मुलायम सिंह यादव सपा के मुखिया के साथ-साथ एक अच्छे आलोचक भी हैं। वह अखिलेश सरकार के लिए एक कुशल सारथी, रणनीतिकार, सलाहकार तो हैं ही, वहीं ‘गाडफादर‘ भी हैं। खामियों को उजागर करते हैं। अच्छी बातों को सरकार सामने रखते हैं। उनकी लोकसभा चुनावों के लिए समीक्षाएं एवं सरकार, संगठन और कार्यकर्ताओं के बीच ललकार और लताड़ यही जाहिर करती है कि उन्हें अपने लक्ष्य के प्रति काफी फिक्रमंद हैं। उनकी चिंता वाजिब है।
जिस तरह विधानसभा चुनाव में उन्होंने अखिलेश को रथ पर बैठाकर पूरे प्रदेश की कई बार परिक्रमा करवाई। उन्हें जन-जन से रूबरू होने का मौका मिला और जनता जनार्दन ने सिर आंखों पर बैठाया, इससे अखिलेश के प्रतिद्वंद्वी हैरान रह गये। प्रदेश की पहले-पहल मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने वाले अखिलेश यादव का तजुर्बा भले ही विधानसभा में कतई न रहा हो, लेकिन पिता का साया उनके सिर पर आज भी मौजूद है, जिसी बदौलत आज तक किसी ने भी उन पर अंगुली नहीं उठायी है। सपा मुखिया दूसरे नेताओं की नाई अखिलेश को भी खरी-खोटी सुनाते हैं, जिससे मंत्री-संत्री भी अपने को ‘अपडेट‘ कर लेते हैं। ब्यूरोक्रेट में इसकी सुगबुगाहट शुरू हो जाती है।
सपा सुप्रीमो सरकार को दिशा निर्देश देते रहते हैं। सरकार की दिशा परखते हैं। विपरीत दिशा देखकर वे सरकार के मंत्रियों और ब्यूरोक्रेट को समझाते हैं, बुझाते हैं। नहीं मानने पर उनका बोरिया-बिस्तर भी बंधवा देते हैं। सपा सुप्रीमो अखिलेश के सुरक्षाकवच और पीछे-पीछे चलने वाली टीम पर भी वह विहंगम दृष्टि फेरते देखा जाते हैं। वह अखिलेश सरकार की निगहबानी के लिए प्रदेश के मुख्य वक्ता राजेन्द्र चौधरी का तीसरी आंख की तरह प्रयोग करते हैं। भूल-चूक और गलतियां सही करने का जिम्मा चौधरी के पास डालने वाले धरती पुत्र अपने घर परिवार की भी योजनागत तरीके से निगरानी रखते हैं। वह दुश्मन की निगाह को पहचानते हैं। कौन तीर कब चलाना है वह अच्छी तरह जानते हैं। मौका मिलने पर वह पटकनी देते हैं। हालांकि वह नरम दिल इंसान हैं। मुसीबत में भी वह साहस का परिचय देते हैं। उनके सामने ऐसे-ऐसे मौके आये, जहां बैलेट के साथ-साथ बुलेट का सामना करना पड़ा। उनके पास शत्रु दल का यदि कोई आया तो दया भावना के साथ उसको फौरन मित्र बनाकर त्वरित फैसला लेने में हिचक नहीं रखते है।
अपनी टीम में आने के बाद वह उसे दरकिनार नहीं करते, परिवार से ज्यादा प्रेम मुलायम सिंह का प्रमुख अस्त्र है। यह एक समुद्र मंथन जैसा वे अपने किले को दूसरों पर छोड़ना पसंद नहीं करते हैं। वह हर गतिविधि पर अपनी पैनी निगाह रखते हैं। शायद वह सोचते हैं कि अगर निगरानी में कोई चूक हो गयी तो उन्हें विरोधी छोड़ेंगे नहीं। इससे पहले खुद को चुस्त और दुरूस्त रखना पड़ेगा। अपने को इक्कीस रखने वाले धरती पुत्र पीछे नहीं हटते। अपने कार्यकर्ताओं और मंत्रियों की कुछ गलतियों के कारण उन्हें हानि उठानी पड़े, अतः वह पहले ही उन्हें समय-समय पर चेताने में कतई कोताही नहीं बरतते हैं। वे अपने दूसरे नंबर के सेनापति को कतई नजरंदाज नहीं कर सकते चाहे वह प्रगाढ़ सेनापति और दाहिने हाथ बेनी प्रसाद वर्मा रहे हों, या अमर सिंह और अब पुत्र अखिलेश यादव। अखिलेश के साथ उनका दोहरा रिश्ता है, कहीं वह उनके पिता है तो कई मौकों पर गॉड फादर। इतिहास उठा कर देखा जाये तो ऐसे लोगों की कमी नहीं है जिन्हें अच्छा गॉड फादर मिल गया और वह सफलता की सीढ़ी चढ़ते गये। अखिलेश भी उन्हीं खुशनसीबों में से एक हैं।
बहरहाल मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपने गाडफादर के निर्देशों को पालन कराने में कोई कोताही नहीं बरत रहे हैं। वे ब्यूरोक्रेट पर चाबुक चलाने के लिए पूरी तरह तैयार खड़े हैं। इन 11 महीनों के दरम्यान उन्होंने अपने गाडफादर से बहुत कुछ सीखा और पाया है। वह सरकार चलाने की नब्ज को पहचानने लगे हैं। वह गाडफादर के पदचिन्हों पर चलने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। लेकिन अफसर, मंत्री और पार्टी के कुछ नेता कहीं न कहीं कुछ गुल खिला ही देते हैं। जिसके कारण गाडफादर को गुस्सा आता है। वह गाडफादर को पलटकर कोई जवाब तो नहीं देते, लेकिन उनकी बातों को अमल जरूर करते हैं। वह राज्य में दस फीसदी जीडीपी दर हासिल करने के लिए बड़े बदलाव लाना चाहते हैं। कानून व्यवस्था में सुधार के लिए वह हर कदम उठा रहे हैं। जिससे आने वाले लोकसभा चुनाव तक उनकी सरकार की एक अच्छी छवि बन सके। उद्योग धंधों को बढ़ाने के लिए उन्होंने काफी प्रयास किया है। बीस लाख वाले राज्य में युवाओं की अच्छी संख्या प्रदेश के
विकास का स्रोत मानते हैं। अब देखना यह है कि ‘गाडफादर‘ की कसौटी पर मुख्यमंत्री कितना और खरे होकर निकलते है। अखिलेश का यह नसीब है कि विपक्षियों के लिए तेजतर्रार सपा प्रमुख मुख्यमंत्री के लिये हमेशा ‘मुलायम’ रहते हैं।
लेखक अजय कुमार लखनऊ में पदस्थ हैं. वे यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों और पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. अजय कुमार वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं





