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संक्रमण काल से गुजर रहा है भोजपुरी सिनेमा

आज से लगभग 50 साल पहले डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद, नाज़िर हुसैन और विश्वनाथ शाहाबादी जी जैसे लोगों ने भोजपुरी सिनेमा के लिए जो सपने देखे थे, आज लगता है कि वो सपने कहीं खो से गए हैं. अपनी भाषा और संस्कृति के संवाहक सिनेमा को आगे बढ़ाने की आज कोई कोशिश-कवायद नहीं हो रही है. वैसे तो भोजपुरी सिनेमा के 50 साल होने को हैं, लेकिन आज की भोजपुरी फिल्मों को देखकर यह बात दावे के साथ कही जा सकती है कि हमारी भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री वो इंडस्ट्री नहीं रह गई है, जिसकी नींव भोजपुरी सिनेमा के पितामह नाज़िर हुसैन साहब ने रखी थी.

आज से लगभग 50 साल पहले डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद, नाज़िर हुसैन और विश्वनाथ शाहाबादी जी जैसे लोगों ने भोजपुरी सिनेमा के लिए जो सपने देखे थे, आज लगता है कि वो सपने कहीं खो से गए हैं. अपनी भाषा और संस्कृति के संवाहक सिनेमा को आगे बढ़ाने की आज कोई कोशिश-कवायद नहीं हो रही है. वैसे तो भोजपुरी सिनेमा के 50 साल होने को हैं, लेकिन आज की भोजपुरी फिल्मों को देखकर यह बात दावे के साथ कही जा सकती है कि हमारी भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री वो इंडस्ट्री नहीं रह गई है, जिसकी नींव भोजपुरी सिनेमा के पितामह नाज़िर हुसैन साहब ने रखी थी.

आज भोजपुरी सिनेमा का एक बड़ा बाजार है, लेकिन इस बाजार में जो माल (फिल्में) तैयार हो रहा है और बिक रहा है, वह न सिर्फ भोजपुरी सिनेमा को, बल्कि पूरे भोजपुरी समाज को बदनामी के गर्त में ढकेल देने पर उतारू है. जिस भोजपुरी सिनेमा को भोजपुरी अस्मिता और भोजपुरी समाज का प्रतिनिधि होना चाहिए था, वही आज भोजपुरी की अस्मत उतारने पर उतारू है. अगर यह कहें कि आज भोजपुरी सिनेमा के नाम पर भोजपुरी भाषा व संस्कृति के साथ खुलेआम बलात्कार किया जा रहा है, तो यह कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी.

आप आजकल की भोजपुरी फिल्में देख लीजिए और साथ ही हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्में भी. आप पाएंगे कि अन्य भाषाओं के सिनेमा में जहां नए नए प्रयोग हो रहे हैं. कुछ सार्थक रचने की कोशिश हो रही है, भोजपुरी फिल्में फूहड़पन और वल्गैरिटी की कीचड़ में आकंठ धंसी हुई हैं. इक्का-दुक्का नाम छोड़ दें तो आज कोई भी यह कोशिश नहीं कर रहा है की कुछ अच्छा और सार्थक किया जाए, ताकि भोजपुरी सिनेमा फिर से अपने पुराने गौरव को दुहरा सके. आज सबकी कोशिश बस 100 का 1000 बनाने की है. कोई भी निर्माता, निर्देशक या कलाकार नया व अलग करने का जोखिम नहीं लेना चाहता. सभी एक बनी बनायी लीक पर चल रहे हैं.

दरअसल यहां लोगों को यही पता नहीं है कि उन्हें बनाना क्या है. बस यह पता है कि उन्हें कमाना है और ये भोजपुरी फिल्मों के जरिए आसानी से हो जाता है. ऐसे लोगों को कथा-पटकथा से कोई खास मतलब नहीं है. गाने कहीं से चोरी किये हुए अश्लील व बाजारू, द्विअर्थी संवाद और उपर से दो आईटम डांस का तड़का. इन सब को मिला दीजिए, एक अदद भोजपुरी फिल्म तैयार हो गई. रचनात्मकता क्या होती है न जानते हैं न जानने की जरूरत है. आखिर उसमें दिमाग खपाना पड़ेगा. किसी भी फिल्म की सबसे प्रमुख चीज है पटकथा और यहां इसपर मेहनत करने को कोई तैयार हीं नहीं है. यहां सारा जोड़-तोड़ आईटम सॉन्ग और डांस पर केंद्रित है. भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री शायद इकलौती ऐसी फिल्म इंडस्ट्री होगी जहां स्क्रिप्ट फाइनल हो या ना हो फिल्म में आईटम नम्बर की संख्या और आईटम डांसर पहले फाइनल हो जाते हैं.

पिछले 10 सालों में भोजपुरी सिनेमा ने काफी बदलाव देखें हैं और ये बदलाव अब भी जारी हैं. लेकिन विडम्बना यह कि ये जो बदलाव हैं वो बेहतरी के लिए नहीं भोजपुरी सिनेमा के स्तर को और गर्त में ले जाने के लिए हो रहे हैं. दरअसल यह भोजपुरी सिनेमा के लिए संक्रमण काल है. इंतजार इस संक्रमण के दौर के खत्म हो जाने का है, फिर यकीनन भोजपुरी सिनेमा बेहतरी और कामयाबी की नई इबारत लिखेगा. डर बस यह है कि इस इंतजार में कहीं देर न हो जाय और भोजपुरी सिनेमा के आखिरी बचे दर्शकों का भी भोजपुरी सिनेमा से मोहभंग न हो जाए.

लेखक कमलेश सिंह फिल्मकार और माईलस्टोन फिल्म एण्ड इंटरटेनमेंट प्रा. लि. के निदेशक हैं.

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