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सुख-दुख...

इंटरव्यू (कहानी)

वो बोले, "ठीक है, आपका सीवी हमारे पास है…वी विल कांटेक्ट यू वेनएवर नीडेड"

वो इस जुमले का मतलब ठीकठाक समझता था, लेकिन उसे ये समझ नहीं आ रहा था कि उससे चूक कहां हो गई…उसका इंटरव्यू तो अच्छा ही गया था, फिर ऐसा क्यों कहा?

वो बोले, "ठीक है, आपका सीवी हमारे पास है…वी विल कांटेक्ट यू वेनएवर नीडेड"

वो इस जुमले का मतलब ठीकठाक समझता था, लेकिन उसे ये समझ नहीं आ रहा था कि उससे चूक कहां हो गई…उसका इंटरव्यू तो अच्छा ही गया था, फिर ऐसा क्यों कहा?

वो चौथी मंज़िल से सीधे नीचे पहुंचा और रिसेप्शनिस्ट को एक मुस्कान दे कर सीधे बाहर चला आया, भूख उसके पेट में रनडाउन सी ऊपर नीचे हो रही थी। पर्स में 40 रुपए पड़े थे और जेब में 5 का एक सिक्का…”चाय भी 7 रुपए की हो गई है, फिर बस का किराया होगा 10 रुपए…” 45 में 17 घटा कर उसने 6 रुपए की सिगरेट जोड़ी और देखा कि 22 रुपए बचेंगे। वो तेज़ी से छोले कुल्चे वाले की ओर बढ़ा, उसे 10 का नोट दिया और इधर उधर देखने लगा।

सामने से तभी वो लड़का दिखा, जो रिसेप्शन पर उससे टिकटैक का मतलब पूछ रहा था…वो उसे देख कर मुस्कुराया और बोला, "कैसा रहा…"

"सैलरी पूछ रहे थे…मैंने बताई…और फिर पूछा कि कब से ज्वाइन कर सकते हैं…देखो शायद मंडे से ज्वाइन करना होगा…रिपोर्टिंग पर…"

उसका चेहरा उतर गया था, कुल्चे आ गए थे और कुल्चे के नीचे किसी शशि कुमार का सीवी, उसे रखने के कागज़ की तरह इस्तेमाल किया गया था…फिल्म सिटी में ये कोई नया नज़ारा नहीं था, वो ऐसी कहानियां सुन चुका था, जब कई लोगों ने अपने ही सीवी के पन्ने पर ब्रेड पकौड़ा या समोसा खाया था। हालांकि ये उसका सीवी नहीं था, लेकिन उसे लगा कि जैसे उसका ही सीवी हो…उसने कुल्चे को देखा, और फिर तेज़ी से खाना शुरु किया, कुल्चे खत्म होते होते चाय पीने का उसका मन जाता रहा था…आंखों में आंसू ढुलकने से पहले उसने सिगरेट खरीदी, सुलगाई और ढुलकते सूरज को देखने लगा। उसे लगा कि जब इस बेवकूफ को नौकरी पर रख रहे हैं, तो उसे भी देर सवेर बुला ही लेंगे…हालांकि वो "वी विल कांटेक्ट यू वेनएवर नीडेड" के जुमले का मतलब जानता था…

घर के लिए बढ़ते वक़्त उसने तय किया कि आज बस से नहीं जाएगा…तो एक और सिगरेट पी सकता है, तब भी 4 रुपए बचेंगे। एक सिगरेट और खरीद कर ऊपर वाली जेब में डाली और चलते चलते सोचने लगा कि आखिर उस से इंटरव्यू में क्या गलती हुई…बल्कि उसने तो सारे सवालों के सही जवाब दिए थे…उसकी कॉपी देख कर चेक करने वाले प्रोड्यूसर ने कहा था, "सर, ब्रिलिएंट कॉपी है…ऐसी कॉपी लिखने वाला कोई रिपोर्टर तो छोड़िए, प्रोड्यूसर भी नहीं है डेस्क पर…बढ़िया…बहुत बढ़िया…" वो बाहर बैठा सुन रहा था, उसे लगा कि इस बार नौकरी मिल ही जाएगी, फिर क्यों…

वो याद कर रहा था…"क्यों सरनेम कुमार ही है क्या…असल में भी"

"नहीं सर, वो वैसे तो शुक्ल है….लेकिन.."

"लेकिन क्या…फिर लिखते क्यों नहीं…मेरा भी झा है, मैं तो लिखता हूं"

"नहीं सर, वो दरअसल…मैं जाति को नहीं मानता सो जाति का नाम भी हटा दिया…"

साथ बैठा गंजा आदमी बोला

"ओह…सीम्स इट चेंजेस समथिंग…कास्ट इज़ अ ट्रुथ, मे बी इट इज़ बिटर फॉर यू, बट इफ़ इट इज़ देअर, इट इज़ देयर…वैसे भी यू वोंट गेट रिज़र्वेशन ईवेन इफ़ यू रिमूव योर सरनेम…"
तीसरा मोटी मूंछों और खिचड़ी बालों वाला शख्स बोला,

“काजी…कामरेड हैं का?”

“हां जी, फुलटाइमर भी रहा हूं…”

“हां तो, तो क्या आ गई क्रांति…हाहाहाहाहा”

तीनों की हंसी पर वो भी मजबूरी में हंसने लगा…और फिर अगला सवाल आया, “भारत में पहला कम्युनिस्ट सीएम कौन था?”

“जी, ई एम एस नम्बूदरीपाद…”

“अच्छा….तो फिर ज्योति बसु कौन थे?” (तीनों मुस्कुराए…)

“जी सर…वो तो पश्चिम बंगाल में सीएम थे, लेकिन नम्बूरीपाद केरल में सीएम थे, देश के पहले नॉन कांग्रेस सीएम, सीपीएम के बड़े नेता थे…”

“मालूम है बड़े नेता थे, लेकिन पहले कम्युनिस्ट सीएम ज्योति बसु थे कामरेड…इतना भी नहीं पता है…”

“पक्का है सर, सौ फीसदी…आप गूगल कर लें…”

“हाहाहाहाहा…अब पत्रकार गूगल के भरोसे रहेगा तो हो चुका…कई साल रिपोर्टिंग की है हमने…”

“सर लेकिन मैं कन्फ़र्म हूं…नम्बूदरीपाद 1957 में सीएम बन गए थे, जबकि ज्योति बसु… ”

“चलिए आपको गूगल ही दिखा देते हैं…”

पहला वाला शख्स मुस्कुराया और गंजा आदमी अपने लैपटॉप गूगल करने लगा…लेकिन 15 सेकेंड बाद ही उसका चेहरा अजीब सा हो गया…

“नम्बूदरीपाद का पूरा नाम क्या था…”

“सर…एलमकुलम मनक्कल संकरन नम्बूदरीपाद…वैसे”

“चुनाव कहां से लड़ते थे…”

“कोझिकोड सर…”

“कितनी बार सीएम बने…”

“सर पहली बार 1957 से 1959, दूसरी बार 1967 से 69…”

“अभी कहां है…”

“सर…1998 में देहांत हो गया…1909 में पैदा हुए थे शायद…”

तीनों के चेहरे पर गंभीरता थी…गंजा और खिचड़ी बाल वाला कुछ खिसियाए से लग रहे थे, तीनों चुप थे…फिर खिचड़ी बाल वाला शख्स बोला…

“सिविल सर्विस क्यों नहीं टाइप किया…”

“सर…वो जर्नलिज़्म करना था…”

“कहां रहते हो…”

“सर, पांडवनगर…”

तीनों ने एक दूसरे को देखा, चेहरे पर अजीब से वितृष्णा के भाव थे…

"ठीक है, आपका सीवी हमारे पास है…वी विल कांटेक्ट यू वेनएवर नीडेड"

उसे समझ आ गया था, कि उससे गलती कहां पर हुई थी…

इस कहानी के लेखक युवा और तेजतर्रार पत्रकार मयंक सक्सेना हैं. मयंक जी न्यूज, सीएनईबी, सीवीबी, न्यूज24 समेत कई न्यूज चैनलों में काम कर चुके हैं. फिल्म, टीवी, थिएटर के लिए भी लिखते पढ़ते रहते हैं. मयंक सामाजिक मुद्दों और सुधारवादी आंदोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं और नेतृत्वकारी भूमिका में रहते हैं. मयंक से संपर्क 09310797184 के जरिए किया जा सकता है. मयंक रचित चंपादक सीरिज पढ़ने के लिए आप इस पर क्लिक करें- चंपादकजी कहिन

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