: नियम सबके लिये बराबर होने चाहिये : इन दिनो यूपी में संकट मंडराने का भय अगर किसी के ऊपर आता दिखाया जा रहा है तो वह है पत्रकार बिरादरी। मामला है सरकारी मकान व पत्रकारपुरम् में लिये गये भूखण्डों मे आलीशान मकान तथा व्यवसाय करने का। कुछ अपने ही पत्रकार भाई दूसरों के उकसावे में आकर अपनी ही जमात की जांघ को खोलने व नंगा करने में लगे हैं। मैं यह नहीं कहता कि आप गलत लोगों के खिलाफ मुहिम न चलायें या फिर उन लोगों को चिन्हित न करें। लेकिन खबर के दूसरे पहलू को भी सामने लाने का भी प्रयास होना चाहिये।
सिर्फ लोकप्रियता पाने व खुद उस श्रेणी में अपने आपको लाभ पाने की लालसा लिये तथा कुंठाग्रस्त होकर दूसरे के उकसावे में आकर अभियान चलाने से बचना चहिये। इस तरह की हरकतों का हमारे बिरादरी को डटकर विरोध करना चाहिये क्योकि इस पर पूरी पत्रकार बिरादरी बदनाम होती है।
यूपी की पत्रकारिता में एकजुटता न होना तथा कुछ वरिष्ठ पत्रकारों की हर सरकार में चापलूसी तथा आईएएस को जा-जाकर अपनी राय देकर दूसरों का नुकसान करने की मानसिकता ने ही आज यूपी के पत्रकारों की जो हालत कर दी है उसको बयान नहीं किया जा सकता। मेरा मानना है कि आज जो हालात उभर रहे हैं उसके लिये कुछ लोग पूरी तरह से स्वयं जिम्मेदार हैं। मैं इस बात का हिमायती हूं कि अगर कोई पत्रकार गल्ती करता है और दागी है तो आप उसे चिन्हित अवश्य करें लेकिन अपने फोरम में, न कि दूसरों को बढ़ावा देने के लिये अपनी जांघ को खोलने का व उसे नंगा करने का प्रयास करें, यह नहीं होना चाहिये, मैं इसका समर्थन नहीं करता।
मैं हर उस गलत बात का सबसे पहले डटकर विरोध करता हूं जो गलत है। लेकिन एक घटना से पूरी बिरादरी को गलत नहीं ठहराया जा सकता है। हम स्पष्ट रूप से बात करना चाहते हैं। वर्तमान में सपा की अखिलेश सरकार में पत्रकारों को जो बदनाम करने का कुचक्र पीछे से चलवाया जा रहा है वह पूरी तरह से सही नहीं है। हर पत्रकार गलत नहीं है जिसने नियमों का उल्लघंन किया है उसे नियम के दायरे में बांधना किसी भी लोकप्रिय सरकार का काम नहीं है। नियम बनाये जाये लेकिन सभी के लिये बराबर तौर पर। अगर नियम बनते हैं तो इसका शिकार खाली पत्रकारों ही क्यों हो? अगर आप नियम-कानून की बात करते हैं तो नियम कानून सभी के लिये बराबर हैं।
पत्रकारों को मकान से बेदखल करने या उनके खिलाफ कानून व नियम बनाने से समाज पूरी तरह से साफ सुथरा नहीं हो जायेगा। हमे अगर समाज से भ्रष्टाचार को मिटाना है और नियम कानून का कड़ाई से पालन कराना है तो फिर पत्रकारों के साथ-साथ समाज के हर उन अंगों में बैठे लोगों पर भी निगाहें डालनी होगी जो समाज के सबसे बड़े भेड़िये हैं। सरकार को गलत राय देकर सदैव अपना उल्लू सीधा करने वाले नौकरशाहों व नेताओं तथा राज्य कर्मचारियों व न्यायालयों में बैठे जजों को भी इस दायरे में लाना होगा कि अगर पत्रकारों के लिये नियम बनाये जायेगें तो उनके लिये भी नियम के अनुसार कार्यवाही होगी।
राजधानी लखनऊ में सरकारी कालोनियों में सिर्फ पत्रकार ही नहीं रहते हैं। इन कालोनियों में बड़े-बड़े विभागों के ब्यूरोक्रेट आईएएस, पीसीएस व आईपीएस तथा पीपीएस अधिकारी भी निवास करते हैं। जिनके शहर के मुख्यालयों में बड़ी आलीशान कोठीयां मौजूद हैं। जिनका ब्यौरा मैरे पास मौजूद है। वह अपने मकान किराये पर व किसी बड़ी कंपनी को लीज पर दिये हुये हैं और सरकारी कालोनियों में कब्जा किये हुये हैं। साथ ही मुख्यालयों से बाहर तैनाती में हैं लेकिन सरकारी मकान कब्जा किये रहते हैं कि अगर जिलों से हटाये गये तो फिर राजधानी में काबिज हो जायेंगे। क्या वह नियम विपरीत नहीं है?
इसके अलावा सरकार क्या उन सचिवालय कर्मियों की कोई लिस्ट तैयार करवायेगी जो सरकारी मकान में रहते है और शहर में अपनी कोठियां किराये पर चला रहे है। सरकार क्या उन जुडीशियल कर्मचारी व जजों की भी सूची तैयार करवायेगी जो बड़ी-बड़ी कोठियां सरकार से लिये हुए है या फिर लेने की फिराक में है। मैरा स्पष्ट रूप से इस खबर को लिखने का एक मात्र मकसद यही है कि नियम सभी के लिये बराबर होना चाहिये मै जब से पत्रकारिता में आया हूं तब से मैं उन लोगों को अपने बिरादरी मे चिन्हित करने का काम कर रहा हूं जो पत्रकारिता के नाम पर काले कारनामे कर रहे हैं लेकिन पत्रकारों को इस संकट में फसाने को कुचक्र रचने का प्रयास सरकार के कुछ अधिकारी क्यों करने में लगे है या फिर सामने न आकर कुछ पत्रकार भाईयों को ही आगे किये हुए है इसको मुख्यमंत्री अखिलेश जी को भी समझना होगा।
मेरा किसी को बचाने का इरादा नहीं है लेकिन बेबाक रूप से यही कहना है कि अगर कोई हमारे बीच का चेहरा नियम कानून के विपरीत कार्य कर रहा है तो उसे हम अपने फोरम में चिन्हित करके उसे चिन्हित करने का काम व नियम कानून के दायरे में उसे लाने की वकालत कर सकते है। लेकिन किसी सरकार को बदनाम करने की नियत से इस पर कार्यवाही करने का भय दिखाने का अधिकार नहीं है। मै दावे के साथ यह कह सकता हूं कि अखिलेश सरकार को पत्रकारों के बीच बदनाम करने की कोई साजिश कुचक्र रच रहा है। उसमें चाहे अधिकारी शामिल हो या फिर हमारे कुछ साथी इस पर आगे पूरी तरह पारदर्शिता से काम होना चाहिये। क्योंकि जब-जब सपा की सरकार सत्ता में आई है तभी ऐसी बाते उड़ाई जाती है कि पत्रकारों के खिलाफ सरकार फला काम कर रही है। इस तरह की सोच न तो मुलायम सिंह की सत्ता में रहकर थी और न ही युवा सांस्कारिक मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की है।
सपा की ही सरकार में पूरी तरह से पत्रकारों को लोकतंत्र में बोलने का अधिकार मिला है। इसके पूर्व पांच वर्ष की मायावती सरकार में किस तरह से अघोषित आतंक पत्रकारों के ऊपर रहा है इसको हमारे साथियों को भी समझना होगा। मुझे पूरी उम्मीद है कि कोई ऐसा काम इस सरकार में नहीं होगा जिससे सरकार की व पत्रकारों के बीच कटुता फैलने का काम हो। मेरा तो सिफ यही कहना है कि अगर नियम बने तो सबके लिये बराबर से। अगर पत्रकारों के खिलाफ कोई नियम बनते है तो इसका डटकर विरोध किया जायेगा। नियम के दायरे में वह लोग भी लाये जाये जो आईएएस व आईपीएस वर्ग तथा सचिवालय कर्मीयों व अधिकारियों के वर्ग से आते है। तभी नियम बनाने में पारदर्शिता देखी जा सकती है।
वैसे तो लोकतंत्र में बोलने व राय देने का सभी को अधिकार है। उसपर हम कोई टिप्पणी नहीं कर सकते। लेकिन सिर्फ पत्रकारों पर भय दिखाने से कोई काम नहीं बनने वाला है। मेरा सदैव यह भी मानना है कि सभी पत्रकारों को समाज में गंदी निगाहों से नहीं देखा जाना चाहिये कुछ गिने-चुने पत्रकार होगें तो उन्है चिन्हित करने का काम हम स्वंय करेगें न कि सरकार में बैठे नौकरशाह। उनकी इस मंशा को मुख्यमंत्री को समझना होगा कि कहीं उनसे कोई गलत काम तो नहीं अजांम दिलाने का किया जा रहा है जिससे समाज मे सरकार और पत्रकारों के बीच टकराव पैदा किया जा सके और अपना उल्लू सीधा करने का व वाहबाही लूटने का श्रेय लिया जाये। लेकिन मै अपने पत्रकार भाईयों से यह भी आग्रह करूंगा कि अब हमे खुद बैठ कर इस तरह के सामने आ रहे मामलों को लेकर गंभीर आत्ममंथन करना होगा कि आज इस तरह की स्थित क्यों उत्पन्न हो रही है और इसका फायदा आखिर कौन उठाना चाहता है।
लेखक प्रभात त्रिपाठी उत्तर प्रदेश के मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं.





