जिससे हर आम आदमी के हाथों को काम मिले। खाद्यान्न के उत्पादन में देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए वे हर खेत को पानी मुहैया कराने के प्रबल पक्षधर थे। उनकी सोच यह थी कि आजादी मिलने के बाद भारत पश्चिमी देशों की विकास की अवधारणा का अनुसरण कर विकास नहीं कर सकता है। आजादी के बाद देश की नीतियां पश्चिमी अवधारणा से प्रभावित हो गईं। नतीजतन ये देश की मूल जरूरत से भटक गई।

वे नई तकनीकी को अपनाना जरूरी मानते थे लेकिन उतनी ही मात्रा में जितनी देश को वास्तव में जरूरत हो। वे बेलौस अंदाज में कार्यकर्ताओं का आहवान करते थे कि जब सरकार की नीतियां अच्छी हों तो सहयोग करो और जब भी गलत जान पड़ें तो निर्भयतापूर्वक उनका मुखर विरोध करो। वे राष्ट्रप्रेम को सर्वोच्च प्राथमिकता देते थे। करोड़ों दिलों में राष्ट्रवाद की चेतना जगाने वाले इस महामानव को 11 फरवरी 1968 को मुगलसराय स्टेशन के यार्ड में खड़ी एक रेलगाड़ी में संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाया गया।

पंडितजी ने अपने जीवनकाल में हिंदी में चंद्रगुप्त नामक नाटक लिखा। शंकराचार्य की जीवनी लिखी। उन्होंने डाण् हेेडगेवार पर मराठी में लिखी गई पुस्तक का हिंदी में अनुवाद भी किया। वे कहा करते थे कि हमें अपनी राष्ट्रीय पहचान के बारे में विचार करना चाहिए। इसके बगैर स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं रह जाता है। भारतीय समस्याओं की जड़ वे राष्ट्रीय पहचान न होने को ही मानते थे। उनका मत था कि अवसरवाद की सोच ने राजनीति के प्रति जनता के विश्वास को हिला दिया है।

उनका मानना था कि पश्चिमी विज्ञान और पश्चिमी जीवन दर्शन दो अलग.अलग बातें हैं। पश्चिमी विज्ञान सार्वत्रिक है जिसे हमें आगे बढ़ने के लिए अपनाना चाहिए लेकिन पश्चिमी जीवनशैैली व मूल्यों के संदर्भ में वैसा नहीं कर सकते हैं। स्वतंत्रता तभी अर्थपूर्ण होगी जब यह भारतीय संस्कृति की अभिव्यक्ति के विस्तार का साधन बने।

लेखक उमेश शुक्ल जनसंचार व पत्रकारिता संस्थान, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय झांसी से संबद्ध हैं.

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