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अथश्री (बे)सहाराश्री फ्रॉड कथा (पार्ट टू) : निवेशकों का पैसा न लौटाने के प्रकरण में सुब्रत राय के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी

वर्ष 1978 में 1500 रुपये की पूंजी से गोरखपुर में चिटफंड का कारोबार शुरू करने वाले सुब्रत राय ने साल भर पहले घोषित तौर पर बताया कि उनके पास निवेशकों के तिहत्तर हजार करोड़ रुपये हैं. चिटफंड के बल पर यहां तक पहुंचे इस शख्स और इसके समूह की साख को पहला बड़ा झटका रिजर्व बैंक आफ इंडिया ने दिया था. और अब ताबूत में मजबूत कील ठोंक दी है सेबी ने. दोनों ने दो अलग-अलग मामलों में सहारा समूह को निवेशकों से लिए गए पैसे लौटाने का सख्त निर्देश दिया.

वर्ष 1978 में 1500 रुपये की पूंजी से गोरखपुर में चिटफंड का कारोबार शुरू करने वाले सुब्रत राय ने साल भर पहले घोषित तौर पर बताया कि उनके पास निवेशकों के तिहत्तर हजार करोड़ रुपये हैं. चिटफंड के बल पर यहां तक पहुंचे इस शख्स और इसके समूह की साख को पहला बड़ा झटका रिजर्व बैंक आफ इंडिया ने दिया था. और अब ताबूत में मजबूत कील ठोंक दी है सेबी ने. दोनों ने दो अलग-अलग मामलों में सहारा समूह को निवेशकों से लिए गए पैसे लौटाने का सख्त निर्देश दिया.

आरबीआई के आदेश को सहारा समूह ने बहुत हल्के में लिया. तभी तो आरबीआई के आदेश के बाद सहारा समूह की तरफ से अखबारों में विज्ञापन छपवाकर कहा गया कि चिंता की कोई बात नहीं है, ग्रुप के पास 73,000 करोड़ रुपये है और वह आरबीआई की तय की गई समयसीमा 30 जून 2015 से बहुत पहले 31 दिसंबर 2011 तक ही सारी देनदारी निपटा देगा. आरबीआई ने 11,500 करोड़ रुपये वापस लौटाने के निर्देश दिए थे.

गैर-कानूनी तरीके से जनता से पैसे उगाहने के एक अन्य मामले में जब बाजार नियामक सेबी ने 24,029 करोड़ रुपये लौटाने का आदेश सहारा ग्रुप को दिया तब सहारा समूह के लोगों के चेहरे पर पहली बार चिंता की लकीरें दिखीं. यह बहुत बड़ी रकम है और यह रकम अभी तुरंत तुरंत देश के कोने कोने से उगाहा गया था, और इस कैश फ्लो के बल पर सहारा समूह अपनी पिछली देनदारियों और अगली रणनीतियों में खाद-पानी लगाने वाला था. पर सहारा समूह के लोगों ने हार नहीं मानी.

सहारा समूह का हमेशा मानना रहा है कि कोई भी संकट इतना बड़ा नहीं हो सकता जिसे 'हल' न किया जा सके, जिसे 'मैनेज' न किया जा सके. सहारा के राह में जो भी रोड़ा बना, उसे 'मैनेज' कर लिया गया. क्या जज, क्या अफसर, क्या नेता, क्या मंत्री, क्या मुख्यमंत्री और क्या ….. सबने सहारा व सुब्रत राय की घोषित या अघोषित तौर पर जय-जय की. जो नहीं माना, उसे धमकाया गया, उसे सबक सिखाया गया, उसे बर्बाद कर दिया गया, उसे अलग-थलग कर दिया गया.

बालीवुड और क्रिकेट वर्ल्ड तो सहारा के कदमों पर रहा, क्योंकि इन दोनों इंडस्ट्रीज को पैसे से मैनेज किया जाता है और सुब्रत राय के पास जनता से आए पैसे की कोई कमी नहीं रही और पैसे होने के कारण उनकी दानवीरता और उदारता में भी कोई कमी नहीं रही. 

सेबी के आदेश के बाद सहारा के लोग लग गए चीजों को मैनेज करने में. हर लेवल पर कोशिश हुई. सारे तरीके आजमाए गए. लेकिन उल्टी पड़ गईं सब तदबीरें. कुछ ना दवा ने काम किया. सहारा का मैनेज करने का अभियान फिलहाल तक तो फ्लाप शो नजर आ रहा है. अबकी सेबी और सुप्रीम कोर्ट नहीं मैनेज हो पाया सहारा समूह से और एक के बाद एक कड़े आदेश जारी होते गए. दो कंपनियों और सुब्रत राय समेत चार निदेशकों के बैंक एकाउंट व संपत्ति जब्त करने के निर्देश सेबी ने दे दिए. इस घटना को सहारा के अंत की शुरुआत माना जा रहा है.

आखिर कहां से इतना पैसा सहारा समूह के पास आया? जवाब है- आम जन से, गरीबों के घर से. जी हां. पान वाले, रिक्शा वाले, मजदूर, किसान… ये लोग हैं सहारा के आधार. पैसा डबल करने की योजनाओं और ढेर सारे प्रलोभनों के बल पर सहारा के ब्लाक, तहसील, कस्बा लेवल के कार्यकर्ताओं ने गांव-गांव जाकर लोगों के पैसे जमा करवाए. तरह तरह की कंपनियां बनाकर और तरह तरह के बांड निकाल कर खाते-कमाते लोगों के पैसे लगवाए गए. पैसे जमा कराने और बांड निकालने के लिए जो बुनियादी नियम होते हैं, जो शर्तें होती हैं, उसकी पूरी अनदेखी की सहारा ने. उसे तो किसी तरह लोगों से पैसे निकलवाने थे. इस सबसे सहारा के पास अकूत पैसा आ गया.

एक विज्ञापन में सहारा समूह ने घोषित किया कि उसके पास निवेशकों के पास से आए तिहत्तर हजार करोड़ की चल-अचल संपत्ति है. यह बात जून 2011 की है. जनता और गरीबों के पैसे से उन्हीं दिनों सुब्रत राय विजय माल्या की फार्मला वन टीम में हिस्सेदारी खरीद रहे थे. पांच सौ करोड़ रुपये देकर उन्होंने विजय माल्या की फार्मूला वन टीम में साढ़े बयालीस प्रतिशत स्टेक लिया. इसकी तस्वीरें व बड़ी बड़ी खबरें सहारा समूह के अखबारों में छपी और इस समूह के चैनलों पर दिखाई गई. देश के अन्य अखबारों चैनलों ने भी खेल प्रेम के तहत इसका कवरेज किया.

पिछले साल सुब्रत राय ने लंदन के मशहूर होटल ग्रॉसवेनर हाउस को बत्तीस सौ पचास करोड़ रुपये में खरीदा. तब उन्होंने एक बयान दिया था जो बहुत चर्चित हुआ था. सुब्रत राय ने कहा था- ''मेरे लिए पैसा मुद्दा नहीं रहता. जितनी भी बड़ी डील हो, मैं वह रकम कल सुबह 10 बजे तक चुका सकता हूं.'' सरकारी और आर्थिक नियमों को ताक पर रखकर, जनता को प्रलोभनों में फंसाकर हजारों करोड़ रुपये वसूलने वाले आदमी के लिए पैसा बड़ा मुद्दा हो भी नहीं सकता. लेकिन पैसा बड़ा मुद्दा जरूर आम आदमी के लिए है, आम निवेशक के लिए है. तभी तो सहारा में पैसा लगाने वाले ढेर सारे निवेशक इन दिनों परेशान घूम रहे हैं.

ऐसा ही एक प्रकरण उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले का है. सहारा इंडिया समूह प्रमुख सुब्रत राय पर निवेशकों की रकम वापस न करने का आरोप है. यह मामला अदालत में चल रहा है. सुब्रत राय के खिलाफ कई वारंट निकले पर वह कोर्ट में हाजिर नहीं हुए. आखिरकार अब उनके खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी कर दिया गया है. सुब्रत राय के साथ कंपनी की चंदौसी शाखा के तत्कालीन प्रबंधक वेदराम सैलानी के खिलाफ भी गैर जमानती वारंट जारी किया गया है. मामले की अगली सुनवाई 25 फरवरी को होगी. इस प्रकरण के बारे में पता चला है कि सहारा समूह के प्रमुख सुब्रत राय ने वर्ष 1995-96 में ‘दि प्राइज सर्कुलेशन एंड कलेक्शन मनी गोल्डन स्कीम’ शुरू की थी. बाद में इस स्कीम पर उत्तर प्रदेश सरकार ने पाबंदी लगा दी थी. कंपनी ने प्रतिबंध के बाद निवेशकों की रकम वापस नहीं की. इस पर बदायूं शहर निवासी एडवोकेट धनवीर सक्सेना ने वर्ष 1997 में न्यायिक मजिस्ट्रेट बिसौली की अदालत में परिवाद दाखिल किया लेकिन आरोपी कोर्ट में हाजिर नहीं हुए.

सहारा के वकील ने कोर्ट में व्यक्तिगत उपस्थिति से माफी का प्रार्थना पत्र दिया लेकिन इसे अदालत ने खारिज करके गैर जमानती वारंट जारी कर दिए थे. इस आदेश को चुनौती देते हुए आरोपियों ने जिला जज की अदालत में रिवीजन याचिका दायर किया था. जिला जज ने इसे खारिज करके मामले को सुनवाई के लिए न्यायिक मजिस्ट्रेट बिसौली शिवकुमार को सौंप दिया. न्यायिक मजिस्ट्रेट ने एक फरवरी को सुनवाई के बाद दोनों के खिलाफ फिर से गैर जमानती वारंट जारी कर दिया है.

हालांकि बड़े लोगों का वारंट कुछ नहीं बिगाड़ पाते. पैसे के बल पर न्यायिक व्यवस्था में इतने रास्ते निकाल लिए जाते हैं कि बड़े से बड़ा आर्थिक अपराधी जेल जाने से बच जाता है. इसी कारण बड़े-बड़े आर्थिक अपराध करने के बावजूद सुब्रत राय सहारा का कभी कुछ नहीं बिगड़ा क्योंकि उनके दोस्त हर वो बड़ा आदमी है जो सत्ता और तंत्र का हिस्सा है. संभव है, वो इस बार भी गैर जमानती वारंट से बच जाएं और जेल न जाएं लेकिन सुप्रीम कोर्ट, सेबी और प्रवर्तन निदेशालय की तिकड़ी ने जो घेरेबंदी सहारा समूह की कर दी है, उससे बच निकलना सुब्रत राय के लिए मुश्किल दिख रहा है. सेबी वाले आर्डर के बाद कुछ और नियामक संस्थाएं और एजेंसियां नए मोर्चों पर सक्रिय हो चुकी हैं. ये संस्थाएं व एजेंसियां किस 'मिशन' में जुटी हैं, क्या तलाश रही हैं, यह कहानी अगली किश्त में.

…जारी…

लेखक यशवंत भड़ास के संस्थापक और संपादक हैं. अगर आपके पास भी सुब्रत राय और सहारा समूह को लेकर कोई खास जानकारी, कहानी है तो उसे भड़ास के पास भेजें, उन जानकारियों, तथ्यों को इस सीरिज की अगली पोस्टों में समायोजित किया जाएगा. पता है: [email protected]


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