सुरक्षा बलों में व्याप्त भ्रष्टाचार एवं समानता समेत तमाम समाजिक मुद्दों पर कानूनी तरीके से लड़ने-भिड़ने वाले आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर समानता के लिए एक और लड़ाई छेड़ दी है. उन्होंने हाई कोर्ट लखनऊ बेंच में दो अलग-अलग याचिका दायर कर सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स एक्ट एवं रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स एक्ट तथा दूसरे में प्रोविंसियल आर्म्ड कॉस्टेब्लरी एक्ट के कुछ प्रावधानों को चुनौती दी है. इन याचिकाओं में श्री ठाकुर ने कहा है कि इन अधिनियमों में कई ऐसे प्रावधान हैं, जो विभेदकारी प्रतीत होते हैं, इसलिए विधिविरुद्ध घोषित किए जाने चाहिए.
उन्होंने कहा है कि ये सभी बल भारतीय सेना की तर्ज पर बने हैं तथा आर्मी एक्ट 1950 में भारतीय सेना में कार्यरत सभी कर्मी अपने आपराधिक दायित्वों के लिए समान रूप से जिम्मेदार माने गए हैं. श्री ठाकुर ने याचिका में कहा है कि इसी प्रकार बोर्डर सेक्युरिटी फ़ोर्स (बीएसएफ), इंडो तिब्बत बोर्डर पुलिस (आईटीबीपी) तथा सीमा सुरक्षा बल (एसएसबी) में भी सभी कर्मी अपराधिक कृत्यों और अकृत्यों के लिए समान रूप से उत्तरदायी माने गए हैं. लेकिन सीआरपीएफ एक्ट, आरपीएफ एक्ट तथा पीएसी एक्ट में इस सम्बन्ध में वरिष्ठ और कनिष्ठ अधिकारियों में अंतर किया गया है. इन बलों में अधीनस्थ कर्मियों को अवकाश से अनुपस्थित रहने, अपने नीचे के अधिकारियों से दुर्व्यवहार करने, वरिष्ठ अधिकारियों से दुराचरण करने से ले कर अन्य कार्यों के लिए आपराधिक रूप से जिम्मेदार बनाया गया है, जबकि वरिष्ठ अधिकारियों को इससे मुक्त रखा गया है.
याचिका में अमिताभ ठाकुर ने कहा है कि यह भेदभाव किसी भी तर्क पर आधारित प्रतीत नहीं हो रहे हैं, अत: अनुच्छेद 14 में दिए गए समानता के अधिकार के विपरीत है. याचिका पर सुनवाई गुरुवार 14 फरवरी को होगी. अमिताभ ठाकुर के अधिवक्ता अशोक पाण्डेय हैं.