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महराजगंज

ग्रामीण प्रतिनिधियों का जमकर शोषण करते हैं अखबार वाले

ग्रामीण प्रतिनिधियों का प्रत्येक अखबार में ऊपर वाले जमकर शोषण करते हैं। बेचारे ग्रामीण प्रतिनिधि केवल नेम फेम के चलते विरोध नहीं कर पाते हैं। कभी-कभी तो इनको आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ता है। जो भी अखबार हैं, वे अपने सर्कुलेशन के लिये जिले के प्रत्येक नुक्कड़ एवं कस्बों में अपना प्रतिनिधि बना बैठे हैं। ये प्रतिनिधि बेचारे अपने आप को समाज में एक स्थान पाने के लिये पत्रकार का चस्पा लगा बैठे हैं। न तो कोई अखबार कम्पनी वाला इन्हें मानदेय या न्यूज का पैसा देता है और ना ही कोई कार्ड, पर शोषण जमकर बंधुआ मजदूर की तरह किया जाता है।

ग्रामीण प्रतिनिधियों का प्रत्येक अखबार में ऊपर वाले जमकर शोषण करते हैं। बेचारे ग्रामीण प्रतिनिधि केवल नेम फेम के चलते विरोध नहीं कर पाते हैं। कभी-कभी तो इनको आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ता है। जो भी अखबार हैं, वे अपने सर्कुलेशन के लिये जिले के प्रत्येक नुक्कड़ एवं कस्बों में अपना प्रतिनिधि बना बैठे हैं। ये प्रतिनिधि बेचारे अपने आप को समाज में एक स्थान पाने के लिये पत्रकार का चस्पा लगा बैठे हैं। न तो कोई अखबार कम्पनी वाला इन्हें मानदेय या न्यूज का पैसा देता है और ना ही कोई कार्ड, पर शोषण जमकर बंधुआ मजदूर की तरह किया जाता है।

लगभग एक अखबार के प्रत्येक जिले में दर्जनों प्रतिनिधि होते हैं, जिन्हें 15 अगस्त, 26 जनवरी, दीपावली, होली, दशहरा, किसी नेता के जन्‍मदिन आदि पर कम से कम 10 हजार से लेकर लाखों रुपये तक का विज्ञापन जुटाने का काम सौंपा जाता है। जो जितना ज्‍यादा पैसे का विज्ञापन उपलब्‍ध कराए वो उतना बड़ा पत्रकार। उसके बाद उनके उपर सर्कुलेसन का बोझ भी होता है। कम से कम एक ग्रामीण प्रतिनिधि को दो एजेन्सी लेनी पड़ती है। जब भी कोई गम्भीर घटना घटित होती है तो ब्‍यूरोचीफ रात को 12 बजे भी दौड़ा देता है। ये प्रतिनिधि कागज पर खबर लिख कार्यालय को दे आते हैं। वहां कार्यालय पर बैठा मगरमच्छ पान, गुटखा लेकर समाचार टाइप करता है। उसके बाद जिला प्रभारी महोदय धमकी देते हैं कि तुम्हारी खबर ठीक नहीं है। लिखने नहीं आता है। तुमको अखबार से निकाल दिया जायेगा। बेचारा प्रतिनिधि फिर जिला प्रभारी का तेल लगाना प्रारम्भ करता है। उनका भोजन, पानी, सब्जी उधार पैसे देने पर जिला प्रभारी महोदय गदगद होते हैं और न्यूज आ जाती है।

दूसरे दिन सुबह बिना आंख-मुंह धोये प्रतिनिधि अखबार का इंतजार करता है। खबर देखने पर खुश होता है और दो चार मित्रों को फोन कर अपना खबर पढ़ता है और अपना कसीदा गढ़ता है। मतलब उस प्रतिनिधि का लाभ मात्र उतना है कि उसे नेम फेम मिले। उसके आड़ में एक प्रतिनिधि वर्ष में लगभग 50 हजार से एक लाख रुपये अखबार के कम्पनी को दे देता है। और कम से कम 100 अखबार वितरित भी करवाता है। परन्तु सदैव उसका शोषण होता है। अखबार वाले प्रत्येक मीटिंग में परिचय पत्र देने की बात करते हैं। फिर मीटिंग होती है फिर टाल दी जाती है। गोरखपुर मण्डल में किसी अखबार ने अपने किसी प्रतिनिधि को परिचय पत्र नहीं दिया है और शोषण जारी है।

महराजगंज से ज्ञानेन्द्र त्रिपाठी की रिपोर्ट.

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