सहारा की नौकरी बड़ी बुरी. खासकर पत्रकार की. लखनऊ वालों के दिल से पूछिए. महीने दो महीने पर उन्हें कोई न कोई कार्ड या सामान थमा दिया जाता है और कह दिया जाता है कि सारे विधायकों और अफसरों के यहां पहुंचा दीजिए. सु्ब्रत राय सहारा का जन्मदिन हो या उनके बेटों-नाती-पोतों की, हर मौके के निमंत्रण को बांटने का जिम्मा पत्रकारों को दे दिया जाता है.
बेचारे पत्रकार, आधुनिक जमाने के नाई की भूमिका में भी वे गर्व के साथ यहां वहां कार्ड बांटते खुश दिखने की कोशिश करते रहते हैं लेकिन असल में उनका दिल रो रहा होता है. उन्हें लगता है कि वे तो कलम का काम करने के लिए यहां आए थे लेकिन उन्हें तो कुछ और ही करना पड़ रहा है. ताजा मामला है सहारा की नून-तेल की नई खुली दुकान क्यूशाप के सामान बांटने की.
सुब्रत राय सहारा के दिमाग में जोरदार खयाल आया कि क्यूं न क्यूशाप के सामान फ्री में विधायकों अफसरों तक पहुंचा दिया जाए ताकि वे लोग एक बार इसका इस्तेमाल करके इससे प्रभावित हों और इसी बहाने सहारा से उनका पीआर भी ठीकठाक हो जाएगा. तो, इस काम में लगा दिया गया पत्रकारों को. नूनतेलदालचावलम् नामक भांति भांति के पदार्थम से लैस गठरी को पीठ पर लादे सहारा के पत्रकार खटखटाने लगे नेताओं अफसरों का दरवाजा. एक तो पत्रकार, उपर से लादे हुए माल… नेताओं अफसरों को लग रहा कि कहीं ये स्टिंग तो नहीं कर रहे, कुछ दे दाकर फंसा तो नहीं रहे…
सो पहले पहल तो सभी इन पत्रकारों को दुरदुराते हुए नजर आते हैं… लेकिन जब पत्रकार सहारा श्री उर्फ सुब्रत राय सहारा का पत्र उन्हें थमाते हैं कि देखिए सहाराश्री ने क्या लिखा है, तब जाकर नेताओं अफसरों की सांस में सांस आती है और उनके चेहरे पर रौनक आ जाती है, दो कारणों से, कि देखो बेचारा पत्रकार, कैसे कर रहा उनका मनुहार और फ्री में दे रहा सहारा का सामान. दूसरे, कि ऐसे पत्रकार अगर हैं तो डरने की जरूरत नहीं क्योंकि ये उल्टी खबर तो लिख ही नहीं सकते, आखिर इन्हें सहारा और सहाराश्री का पीआर जो मेनटेन रखना है. नीचे वो पत्र है, जो सहारा के क्यूशाप के सामान के साथ नेताओं-अफसरों को दिया जा रहा है…






