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बिहार में इमरजेंसी जैसी प्रेस सेंसरशिप… स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता कर पाना संभव नहीं – प्रेस परिषद

नई दिल्ली। प्रेस परिषद की एक जांच टीम ने बिहार की नीतीश सरकार पर करारा हमला बोला है। उसने आरोप लगाया है कि राज्य में स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता करना संभव नहीं है। उसे इमरजेंसी जैसी सेंसरशिप का सामना करना पड़ रहा है। उसका भविष्य खतरे में है। विज्ञापन का भय दिखाकर प्रेस को सरकार का अघोषित मुखपत्र बनाने की कोशिश हो रही है। इस स्थिति से उबरने के लिए जांच दल ने दिशानिर्देशों का कड़ाई से पालन करते हुए विज्ञापन जारी करने के लिए एक स्वतंत्र एजेंसी के गठन की वकालत की है।

नई दिल्ली। प्रेस परिषद की एक जांच टीम ने बिहार की नीतीश सरकार पर करारा हमला बोला है। उसने आरोप लगाया है कि राज्य में स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता करना संभव नहीं है। उसे इमरजेंसी जैसी सेंसरशिप का सामना करना पड़ रहा है। उसका भविष्य खतरे में है। विज्ञापन का भय दिखाकर प्रेस को सरकार का अघोषित मुखपत्र बनाने की कोशिश हो रही है। इस स्थिति से उबरने के लिए जांच दल ने दिशानिर्देशों का कड़ाई से पालन करते हुए विज्ञापन जारी करने के लिए एक स्वतंत्र एजेंसी के गठन की वकालत की है।

प्रेस स्वतंत्रता के हनन की शिकायतों की जांच के लिए परिषद की एक टीम पिछले दिनों बिहार गई थी। उसने वहां से लौट कर अपनी रिपोर्ट प्रेस परिषद को सौंप दी है। रिपोर्ट में कहा गया है, इमरजेंसी के दिनों में स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता पर जैसी सेंसरशिप लगी हुई थी, वह स्थिति वर्तमान में नीतीश सरकार के कार्यकाल में देखने को मिल रही है। मौजूदा हालात में ज्यादातर पत्रकार घुटन महसूस कर रहे हैं। स्वतंत्रतापूर्वक काम करने में वह खुद को असहाय पा रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार सरकारी खौफ के चलते आंदोलन, प्रदर्शन, प्रशासन की कमियों को उजागर करने वाली और जनसमस्याओं से जुड़ी खबरों को अखबारों में स्थान नहीं मिल पा रहा है। सरकार के दबाव के कारण भ्रष्टाचार उजागर करने वाली खबरों को जगह नहीं पा रही है। कवरेज में विपक्ष की अनदेखी कर सत्तापक्ष की मनमाफिक खबरों को तरजीह दी जा रही है।

जांच दल ने कहा है कि बिहार का समूचा मीडिया उद्योग सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर रहता है। औद्योगिक रूप से पिछड़ा राज्य होने के कारण यहां पर अखबारों को निजी क्षेत्र का विज्ञापन नहीं मिलता है। सरकार, मीडिया की इसी कमजोरी का फायदा उठाते हुए उसे अपने इशारे पर चलने के लिए मजबूर करती है। तीन सदस्यीय जांच टीम ने कहा है कि मीडिया के ऊपर इस तरह के अप्रत्यक्ष नियंत्रण से लोगों के सूचना हासिल करने का अधिकार बाधित हो रहा है। इससे अनुच्छेद 19 [1] के तहत प्रदत्त संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन हो रहा है। परिषद के अनुसार विज्ञापनों पर सरकार का एकाधिकार होने के कारण ही मीडिया को सरकारी मुखपत्र बनने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

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