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अफजल की फांसी छोड़ गई कुछ अनसुलझे सवाल!

हमारे देश की सरकार ने कल आतंक के पर्याय बने और देश की सम्प्रभुता संसद पर हमला करने वाले अफ़जल गुरु को तिहाड़ जेल में फॉंसी के फॅंदे पर लटका दिया। जैसा कि होता है कि इस घटना की पूरे राष्ट्र में प्रशंसा हो रही है और ऐसा ठीक भी है। हम इस देश के कानून व सर्वोच्च न्यायालय सहित राष्ट्रपति के निर्णय का सम्मान करते हैं और मेरा व्यक्तिगत तौर पर ऐसा मानना है कि राष्ट्र की सम्प्रभुता, एकता और अखण्डता से खिलवाड़ करने वाले किसी भी व्यक्ति के साथ ऐसा ही होना चाहिए। चाहे वो अफजल गुरु हो या कसाब और कोई और। लेकिन इस फॉंसी की घटना की हमारे देश में कुछ राजनैतिक पार्टियों द्वारा व कुछ संगठनों द्वारा निंदा भी की जा रही है और इस तरह यह फॉंसी अपने पीछे कई प्रश्न छोड़ कर गई है।

हमारे देश की सरकार ने कल आतंक के पर्याय बने और देश की सम्प्रभुता संसद पर हमला करने वाले अफ़जल गुरु को तिहाड़ जेल में फॉंसी के फॅंदे पर लटका दिया। जैसा कि होता है कि इस घटना की पूरे राष्ट्र में प्रशंसा हो रही है और ऐसा ठीक भी है। हम इस देश के कानून व सर्वोच्च न्यायालय सहित राष्ट्रपति के निर्णय का सम्मान करते हैं और मेरा व्यक्तिगत तौर पर ऐसा मानना है कि राष्ट्र की सम्प्रभुता, एकता और अखण्डता से खिलवाड़ करने वाले किसी भी व्यक्ति के साथ ऐसा ही होना चाहिए। चाहे वो अफजल गुरु हो या कसाब और कोई और। लेकिन इस फॉंसी की घटना की हमारे देश में कुछ राजनैतिक पार्टियों द्वारा व कुछ संगठनों द्वारा निंदा भी की जा रही है और इस तरह यह फॉंसी अपने पीछे कई प्रश्न छोड़ कर गई है।

मैं अपनी बात शुरू करने से पहले एक महत्वपूर्ण बात पर आप सब का ध्यान दिलाना चाहूंगा कि अफजल गुरु व कसाब में एक महत्वपूर्ण फर्क है कि कसाब पाकिस्तानी नागरिक था और अफजल गुरु भारत का ही एक नौजवान था। कसाब को जन्मजात ही इस देश व इस देश की व्यवस्था की नफरत ने पाला था, लेकिन अफजल गुरु ने इस देश की व्यवस्था, यहां के लोकतंत्र व यहां के स्वतंत्रता दिवस को स्वीकार किया था, तो फिर ऐसा क्या था जिसने अफजल गुरु को कसाब की श्रेणी में ला खड़ा किया।

जैसा कि मैंने इंटरनेट पर पढ़ा कि अफजल गुरु अपनी स्कूल में स्वतंत्रता दिवस की परेड का नेतृत्व करता था लेकिन एक दिन उसने देखा कि सीमा पर तैनात जवान राष्ट्र की सुरक्षा के नाम पर उसके गांव में किसी तरह का अत्याचार कर रहे हैं और वहां से अफजल गुरु की मानसिकता में बदलाव आया। दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक और विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का एक नौजवान धीरे धीरे इस देश की व्यवस्था से नाराज होता गया और उसका यह सफ़र संसद पर हमले पर जाकर सामने आया, और अंततः उसके दिल में उपजी इस नकारात्मक भावना ने उसे फॉंसी पर लटकने को मजबूर कर दिया।

क्या इस देश में अफ़जल गुरु एक ऐसा अकेला आदमी था जो इस व्यवस्था से नाराज था, नहीं ऐसा नहीं है अन्ना के आंदोलन में उपजी भीड़, केजरीवाल की आम आदमी की पार्टी से जुड़े नौजवान, दिल्ली रेप केस के मामले में सोसल मीडिया के माध्यम से इंडिया गेट पर इकट्ठा हुई भीड़ ऐसे ही व्यवस्था से नाराज नौजवानों की आवाज है, जो शायद सत्ता कि सिंहासन पर बैठे हुक्मरानों को सुनाई नहीं दे रही और अगर सुनाई दे भी रही है इसका अहसास हो नहीं पा रहा है। समय समय पर पूरे देश में उग्र व असंतुष्ट युवा जो आज भी सड़कों पर टायर जलाता है, पुलिस से पानी की बौछारें सहन करता है, लाठियां खाता है, कुछ समय के लिए गिरफ्तारी देता है, क्या ऐसे नौजवान नहीं है जिसमें अफज़ल जैसे युवा की मानसिकता होगी।

आज हमारी इस व्यवस्था से और इस तंत्र से पूरा देश नाराज है, पूरे देश में इस व्यवस्था व तंत्र को लेकर आवाज उठ रही है। ऐसे में किसी युवा का भटक जाना कोई बड़ी बात नहीं है। अफजल गुरु के साथ गलत ये हुआ कि उसकी इस सोच का पड़ोसी देश ने फायदा उठाया, चूंकि वह सीमांत प्रांत का रहने वाला था तो इसके दिल में अवयवस्था से उपजे बीज को पड़ोसी देश ने पानी दिया और धार्मिक कट्टरता की खाद से पल्लिवत व पुष्पित किया। और दोस्तों धर्म मनुष्य के रग रग में व्याप्त हैं, तो ऐसे में किसी युवा को यह बताना कि तुम्हारी सारी नाराजगी धर्म के रास्ते दूर हो जाएगी जरूर उस युवा को एक दिशा प्रदान करती है। अब यह दिशा सही है या गलत ऐसी सोचने की शक्ति युवा मन की नहीं हो सकती। अफजल ने जो किया निश्चित तौर पर वो गलत था और राष्ट्र विरोधी था।

तो क्या राज्य की सरकार की यह जिम्मेदारी नहीं है कि वो ऐसी व्यवस्था कायम करे कि कोई अफजल पैदा ही न हो, सिर्फ किसी को फांसी पर लटका देने से युवाओं का आक्रोश या व्यवस्था दुरुस्त नहीं हो जाएगी। राज्य की यह जिम्मेदारी है वो ऐसा माहौल पैदा करें कि युवाओं में असंतोष हो ही नहीं और ऐसा क्यों होता है कि हमारा पड़ोसी राष्ट्र हमारे युवाओं को बरगलाने में सफल हो जाता है, क्यों कोई युवा किसी के बहकावे में आ जाता है क्या इस मूल प्रश्न पर सोचना राज्य की जिम्मेदारी नहीं है। हमारे संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में राज्य को भी जिम्मेदार ठहराया गया है।

मेरा इस आलेख के माध्यम से यह कहने का मतलब है कि राज्य में ऐसी व्यवस्था हो जो कि हमारी इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोक का तंत्र है, यह अहसास दिलाए। जनता को लगे कि जनता का जनता के लिए और जनता के द्वारा राज हो रहा है। व्यवस्था अपनी लगे, खुद की बनाई लगे। सिर्फ दण्ड देना ही अपराध समाप्त करने की निशानी नहीं है, इससे तो अपराधी समाप्त होता है। हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था पाप से घृणा करो, पापी से नहीं। तो अपराधी को सजा मिले इससे ज्यादा जरूरी यह है कि अपराध मूल से नष्ट हो ऐसी व्यवस्था कायम हो।

लेखक श्‍याम नारायण रंगा 'अभिमन्‍यु' पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं तथा बीकानेर के रहने वाले हैं. इनसे संपर्क मोबाइल नम्‍बर 9950050079 के जरिए किया जा सकता है.

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