बाराबंकी। ऑल इण्डिया मुस्लिम पसर्नल लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष मौलाना कल्बे सादिक ने तलाक के बारे में कहा कि कहा कि कुर्आन में ऐसा नहीं है कि जैसा रायज कर दिया गया है कि तीन बार सिर्फ कह देना तलाक है, यह ठीक नहीं। जिला मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर हैदरगढ़ रोड पर स्थित सरायं इस्माईल में मौलाना अली रिजवान जैदपुरी और मौलाना इब्ने अब्बास के वालिद स्व0 मोहम्मद राहिम की याद में आयोजित मजलिस को खिताब करते हुए मौलाना सादिक ने आगे कहा कि कुर्आन की रोशनी में तलाक को कुछ इस तरह से बताया कि जो औरतों को मुसीबत से बचाने के लिए दिया जाता था न कि उन्हें मुसीबत में डालने के लिए। मौलाना सादिक ने आगे कहा कि इन्सान के जहन में यह बात न आने पावे कि उसे बेकार पैदा किया गया है। परवरदिगार ने दुनिया में किसी जर्रे को भी बेवजह एवं बेकार का नहीं बनाया है।
उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति को सोचना चाहिए कि उनके नीचे मखलूक है जब वह बेकार नहीं है तो कोई उसके ऊपर रहकर कैसे बेकार बनाया गया होगा। जबकि इन्सान को सबसे अशरफुल मखलूकात बनाया है यानी दुनिया में सबसे सर्वोत्तम। मौलाना सादिक ने कहा कि जमीन बनायी गयी तो उसको नेमतों के खजाने से भर दिया गया अगर जमीन अनाज को खा जाये और पैदा न करे तो उसे मुर्दा जमीन कहते हैं। ऐसे में उन मुतवल्लियों को क्या कहेंगे जो मौला की और अल्लाह के नाम वक्फ की गयी जायदाद को खाये जा रहे हैं। मौलाना ने कहा कि सरकारों का हाल तो यह है कि पैसा होता नहीं मगर बांट देते हैं, एलान के जरिए। उसका हिसाब भी मांग लेते हैं बगैर दिये। मगर वह खुदा तो तमाम नेमतों से नवाजने के बाद भी हिसाब नहीं पूछता।
मजलिस में मौलाना सादिक ने कहा कि आपस में लड़ना नहीं चाहिए। क्योंकि लड़ाने का काम शैतान का है। रहमान का काम मिलाना है। इस्लाम को पहचानने की जरूरत है अगर इस्लाम को पहचान लिया तो समस्या खुद ब खुद खत्म हो जायेगी। उन्होंने कहा कि शरीयत की बुनियाद अद्ल है। बगैर अद्ल के शरीयत को समझना मुश्किल है। हर वह शह जो अच्छी हो शरीयत उसकी इजाजत देती है और जो बुरी है उसे रोकती है। लेकिन गौर करने की जरूरत है अच्छा लगना और अच्छा होना दोनों में फर्क है। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि जैसे सिगरेट, तम्बाकू, गुटखा, गाना वगैरह अच्छा लगता है मगर इनका अन्त बुरा है। मौलाना सादिक ने कहा कि टेक्नॉलाजी जब ईमान के साथ होती है तो ओबामा को भी भिखारी बनने पर मजबूर कर देती है। ओबामा ने पाकिस्तान का कयास ईरान से कर लिया था तभी न दिखायी देने वाले प्लेन को ईरान भेज दिया। जब ईरानियों ने उसे अपने कब्जे में ले लिया तो उसकी भीख मांगने पर मजबूर हुए।
इसके पूर्व मजलिस को दिल्ली से आये मौलाना ईमाम हैदर जैदी ने खिताब किया। उन्होंने कहा कि बाद में पूछना अब्बास की हैबत क्या है-पहले मालूम करो जा के कयामत क्या है। उन्होंने कहा कि मजलिस सीखने और सिखाने का जरिया है। यह लाशऊर को बाशऊर बना देती है मगर सीखना खुद की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि खुदा फर्माता है कि इन्सान को जिस मकसद के लिए पैदा कि अगर उस पर अमल करेगा तभी कामयाब होगा। वो लोग घाटे में नहीं है ईमान वालों के साथ उनके रास्ते पर चलेंगे तो कामयाब हो जायेंगे। मौलाना ईमाम ने कहा कि जो ईमान को अपनी जागीर समझते हैं उसे मोमिन कहते हैं। ईमान पर आंच आये तो वह तड़प जाते हैं जो नहीं तड़पते वह मुनाफिक होते हैं। हजरत अली की मोहब्बत ईमान है। हजरत अली की मोहब्बत कोई जीन्स नहीं जिसे सभी दौलतमंद खरीद लें। हजरत अली की मोहब्बत लुत्फेखुदा है। नेमत कोशिश करने से मिलती है घर बैठे नहीं मिलती। उन्होंने कहा हजरत अली फरमाते हैं मेरी मोहब्बत उसी को मिलती है जो बर्दाश्त भी कर ले और बर्बाद भी न करें। जबान से खाली कहने से मोहब्बत नहीं होती। मेरा मोहिब वही हो सकता है जिसमें यह तीन बातें पायी जाती हों बहादुर हो, सखी हो, मौत को याद करने वाला हो। अगर यह अलामते हैं तो दुनिया चाहे उसे बुजदिल समझे मगर अली की निगाह में वह उनका शिया है। जज्बात से फैसला छोड़ शऊर को जिन्दा करो। मजलिस से पूर्व पेशख्वानी गुलाम मेंहंदी, सरवर रिजवी, हाजी कल्लू व आतिफ सल्लमहू ने की। इस मौके पर मौलाना इफ्तेखार हुसैन इंकलाबी, मौलाना जाबिर जौरासी, मौलाना अली रिजवान, मौलाना इब्ने अब्बास, मौलाना कायम मेहंदी आदि लोग मौजूद थे। अंत में मौलाना ने कर्बला वालों के मसायब पेश किये जिससे सुनकर अजादार फफक-फफक कर रो पड़े।
बाराबंकी से रिज़वान मुस्तफ़ा की रिपोर्ट.





