हल्द्वानी में अमर उजाला के संपादक सुनील शाह आजकल अखबार की अव्यवस्था के चलते काफी परेशान हैं। कुमाउं में अखबार के पाठक दिन-ब-दिन कम हो रहे हैं। ये अलग बात है कि प्रसार विभाग आंकड़ों की जुबानी संपादक को धोखे में रख कर बता रहा है कि बाजार में इतना अखबार जा रहा है… और अखबारों से ज्यादा! प्रसार विभाग सही कह रहा है। अखबार हर जिलों में खूब जा रहा है। लेकिन ये अखबार वितरकों के पास डम्प हो जाता है। पाठक तक नहीं पहुंच पाता है। इसके कई कारण हैं।
शुरुआत होती है हल्द्वानी से ही। यहां से कुमाउं को जाने वाली गाड़ियों के मालिकों से प्रसार वालों ने अपना कमीशन बांध रखा है। मतलब कम्पनी से गाड़ी मालिक से जो शर्तें तय होती हैं उनका कुछ प्रतिशत प्रसार के कारिंदें बड़ी ही सफाई से डकार जाते हैं। इससे गाड़ी मालिकों की फिर अपनी मनमानी शुरू हो जाती है। वो सवारी भर कर आराम से अपने गंतव्य स्थानों तक पहुंचते हैं। वहां फिर गाड़ी वालों की समाचार एजेंटों से तीखी नोक-झोंक हमेशा होती है। गाड़ी वाले ‘जो करना है कर लो’ की तर्ज पर उनकी बातों को अनसुना कर अखबार पटक चल देते हैं। प्रसार, गाड़ियों के बाद हॉकरों की मनमानी के साथ ही पाठकों तक सही वक्त तक अखबार ना पहुंचने पर पाठक कम होते चले गए हैं।
एजेंट बताते हैं कि महीने में प्रसार वाले उगाही के लिए जब उनके पास आते हैं तो उनका व्यवहार बहुत ही रूखा रहता है। उनकी कोई बात ही नहीं सुनते प्रसार वाले। बचे पेपर की वापसी नहीं लेते। प्रसार वालों का बोलने का तरीका इतना गंदा होता है कि लगता है जैसे वो नहीं हम चोर हों। विषेशकर तो पंत का। ना जाने उसने मैनेजमेंट को क्या घुट्टी पिला रखी है कि उसकी कारगुजारी किसी को दिखती ही नहीं। पंत के साथ ही सलमान का रवैया भी ठीक नहीं रहता है। इनलोगों के व्यवहार से ज्यादातर पुराने एजेंटों ने अमर उजाला से तौबा कर दी है। अमर उजाला के मैनेजमेंट को अखबार की पतली होती जा रही हालत के बारे में कुछ भी मालूम नहीं है। कुछ जगहों में गुप-चुप ढंग से बिना सिक्योरिटी के ही हॉकरों को अखबार की एजेंसी दे रखी है।
कुमाउं का बागेश्वर जहां पहले अमर उजाला को ही लोग जानते थे वहां अब अमर उजाला अपनी अंतिम सांसे गिन रहा है। यहां के पत्रकार गणेश उपाध्याय को रानीखेत तथा रानीखेत के आनंद नेगी को बागेश्वर में भेज एक असफल प्रयोग भी करने की कोशिश की गई। गणेश उपाध्याय मैनेजमेंट को स्वास्थ्य का हवाला दे सशर्त इस्तीफा देकर घर बैठे हैं। उपाध्याय को उम्मीद है कि मैनेजमेंट उनकी समस्या को ध्यान में रख बागेश्वर में उनका स्थानांतरण कर देगा। लेकिन मैनेजमेंट के चुप रहने पर अब उपाध्याय सांध्य दैनिक से अपनी नई पारी की शुरुआत करने का मन बना रहे हैं।
बागेश्वर की पतली हालत से अखबार के संपादक भी थोड़ा बहुत रूबरू हो चुके हैं। इस सिलसिले में वो कई बार पहाड़ का दौरा भी कर चुके हैं। लेकिन हालात हैं कि उनके भी काबू में नहीं आ रहे हैं। संपादक जी ने अखबार का ढर्रा बदलने के लिए कई बार मन भी बनाया, लेकिन बात सिर्फ बातचीत तक ही सिमट कर रह जा रही है। कई लोगों का इंटरव्यू लेने के बाद बात मानदेय पर अटक कर खत्म हो जा रही है। प्रसार वाले संपादक को फिर एक नया सपना दिखा देते हैं कि देखो जल्द ही सब ठीक हो जाने वाला है।
संपादक प्रसार वालों के झूठे सपने में बह कर कुछ सामाजिक मुद्दों को अखबार में लाने की कवायद शुरू कर देते हैं और इंतजार में रहते हैं कि पाठक वर्ग की अच्छी प्रतिक्रिया सामने आएगी। लेकिन संपादक साहब अब आप ही बताइये कि जब पाठक तक अखबार ही नहीं पहुंच रहा हो तो प्रतिक्रिया कहां से आएगी! ये आपका देखा-जाना और महसूस किया मॉरीशस तो हैं नहीं कि जहां ईमानदारी है.. जेबें नहीं कटती.. चोरी नहीं होती.. रेत बिखरी ही रहती है। वहां रेत माफिया नहीं होता!!! संपादक जी मॉरीशस के लिए जो समझ, दर्द आपके दिलो-दिमाग में जागा वो समझ, दर्द आपका भारत के हल्द्वानी में आकर कहां गायब हो गया!!
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.





